मुख्य तथ्य

  • किसान, जनजातीय और मजदूर आंदोलन औपनिवेशिक शोषण की प्रतिक्रिया थे; इन्हें अलग-अलग कानून-व्यवस्था की घटनाओं की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।
  • नील, पाबना, दक्कन, मोपला, किसान सभा, तेभागा और तेलंगाना किसान राजनीति के बदलते रूप दिखाते हैं।
  • संथाल, मुंडा, भील, कोल और ताना भगत आंदोलनों में जमीन, जंगल, पहचान, धर्म और राज्य-विरोधी शिकायतें साथ आईं।
  • मजदूर राजनीति कारखाना-स्थितियों, युद्धकालीन महंगाई, हड़तालों, मजदूर संघ अधिनियम 1926 और अखिल भारतीय श्रमिक संघ कांग्रेस 1920 से मजबूत हुई।
  • गांधी युग ने कुछ आंदोलनों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा, पर वर्ग, जाति, काश्तकारी और वन-अधिकार के सवाल बने रहे।

मुख्य बिंदु

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    किसान, जनजातीय और मजदूर आंदोलन औपनिवेशिक शोषण की प्रतिक्रिया थे; इन्हें अलग-अलग कानून-व्यवस्था की घटनाओं की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।

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    नील, पाबना, दक्कन, मोपला, किसान सभा, तेभागा और तेलंगाना किसान राजनीति के बदलते रूप दिखाते हैं।

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    संथाल, मुंडा, भील, कोल और ताना भगत आंदोलनों में जमीन, जंगल, पहचान, धर्म और राज्य-विरोधी शिकायतें साथ आईं।

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    मजदूर राजनीति कारखाना-स्थितियों, युद्धकालीन महंगाई, हड़तालों, मजदूर संघ अधिनियम 1926 और अखिल भारतीय श्रमिक संघ कांग्रेस 1920 से मजबूत हुई।

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    गांधी युग ने कुछ आंदोलनों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा, पर वर्ग, जाति, काश्तकारी और वन-अधिकार के सवाल बने रहे।

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    1947 के बाद यह इतिहास अनुच्छेद 23, अनुच्छेद 43, अनुच्छेद 244, पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून, वन अधिकार कानून और श्रम संहिताओं से जुड़ता है।

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    UPSC कारण, क्षेत्र, नेता, कालक्रम, कानूनी परिणाम और स्वतःस्फूर्त विद्रोह बनाम संगठित आंदोलन का फर्क पूछता है।

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    सावधानी रखें: कई आंदोलन क्षेत्रीय रूप से अलग थे; उनमें एक ही विचारधारा या एक ही राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं था।

वैचारिक आधार और संवैधानिक विरासत

  • मूल अर्थ: किसान, जनजातीय और मजदूर आंदोलन खेती करने वालों, वन-समुदायों और मेहनताना पाने वाले मजदूरों की सामूहिक कार्रवाइयां थीं। इनके निशाने पर जबरन राजस्व, लगान, बेगार, वन-नियंत्रण, बागान अनुशासन, कम मजदूरी और असुरक्षित काम की स्थितियां थीं।
  • तीनों को एक न मानें: किसान आंदोलन प्रायः भू-राजस्व, लगान, काश्तकारी, कर्ज, फसल और जमींदारों और बागान मालिकों के दबाव पर टिके थे; जनजातीय आंदोलन में जमीन, जंगल, सांस्कृतिक स्वायत्तता और पवित्र भूगोल के सवाल भी जुड़ते थे; मजदूर आंदोलन कारखाने के घंटे, मजदूरी, मजदूर संघ बनाने के अधिकार, सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी से निकले।
  • औपनिवेशिक तंत्र: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी दबाव, महालवाड़ी आकलन, कृषि का व्यापारीकरण, साहूकारों की पैठ, वन कानून, बागान क्षेत्र, रेल-खनन मजदूरी और युद्धकालीन महंगाई ने विरोध के अलग-अलग मैदान बनाए।
  • संवैधानिक विरासत: इन संघर्षों से कोई एक अनुच्छेद सीधे नहीं निकला, पर इनके मुद्दे अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1) के उपखंड ग, अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 23, अनुच्छेद 24, अनुच्छेद 38, अनुच्छेद 39, अनुच्छेद 43, अनुच्छेद 43A, अनुच्छेद 46 और अनुच्छेद 244 में दोबारा दिखते हैं।
  • अनुसूचियां और कानून: पांचवीं अनुसूची, छठी अनुसूची, पेसा कानून 1996, वन अधिकार कानून 2006, मजदूर संघ अधिनियम 1926, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 और चार श्रम संहिताएं दिखाती हैं कि स्वतंत्र भारत ने पुराने असंतोष को कानूनी प्रक्रिया में बदला।
  • भागीदारों की बनावट: इस क्षेत्र में गरीब किसान, मध्यम किसान, काश्तकार, बटाईदार, खेतिहर मजदूर, महिला मजदूर, मजदूरी की ओर धकेले गए कारीगर, वन-मुखिया, धार्मिक नेतृत्व, ईसाई प्रचारक, राष्ट्रवादी वकील, समाजवादी कार्यकर्ता और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता शामिल थे। इसी मिश्रण से एक ही आंदोलन कहीं आर्थिक, कहीं धार्मिक और कहीं पुलिस-विरोधी दिख सकता था।
  • राज्य की प्रतिक्रिया: औपनिवेशिक सत्ता आम तौर पर जांच आयोग, पुलिस दमन, सीमित रियायत, कानूनी संहिताकरण, जनजातियों या समुदायों की श्रेणीबंदी और वफादार बिचौलियों के इस्तेमाल से जवाब देती थी। बहुविकल्पीय प्रश्न में यह प्रतिक्रिया उतनी ही अहम है जितनी मूल शिकायत।
  • दायरा और सीमा: ये आंदोलन हमेशा कांग्रेस-शैली के राष्ट्रवादी आंदोलन नहीं थे। कई आंदोलन स्थानीय, धार्मिक, जाति-आधारित, पारिस्थितिक या वर्ग-आधारित थे। इनका महत्व इस बात में है कि इन्होंने औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति को पढ़े-लिखे अभिजात वर्ग से बाहर फैलाया।
  • UPSC सावधानी: हिंसक विद्रोह अपने-आप जनजातीय आंदोलन नहीं हो जाता; हर ग्रामीण विरोध किसान आंदोलन नहीं होता; हर हड़ताल औपनिवेशिक-विरोधी नहीं होती। विकल्प चुनने से पहले सामाजिक आधार, मुद्दा, क्षेत्र, नेतृत्व और राज्य की प्रतिक्रिया पहचानें।

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संभावित प्रश्न

अभ्यास में जाने से पहले उत्तर संरचना जाँचने के लिए इन प्रश्नों का उपयोग करें।

1MCQनिम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. नील विद्रोह के बाद 1860 का नील आयोग बना। 2. दक्कन दंगे मुख्यतः साहूकारों और कर्ज-पत्रों के विरुद्ध थे। 3. तेभागा आंदोलन ने बटाईदारों के लिए उपज का आधा हिस्सा मांगा। इनमें कौन-से कथन सही हैं?1 अंक · 50 शब्द
  1. Aकेवल 1 और 2सही
  2. Bकेवल 2 और 3
  3. Cकेवल 1 और 3
  4. D1, 2 और 3

व्याख्या

कथन 1 और 2 सही हैं। तेभागा में बटाईदारों के लिए आधा नहीं, दो-तिहाई हिस्सा मांगा गया था।

~50 शब्द · 1 अंक