गरीबी, बेरोज़गारी और असमानता
मुख्य तथ्य
- तेंदुलकर 2009 और रंगराजन 2014 आधुनिक गरीबी-आकलन की मुख्य समितियां हैं।
- अनुच्छेद 38 राज्य से स्थिति, सुविधाओं और अवसरों की असमानताएं घटाने को कहता है।
- अनुच्छेद 21 न्यायिक फैसलों में आजीविका, भोजन और आश्रय जैसे गरिमा-आधारित दावों को सहारा देता है।
मुख्य बिंदु
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गरीबी, बेरोज़गारी और असमानता जुड़ी हुई हैं, पर अलग-अलग संकेतकों से मापी जाती हैं।
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तेंदुलकर 2009 और रंगराजन 2014 आधुनिक गरीबी-आकलन की मुख्य समितियां हैं।
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आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण की बेरोज़गारी दर में आधार श्रम-बल होता है, कुल आबादी नहीं।
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अनुच्छेद 38 राज्य से स्थिति, सुविधाओं और अवसरों की असमानताएं घटाने को कहता है।
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MGNREGA ग्रामीण, परिवार-आधारित और मांग-आधारित है; यह स्थायी नौकरी की गारंटी नहीं।
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उपभोग गिनी, आय केंद्रीकरण और संपत्ति केंद्रीकरण को एक संकेतक न मानें।
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अनुच्छेद 21 न्यायिक फैसलों में आजीविका, भोजन और आश्रय जैसे गरिमा-आधारित दावों को सहारा देता है।
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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, RTE, वेतन संहिता और DBT तंत्र कल्याण अधिकारों को सेवाएं पहुंचाने की सीमाओं से जोड़ते हैं।
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अवधारणा और संवैधानिक ढांचा
गरीबी, बेरोज़गारी और असमानता को अलग-अलग रटने से प्रारंभिक परीक्षा में गलती होती है। सवाल गरीबी रेखा से शुरू होकर श्रम-बल की परिभाषा और सामाजिक क्षेत्र के कानून तक जा सकता है।
- मूल अर्थ: गरीबी का मतलब न्यूनतम जीवन-स्तर से नीचे रह जाना है; बेरोज़गारी का मतलब काम चाहने और काम के लिए उपलब्ध होने पर भी काम न मिलना है; असमानता आय, उपभोग, संपत्ति, अवसर या सामाजिक स्थिति के असमान बंटवारे को दिखाती है।
- निरपेक्ष और सापेक्ष गरीबी: भारत में आधिकारिक गरीबी रेखा की परंपरा मुख्यतः उपभोग-आधारित निरपेक्ष सीमा पर रही है, जबकि असमानता का विश्लेषण वितरण और तुलना पर टिकता है। बहुआयामी गरीबी स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर की कमियों को साथ रखती है।
- मापन का फर्क: गरीबी अनुपात सीमा से नीचे लोगों को गिनता है; बेरोज़गारी दर बेरोज़गारों को श्रम-बल के अनुपात में मापती है, कुल आबादी के अनुपात में नहीं; गिनी गुणांक फैलाव बताता है, पर यह नहीं बताता कि लाभ किस समूह को मिला।
- संवैधानिक आधार: यह विषय किसी एक अनुच्छेद में बंद नहीं है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता देता है; अनुच्छेद 15 और 16 भेदभाव तथा सरकारी रोज़गार से जुड़े हैं; अनुच्छेद 21 गरिमा-आधारित कल्याण दावों का आधार बना; अनुच्छेद 38, 39, 41, 42, 43, 46 और 47 सामाजिक-आर्थिक नीति को दिशा देते हैं।
- कानूनी आधार: MGNREGA, 2005 ग्रामीण मज़दूरी-रोज़गार की गारंटी देता है; राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 खाद्य अधिकार देता है; निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 अनुच्छेद 21A को लागू करता है; वेतन संहिता, 2019 न्यूनतम वेतन और समान पारिश्रमिक से जुड़ती है।
- UPSC के लिहाज़ से सावधानी: गरीबी घटने का मतलब यह नहीं कि असमानता भी घट गई। कोई अर्थव्यवस्था चरम गरीबी घटा सकती है, फिर भी शीर्ष समूहों में आय या संपत्ति का केंद्रीकरण बढ़ सकता है।
- संबंध समझें: सतत विकास लक्ष्य 1 गरीबी, लक्ष्य 2 भूख, लक्ष्य 8 अच्छे काम, लक्ष्य 10 असमानता और लक्ष्य 5 लैंगिक समानता से जुड़ता है; भारत पर सवाल इन्हें योजनाओं और संवैधानिक प्रावधानों से मिलाकर पूछता है।
- तीन नीति-प्रश्न: गरीबी नीति पूछती है कि न्यूनतम से नीचे कौन है; रोज़गार नीति पूछती है कि लोग काम से आय कमा पा रहे हैं या नहीं; असमानता नीति पूछती है कि लाभ, संपत्ति और क्षमताएं बहुत असमान तो नहीं बंट रहीं।
- क्षमता दृष्टिकोण: अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण इस अध्याय में उपयोगी है, क्योंकि कमी केवल कम आय नहीं; पढ़ाई, स्वास्थ्य, आवागमन, सुरक्षा और सामाजिक भागीदारी की कमी भी कमी है।
- संवैधानिक सावधानी: मूल अधिकार समानता और गरिमा की रक्षा करते हैं, लेकिन अधिकतर वितरण संबंधी चुनाव कानून, बजट और प्रशासन से लागू होते हैं। हर कल्याण लक्ष्य को तुरंत अदालत में मजबूत व्यक्तिगत दावा न मानें।
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1MCQभारत में गरीबी आकलन पर निम्न कथनों पर विचार करें: 1. अलघ कार्यबल ने गरीबी रेखा को कैलोरी मानकों से जोड़ा। 2. तेंदुलकर समिति ने ग्रामीण 2,400 और शहरी 2,100 कैलोरी मानक को सीधे बनाए रखा। 3. रंगराजन समिति ने व्यापक टोकरी सुझाई और 2011-12 के लिए तेंदुलकर से अधिक गरीबी अनुमान दिया। ऊपर दिए गए कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या
कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है, क्योंकि तेंदुलकर ने सीधे कैलोरी आधार से दूरी बनाई। कथन 3 सही है।
~50 शब्द · 1 अंक
