समावेशी वृद्धि और सामाजिक क्षेत्र की पहलें
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 38, 39, 39A, 41, 42, 45 और 47 सामाजिक क्षेत्र नीति की नीति-निदेशक रीढ़ हैं।
- अनुच्छेद 21 पर आए न्यायिक फैसले आजीविका, स्वास्थ्य, भोजन और गरिमा को संवैधानिक समावेशन से जोड़ते हैं।
- नीति आयोग ने अनुमान दिया कि 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए।
मुख्य बिंदु
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समावेशी वृद्धि GDP विस्तार को रोज़गार, पुनर्वितरण, सेवाओं और गरिमा से जोड़ती है, केवल कल्याण-खर्च से नहीं।
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अनुच्छेद 38, 39, 39A, 41, 42, 45 और 47 सामाजिक क्षेत्र नीति की नीति-निदेशक रीढ़ हैं।
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MGNREGA, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और RTE वैधानिक हक के मॉडल हैं, जिनमें सामान्य योजनाओं से अधिक जवाबदेही है।
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अनुच्छेद 21 पर आए न्यायिक फैसले आजीविका, स्वास्थ्य, भोजन और गरिमा को संवैधानिक समावेशन से जोड़ते हैं।
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DBT और जन-धन-आधार-मोबाइल लक्ष्यीकरण तभी सुधारते हैं जब बैंकिंग पहुंच, अभिलेख, वैकल्पिक व्यवस्था और शिकायत-तंत्र काम करें।
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नीति आयोग ने अनुमान दिया कि 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए।
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सामाजिक क्षेत्र के नतीजों में केवल कवरेज नहीं, गुणवत्ता अहम है: सीखना, पोषण, इलाज और समय पर लाभ मायने रखते हैं।
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सार्वभौमिकता-लक्ष्यीकरण, नकद-वस्तु और राजकोषीय टिकाऊपन UPSC की बार-बार आने वाली बहसें हैं।
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अर्थ, संवैधानिक आधार और परीक्षा-दायरा
- मुख्य अर्थ: समावेशी वृद्धि वह आर्थिक वृद्धि है जिसमें अवसर और लाभ गरीब परिवारों, महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अल्पसंख्यकों, दिव्यांग व्यक्तियों, अनौपचारिक कामगारों, छोटे किसानों, प्रवासियों और पीछे छूटे क्षेत्रों तक पहुंचें। यह केवल कल्याण-खर्च का दूसरा नाम नहीं; इसमें उत्पादन, रोज़गार, पुनर्वितरण और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच साथ-साथ आते हैं।
- वृद्धि और विकास का फर्क: वृद्धि यह देखती है कि GDP, आय, उत्पादन और उत्पादकता बढ़ रही है या नहीं। विकास यह देखता है कि स्वास्थ्य, शिक्षा, गरिमा, सुरक्षा, सामाजिक गतिशीलता और मोलभाव की क्षमता सुधर रही है या नहीं। इसलिए कोई कथन अगर GDP वृद्धि को ही समावेशी वृद्धि मान ले, तो वह अधूरा है।
- समावेशन का संवैधानिक आधार: उद्देशिका में न्याय, समता और गरिमा का विचार व्यापक आधार देता है। अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण को सहारा देता है। अनुच्छेद 15(3), 15(4), 15(5) और 15(6) जैसे प्रावधान महिलाओं, बच्चों, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और EWS समूहों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देते हैं। अनुच्छेद 16 लोक-नियोजन में अवसर की समता और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व वाले पिछड़े वर्गों के आरक्षण से जुड़ता है।
- अनुच्छेद 21 का सेतु: उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 में गरिमा के साथ जीवन को पढ़ा है। कई कल्याणकारी अधिकारों को इस विचार से बल मिलता है, भले उनका ठोस ढांचा कानूनों या योजनाओं से आता हो। ओल्गा टेलिस, 1985 ने आजीविका को जीवन से जोड़ा; पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति, 1996 ने आपात चिकित्सा सहायता को अनुच्छेद 21 से जोड़ा; 2001 से चले भोजन-अधिकार मुकदमे ने पोषण-संबंधी हकों को प्रवर्तनीय सार्वजनिक कर्तव्यों के करीब लाया।
- नीति-निदेशक तत्वों की रीढ़: अनुच्छेद 38 राज्य से लोक-कल्याण बढ़ाने और आय, दर्जे, सुविधाओं तथा अवसरों की असमानता घटाने को कहता है। अनुच्छेद 39 आजीविका, संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे, धन-संकेंद्रण की रोक, समान वेतन और बाल-सुरक्षा से जुड़ता है। अनुच्छेद 39A कानूनी सहायता को आधार देता है। अनुच्छेद 41 आर्थिक क्षमता की सीमा में काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता की बात करता है। अनुच्छेद 42, 45 और 47 मानवीय काम-परिस्थिति, बचपन की देखभाल और पोषण-जनस्वास्थ्य से जुड़े हैं।
- अनुसूचियां और संघीय ढांचा: सातवीं अनुसूची इसलिए अहम है क्योंकि स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम, स्थानीय शासन, कृषि और कल्याण में केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर की भूमिकाएं जुड़ती हैं। ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूची गरीबी-उन्मूलन, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, स्वच्छता, सड़क, झुग्गी-सुधार और शहरी योजना जैसे काम पंचायतों और नगरपालिकाओं के नज़दीक रखती हैं।
- UPSC के लिए सावधानी: समावेशी वृद्धि कोई एक कानून, एक मंत्रालय या एक सूचकांक नहीं है। यह अधिकारों, योजनाओं, राजकोषीय हस्तांतरण, सामाजिक क्षेत्र खर्च, बाज़ार तक पहुंच, जनसांख्यिकीय बदलाव और जवाबदेह क्रियान्वयन को जोड़ने वाला ढांचा है।
- संशोधन याद रखें: 42वें संशोधन, 1976 ने अनुच्छेद 39A जोड़कर और अनुच्छेद 39 के कुछ हिस्सों को बदलकर नीति-निदेशक तत्वों को मज़बूत किया। 44वें संशोधन, 1978 ने संपत्ति को भाग 3 से हटाकर अनुच्छेद 300A में रखा। इससे पुनर्वितरण और भूमि-सुधार को अब सरल संपत्ति-बनाम-कल्याण संघर्ष की तरह नहीं पढ़ा जाता।
- मूल ढांचा सावधानी: कल्याणकारी कानून समता और वितरण-न्याय को आगे बढ़ा सकते हैं, पर वे संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही काम करते हैं। केशवानंद भारती, 1973 और कोएल्हो निर्णय, 2007 के बाद नवीं अनुसूची जैसे संरक्षण साधन भी पूर्ण कवच नहीं माने जा सकते, यदि मूल ढांचे को नुकसान दिखे।
- कानूनी आधार की जांच: हमेशा पहचानें कि दावा मूल अधिकार, नीति-निदेशक तत्व, कानून, योजना-दिशा-निर्देश या बजट घोषणा से आ रहा है।
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1MCQसमावेशी वृद्धि के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. इसका संबंध केवल GDP वृद्धि हो जाने के बाद पुनर्वितरण से है। 2. इसमें उत्पादक रोज़गार और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच शामिल है। 3. इसमें सार्वभौमिक न्यूनतम आधार और लक्षित सहायता, दोनों की ज़रूरत हो सकती है। इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
व्याख्या
कथन 1 बहुत संकीर्ण है, क्योंकि समावेशी वृद्धि की प्रक्रिया में भागीदारी से भी जुड़ी है। कथन 2 और 3 रोज़गार, सेवाओं और मिश्रित नीति-रचना को सही पकड़ते हैं।
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