अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएं: IMF, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक आदि
मुख्य तथ्य
- भारत की IMF और विश्व बैंक भागीदारी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और बैंक अधिनियम, 1945 पर आधारित है।
- अनुच्छेद 253 संसद को संधियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के निर्णय लागू करने के लिए घरेलू कानून बनाने की शक्ति देता है।
- WTO 1995 में शुरू हुआ; उसका अपीलीय निकाय दिसंबर 2019 से प्रभावी अपील-सुनवाई नहीं कर पा रहा।
मुख्य बिंदु
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IMF मौद्रिक स्थिरता की संस्था है; विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक विकास-वित्त संस्थाएं हैं; WTO व्यापार-नियमों की संस्था है।
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भारत की IMF और विश्व बैंक भागीदारी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और बैंक अधिनियम, 1945 पर आधारित है।
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अनुच्छेद 253 संसद को संधियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के निर्णय लागू करने के लिए घरेलू कानून बनाने की शक्ति देता है।
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IMF कोटा अंशदान, मतदान शक्ति, वित्त तक पहुंच और विशेष आहरण अधिकार आवंटन को प्रभावित करता है; यह विदेशी मुद्रा भंडार नहीं है।
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अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक का सदस्य बनने से पहले IMF सदस्यता चाहिए; अंतरराष्ट्रीय विकास संघ, अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम और बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी की सदस्यता अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक सदस्यता पर निर्भर करती है।
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एशियाई विकास बैंक में क्षेत्रीय और गैर-क्षेत्रीय सदस्य हैं; यह एशिया-प्रशांत केंद्रित है, पर स्वामित्व में केवल एशियाई नहीं।
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विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक का परियोजना वित्त IMF के भुगतान संतुलन समर्थन से अलग है।
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WTO 1995 में शुरू हुआ; उसका अपीलीय निकाय दिसंबर 2019 से प्रभावी अपील-सुनवाई नहीं कर पा रहा।
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हाल की सुधार बहस IMF कोटा-हिस्सों के पुनर्संतुलन, बहुपक्षीय विकास बैंक ऋण देने की क्षमता, ऋण-संकट और जलवायु और विकास वित्त पर है।
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अवधारणा, पाठ्यक्रम-दायरा और भारत का कानूनी आधार
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएं वे संधि-आधारित या सरकारों के बीच बनी संस्थागत व्यवस्थाएं हैं जिनके ज़रिए देश मुद्रा, वित्त, व्यापार, विकास-ऋण और सीमा-पार आर्थिक स्थिरता से जुड़े नियम चलाते हैं।
- मुख्य फर्क: IMF का केंद्र मौद्रिक स्थिरता और भुगतान संतुलन की मदद है; विश्व बैंक समूह और एशियाई विकास बैंक विकास-वित्त देते हैं; WTO व्यापार-नियमों की संस्था है; एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक और नया विकास बैंक नए दौर के अवसंरचना ऋणदाता हैं। UPSC नाम से अधिक काम और अधिकार-सीमा पर भ्रम पैदा करता है।
- ब्रेटन वुड्स आधार: IMF और अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक की रूपरेखा जुलाई 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में बनी। IMF और अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक के समझौते 1945 में प्रभावी हुए, इसलिए ये प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की व्यवस्था नहीं, बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की आर्थिक व्यवस्था के अंग हैं।
- भारत का कानूनी आधार: भारत में IMF और विश्व बैंक से जुड़ी सदस्यता और दायित्व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और बैंक अधिनियम, 1945 से लागू हुए। एशियाई विकास बैंक के लिए एशियाई विकास बैंक अधिनियम, 1966 है। एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक के लिए भारत ने समझौते पर हस्ताक्षर और पुष्टि की, और 2017 की अधिसूचना से संयुक्त राष्ट्र विशेषाधिकार और उन्मुक्ति अधिनियम, 1947 के तहत विशेषाधिकार तथा उन्मुक्तियां दी गईं। ये घरेलू कानून और अधिसूचनाएं इसलिए अहम हैं, क्योंकि कोई संधि अपने-आप भारत का राजकोषीय कानून नहीं बन जाती।
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 253 संसद को संधि, समझौते और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के निर्णय लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची के तहत संघ सूची में संघ का सार्वजनिक ऋण, मुद्रा, विदेशी विनिमय, विदेशी ऋण, RBI, बैंकिंग, विदेशी व्यापार और अंतर-राज्यीय व्यापार आते हैं। अनुच्छेद 292 संघ के उधार से और अनुच्छेद 293 राज्यों के उधार तथा संघ की सहमति से जुड़ता है।
- बजट से संबंध: सदस्यता-योगदान, अंशपूंजी, ऋण-प्राप्ति, पुनर्भुगतान और गारंटी अनुच्छेद 112 के बजट, अनुच्छेद 266 की संचित निधि और संसद के वित्तीय नियंत्रण से जुड़ते हैं।
- परीक्षा में सीमा: इन संस्थाओं को संवैधानिक संस्था बताना गलत होगा। ये अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हैं; भारत के भीतर इनकी वैधता संविधान और सक्षम अधिनियमों से आती है।
- सामाजिक विकास से संबंध: इनके ऋण और नीति-सलाह गरीबी, समावेश, अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु-अनुकूलन और राजकोषीय गुंजाइश पर असर डालते हैं। इसलिए यह विषय केवल बाह्य क्षेत्र नहीं, आर्थिक और सामाजिक विकास का भी हिस्सा है।
- संघ सूची की ठोस प्रविष्टियां: प्रविष्टि 35 संघ के सार्वजनिक ऋण से, प्रविष्टि 36 मुद्रा, वैध मुद्रा और विदेशी विनिमय से, प्रविष्टि 37 विदेशी ऋण से, प्रविष्टि 38 RBI से, प्रविष्टि 45 बैंकिंग से और प्रविष्टि 41 विदेशी व्यापार तथा सीमा-शुल्क सीमा से जुड़े व्यापार से संबंधित है। ये प्रविष्टियां बताती हैं कि बाहरी आर्थिक संबंध बिखरी हुई राज्य-स्तरीय व्यवस्थाओं पर नहीं छोड़े गए।
- संधि बनाम कानून: विदेश में समझौते पर हस्ताक्षर अंतरराष्ट्रीय दायित्व बना सकते हैं, लेकिन भारत के भीतर व्यय, उधार, कराधान, खरीद और लेखा-परीक्षा घरेलू कानून से ही चलती है। इसलिए प्रारंभिक परीक्षा उत्तर में यह नहीं कहना चाहिए कि IMF या विश्व बैंक का दस्तावेज़ अपने-आप संसद के अधिनियम जैसा दर्जा पा जाता है।
- संस्थागत व्यक्तित्व: इन संस्थाओं को अपने संस्थापक दस्तावेज़ों के तहत कानूनी व्यक्तित्व और घरेलू क्रियान्वयन कानूनों के तहत कुछ विशेषाधिकार मिल सकते हैं, पर इससे वे भारत के ऊपर संप्रभु नहीं हो जातीं। विशेषाधिकार संस्थागत कामकाज की रक्षा करते हैं; सार्वजनिक धन इस्तेमाल करने वाले भारतीय प्राधिकरणों की संवैधानिक जवाबदेही खत्म नहीं करते।
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स्टडी पैक खोलेंसंभावितसंभावित प्रश्न
अभ्यास में जाने से पहले उत्तर संरचना जाँचने के लिए इन प्रश्नों का उपयोग करें।
1MCQIMF के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. कोटा मतदान शक्ति और विशेष आहरण अधिकार आवंटन को प्रभावित करता है। 2. अनुच्छेद 4 परामर्श IMF निगरानी का हिस्सा है। 3. IMF परियोजना ऋण सामान्यतः सड़क और शहरी जलापूर्ति को वित्त देते हैं। कौन-से कथन सही हैं?
व्याख्या
कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 बहुपक्षीय विकास बैंक के परियोजना ऋण जैसा है, IMF की सामान्य भूमिका नहीं।
~50 शब्द · 1 अंक
