मुख्य तथ्य

  • शिक्षण-अधिगम सामग्री सजावट नहीं है। उसे राजनीति विज्ञान के साफ़ सीखने के लक्ष्य को पूरा करना चाहिए और विद्यार्थियों से बौद्धिक काम कराना चाहिए।
  • राजनीति विज्ञान की सामग्री में सत्ता, अधिकार, प्रतिनिधित्व, न्याय और नागरिकता जैसी अवधारणाओं को संस्थाओं, प्रमाणों और सार्वजनिक जीवन के अनुभवों से जोड...
  • पाठ्यपुस्तक कई साधनों में से एक है। संविधान का पाठ, कानून, न्यायिक निर्णय, चुनावी आँकड़े, मानचित्र, घोषणापत्र, भाषण, कार्टून, समाचार और स्थानीय रिकॉर्...
  • सामग्री चुनते समय शुद्धता, स्रोत, उम्र के अनुसार उपयुक्तता, सुगम्यता, भाषा, संतुलित प्रतिनिधित्व, लागत और पक्षपाती प्रचार के खतरे को देखना ज़रूरी है।
  • सहयोगात्मक अधिगम व्यवस्थित समूह-अधिगम है। केवल विद्यार्थियों को साथ बैठाना या लिखित काम बाँट देना सहयोगात्मक अधिगम नहीं है।

मुख्य बिंदु

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    शिक्षण-अधिगम सामग्री सजावट नहीं है। उसे राजनीति विज्ञान के साफ़ सीखने के लक्ष्य को पूरा करना चाहिए और विद्यार्थियों से बौद्धिक काम कराना चाहिए।

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    राजनीति विज्ञान की सामग्री में सत्ता, अधिकार, प्रतिनिधित्व, न्याय और नागरिकता जैसी अवधारणाओं को संस्थाओं, प्रमाणों और सार्वजनिक जीवन के अनुभवों से जोड़ना चाहिए।

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    पाठ्यपुस्तक कई साधनों में से एक है। संविधान का पाठ, कानून, न्यायिक निर्णय, चुनावी आँकड़े, मानचित्र, घोषणापत्र, भाषण, कार्टून, समाचार और स्थानीय रिकॉर्ड अलग-अलग ढंग से पढ़े जाते हैं।

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    सामग्री चुनते समय शुद्धता, स्रोत, उम्र के अनुसार उपयुक्तता, सुगम्यता, भाषा, संतुलित प्रतिनिधित्व, लागत और पक्षपाती प्रचार के खतरे को देखना ज़रूरी है।

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    सहयोगात्मक अधिगम व्यवस्थित समूह-अधिगम है। केवल विद्यार्थियों को साथ बैठाना या लिखित काम बाँट देना सहयोगात्मक अधिगम नहीं है।

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    इसके मुख्य तत्व सकारात्मक परस्पर निर्भरता, परस्पर सहायक संवाद, व्यक्तिगत जवाबदेही, आपसी और छोटे समूह में काम करने के कौशल तथा समूह-कार्य की समीक्षा हैं।

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    सोचो-जोड़ो-साझा करो, जिगसॉ, व्यवस्थित अकादमिक विवाद, समूह-जाँच और सार्वजनिक संस्थाओं का सिमुलेशन राजनीति विज्ञान के अलग-अलग लक्ष्यों के लिए उपयोगी हैं।

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    सहयोग और प्रतिस्पर्धा साथ हो सकते हैं, लेकिन पुरस्कार की बनावट ऐसी न हो कि तेज विद्यार्थी पूरा बोझ उठाए या कोई सदस्य बिना योगदान के लाभ ले।

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    सवाल तय करने, प्रमाण चुनने, भूमिकाएँ बनाने, चर्चा के नियम सिखाने, समूह के सत्ता-संबंधों पर नजर रखने और तथ्यगत गलती सुधारने की जिम्मेदारी शिक्षक की रहती है।

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    मिश्रित समूह अलग नजरियों को सामने ला सकते हैं, फिर भी स्थायी लेबल, केवल दिखावे का प्रतिनिधित्व, हावी वक्ता, भाषा की ऊँच-नीच और असमान डिजिटल पहुँच पर सक्रिय काम ज़रूरी है।

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    आकलन में समूह के साझा काम के साथ हर विद्यार्थी का अलग प्रमाण भी होना चाहिए, जैसे अंतिम संक्षिप्त उत्तर, मौखिक सवाल, आत्मचिंतन, स्रोत-विवरण या छोटी क्विज़।

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    अच्छा परीक्षा-उत्तर केवल शिक्षण-सहायक सामग्री या तकनीकों की सूची नहीं देता। वह सामग्री, पद्धति, उद्देश्य, कक्षा-प्रक्रिया, आकलन, समावेशन और सीमाओं को जोड़ता है।

अर्थ, दायरा और राजनीति विज्ञान का संदर्भ

शिक्षण-अधिगम सामग्री का अर्थ ऐसे किसी भी साधन से है, जिसे सोच-समझकर चुना या बनाया गया हो और जिसकी मदद से विद्यार्थी ज्ञान से जुड़ें, उसे देखें, समझाएँ, जाँचें, उस पर चर्चा करें या उसे लागू करें। इसका दायरा केवल शिक्षण-सहायक सामग्री तक सीमित नहीं है। कोई सहायक साधन शिक्षक को समझाने में मदद कर सकता है, लेकिन अधिगम सामग्री विद्यार्थी से भी कुछ बौद्धिक काम कराती है। संविधान का अनुच्छेद, निर्वाचन-क्षेत्र का मानचित्र, चुनाव परिणाम, न्यायिक निर्णय, राजनीतिक कार्टून, रिकॉर्ड किया गया भाषण, भूमिका-कार्ड और अवधारणा-मानचित्र तभी सामग्री बनते हैं जब वे सीखने के लक्ष्य से जुड़े हों। लक्ष्य न हो तो आकर्षक पोस्टर भी केवल सजावट रह जाता है।

राजनीति विज्ञान की अपनी खास ज़रूरतें हैं। इसकी अवधारणाएँ अमूर्त हैं, पर उनका अनुभव सार्वजनिक जीवन में होता है। स्वतंत्रता, समानता, प्राधिकार, प्रतिनिधित्व, वैधता, पंथनिरपेक्षता, संघवाद और न्याय को केवल परिभाषाओं से ठीक से नहीं पढ़ाया जा सकता। विद्यार्थी को देखना होता है कि कोई अवधारणा संस्था, नियम, विवाद, प्रमाण और अलग-अलग तर्कों में कैसे दिखाई देती है। सामग्री कम से कम 4 काम करती है। वह अमूर्त बात को ठोस बनाती है, जाँच के लिए प्रमाण देती है, कक्षा में कई नज़रिए लाती है और अनुशासित चर्चा के लिए साझा आधार देती है। मानचित्र क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व दिखा सकता है, पर जनसंख्या का फर्क छिपा भी सकता है। भाषण किसी राजनीतिक पक्ष को सामने लाता है, लेकिन उसके हर दावे को अपने-आप सच नहीं बना देता।

सहयोगात्मक अधिगम ऐसी व्यवस्थित शिक्षण-संरचना है, जिसमें विद्यार्थी छोटे समूहों में साझा लक्ष्य के लिए काम करते हैं और हर सदस्य अपनी सीख के लिए जवाबदेह रहता है। यह खुली बातचीत भर नहीं है। यह ऐसा काम-विभाजन भी नहीं है, जिसमें एक विद्यार्थी लिखे और बाकी नकल करें। इसका असली महत्व तर्क को सबके सामने लाने में है। विद्यार्थी विचार समझाते हैं, आपत्ति सुनते हैं, प्रमाण जाँचते हैं, दावा सुधारते हैं और साथियों को समझने में मदद करते हैं। राजनीति विज्ञान में यह लोकतांत्रिक आदतों का अभ्यास भी बनता है। विद्यार्थी निर्णय-क्षमता छोड़े बिना सुनना, अपमान किए बिना असहमति रखना, कारण देना, नियम मानना और अल्पमत की बात की रक्षा करना सीखते हैं।

विषय के दोनों हिस्से एक-दूसरे को मजबूत करते हैं। अच्छी सामग्री समूह को जाँचने के लिए ठोस आधार देती है। अच्छी सहयोगात्मक संरचना विद्यार्थियों को सामग्री का निष्क्रिय उपभोक्ता बनने से रोकती है। फिर भी दोनों अपने-आप सीखने की गारंटी नहीं देते। पक्षपाती सामग्री पूर्वाग्रह को व्यवस्थित कर सकती है और बिना नियम का समूह कक्षा की ऊँच-नीच दोहरा सकता है। इसलिए शिक्षक को लक्ष्य, सामग्री, काम, समूह-संरचना, संवाद, आकलन और समीक्षा को एक सीध में रखना होता है। यही इस पूरे विषय का केंद्रीय सिद्धांत है।

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