गांधी युग: असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन
मुख्य तथ्य
- फरवरी 1922 में चौरी चौरा के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन रोका; इससे अहिंसा केवल नैतिक नारा नहीं, रणनीतिक अनुशासन भी बनी।
- नमक सत्याग्रह ने रोजमर्रा के कर को राष्ट्रीय प्रतीक बनाया और मार्च-अप्रैल 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की।
- 5 मार्च 1931 के गांधी-इरविन समझौते ने विराम, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की भागीदारी को जोड़ा।
- भारत छोड़ो आंदोलन क्रिप्स मिशन की विफलता और युद्धकालीन निराशा के बाद आया;
मुख्य बिंदु
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गांधी के आरंभिक सत्याग्रहों ने राष्ट्रवाद को याचिका-प्रधान राजनीति से निकालकर स्थानीय शिकायतों पर टिके अनुशासित जन-आंदोलन की ओर मोड़ा।
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चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में जांच, कर-अदायगी रोकना, मध्यस्थता, रचनात्मक काम और नैतिक दबाव के तरीके परखे गए।
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रॉलेट सत्याग्रह ने जन-विरोध को नियंत्रित करने की कठिनाई दिखाई; जलियांवाला बाग ने कई भारतीयों का साम्राज्यवादी न्याय पर भरोसा तोड़ा।
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असहयोग आंदोलन ने पंजाब की पीड़ा, खिलाफत और स्वराज को उपाधियों, विद्यालयों, अदालतों, परिषदों, विदेशी कपड़े और शराब के बहिष्कार से जोड़ा।
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फरवरी 1922 में चौरी चौरा के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन रोका; इससे अहिंसा केवल नैतिक नारा नहीं, रणनीतिक अनुशासन भी बनी।
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नमक सत्याग्रह ने रोजमर्रा के कर को राष्ट्रीय प्रतीक बनाया और मार्च-अप्रैल 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की।
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5 मार्च 1931 के गांधी-इरविन समझौते ने विराम, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की भागीदारी को जोड़ा।
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भारत छोड़ो आंदोलन क्रिप्स मिशन की विफलता और युद्धकालीन निराशा के बाद आया; 8 अगस्त 1942 की पुकार ने नेतृत्व-विहीन, भूमिगत और स्थानीय प्रतिरोध पैदा किया।
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गांधी युग में रचनात्मक काम, खादी, गांवों का संगठन, महिलाएं, छात्र, किसान और मजदूर राष्ट्रवाद का सामाजिक आधार बढ़ाते गए।
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परीक्षा के लिहाज़ से गांधी पद्धति और चरण
- गांधी युग को तरीका, पैमाना और राजनीतिक भाषा बदलने वाले दौर की तरह पढ़ें। शुरुआती कांग्रेस ने अखिल भारतीय भाषा बनाई थी; गांधी ने उसी भाषा को अनुशासित जन-कार्रवाई में बदला।
- मुख्य पद्धति: सत्याग्रह का अर्थ सत्य पर आग्रह, अहिंसक प्रतिरोध, स्वेच्छा से कष्ट सहना, सार्वजनिक समझाइश और सजा झेलने की तैयारी था। यह चुपचाप समर्पण नहीं था।
- काम करने का क्रम: स्थानीय शिकायत → तथ्य-जांच → सार्वजनिक प्रतिज्ञा → नैतिक दबाव → सीमित कानून-भंग या असहयोग → बातचीत → हिंसा या अनुशासन-भंग होने पर वापसी।
- चरणों की रूपरेखा: 1917 से 1919 तक आरंभिक सत्याग्रह; 1920 से 1922 तक असहयोग आंदोलन; 1930 से 1934 तक सविनय अवज्ञा आंदोलन, जिसकी शुरुआत नमक सत्याग्रह से हुई; 1942 में युद्धकालीन अवज्ञा के रूप में भारत छोड़ो आंदोलन।
- उदारवादी चरण से फर्क: याचिकाएं और परिषदें पूरी तरह गायब नहीं हुईं, पर बहिष्कार, हड़ताल, जेल जाना, धरना, खादी, गांवों से संपर्क, महिला स्वयंसेवक और छात्र-जुटान केंद्र में आए।
- उग्रवादी चरण से फर्क: स्वदेशी और बहिष्कार की विरासत बची रही, लेकिन गांधी ने उन्हें सख्त अहिंसा, रचनात्मक काम और ऐसे राष्ट्रीय अनुशासन से जोड़ा जिसमें किसान, व्यापारी, पेशेवर, मजदूर और छात्र शामिल हो सकते थे।
- संवैधानिक संदर्भ: यह दौर मॉन्टेग्यू घोषणा, भारत शासन अधिनियम 1919, साइमन कमीशन, नेहरू प्रतिवेदन, लाहौर कांग्रेस, गोलमेज सम्मेलन, भारत शासन अधिनियम 1935 और युद्धकालीन क्रिप्स प्रस्ताव से होकर गुजरता है।
- UPSC में सावधानी: तीनों अखिल भारतीय आंदोलनों को एक जैसा न मानें। असहयोग में मुख्य रूप से सहमति वापस ली गई; सविनय अवज्ञा में चुने हुए कानून खुले तौर पर तोड़े गए; भारत छोड़ो में द्वितीय विश्व युद्ध के बीच तत्काल ब्रिटिश वापसी मांगी गई।
- सामाजिक आधार: गांधी ने राष्ट्रवाद को ऐसे मुद्दों से जोड़ा जिन्हें सामान्य लोग समझते थे: नील की जबरन खेती, लगान-राहत, प्लेग भत्ता, नागरिक स्वतंत्रता, नमक कर, वन और चौकीदारी कर, विदेशी कपड़ा, शराब की दुकानें और युद्धकालीन दमन।
- सीमाएं: हर आंदोलन की क्षेत्रीय तीव्रता अलग रही, हिंसा के क्षण आए, अभिजात वर्ग की हिचक रही, सांप्रदायिक जटिलताएं दिखीं, वर्गीय तनाव बने और ब्रिटिश दमन हुआ। स्थानीय कार्रवाई पर गांधी का नियंत्रण कभी पूर्ण नहीं था।
- दोहराने की आदत: हर आंदोलन को पांच बातों से जोड़ें: कारण, कार्यक्रम, नेतृत्व, ब्रिटिश प्रतिक्रिया और रुकने या कमजोर पड़ने का कारण।
- कला और संस्कृति से संबंध: खादी, चरखा, भजन, प्रभात फेरी, राष्ट्रवादी गीत, तिरंगा जुलूस, स्वयंसेवी वर्दियां और विदेशी कपड़े की होली ने संस्कृति को राजनीतिक जुटान का हिस्सा बनाया।
- कालक्रम का आधार: 1917 चंपारण; 1918 अहमदाबाद और खेड़ा; 1919 रॉलेट और जलियांवाला बाग; 1920 असहयोग; 1922 चौरी चौरा; 1930 दांडी; 1931 गांधी-इरविन समझौता और दूसरा गोलमेज सम्मेलन; 1942 भारत छोड़ो।
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स्टडी पैक खोलेंसंभावितसंभावित प्रश्न
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1MCQआरंभिक गांधीवादी सत्याग्रहों पर निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. चंपारण नील किसानों और तिनकठिया व्यवस्था से जुड़ा था। 2. अहमदाबाद फसल खराब होने के बाद लगान-राहत से जुड़ा था। 3. खेड़ा में असमर्थ किसानों द्वारा लगान न देने की बात थी। इन कथनों में कौन-से सही हैं?
व्याख्या
चंपारण नील और तिनकठिया से जुड़ा था; खेड़ा फसल खराब होने के बाद लगान-राहत से जुड़ा था। अहमदाबाद मिल मजदूरों की मजदूरी का विवाद था, लगान का नहीं।
~50 शब्द · 1 अंक
