कक्षा-संचार, अग्रिम संगठन, खोज-प्रशिक्षण, समूह अन्वेषण और गैर-निर्देशात्मक प्रतिमान
मुख्य तथ्य
- कक्षा-संचार मौखिक, अमौखिक और माध्यम से दिए संदेशों, फीडबैक, संदर्भ तथा बाधाओं के बीच अर्थ बनाने की योजनाबद्ध और दोतरफा प्रक्रिया है;
- शिक्षण प्रतिमान की पहचान उसके केंद्र, चरण-क्रम, सामाजिक व्यवस्था, प्रतिक्रिया के सिद्धांत, सहायक व्यवस्था तथा प्रत्यक्ष शिक्षण प्रभाव और सहवर्ती प्रभा...
- कोई प्रतिमान हर स्थिति में सर्वोत्तम नहीं होता; चयन सीखने के लक्ष्य, विषय-वस्तु की बनावट, विद्यार्थियों के पहले के ज्ञान, उपलब्ध समय और संसाधनों तथा श...
- डेविड ऑसुबेल का अग्रिम संगठन विस्तृत विषय-वस्तु से पहले व्यापक वैचारिक सेतु देकर अर्थपूर्ण ग्रहण अधिगम में मदद करता है;
- व्याख्यात्मक संगठन काफी अपरिचित विषय के लिए व्यापक ढाँचा देता है, जबकि तुलनात्मक संगठन पहले के उपयोगी ज्ञान को सक्रिय करके समानताएँ और अंतर साफ करता ह...
मुख्य बिंदु
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कक्षा-संचार मौखिक, अमौखिक और माध्यम से दिए संदेशों, फीडबैक, संदर्भ तथा बाधाओं के बीच अर्थ बनाने की योजनाबद्ध और दोतरफा प्रक्रिया है; यह केवल शिक्षक द्वारा सूचना देना नहीं है।
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शिक्षण प्रतिमान की पहचान उसके केंद्र, चरण-क्रम, सामाजिक व्यवस्था, प्रतिक्रिया के सिद्धांत, सहायक व्यवस्था तथा प्रत्यक्ष शिक्षण प्रभाव और सहवर्ती प्रभाव से होती है; कोई अकेली विधि या गतिविधि अपने-आप प्रतिमान नहीं बनती।
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कोई प्रतिमान हर स्थिति में सर्वोत्तम नहीं होता; चयन सीखने के लक्ष्य, विषय-वस्तु की बनावट, विद्यार्थियों के पहले के ज्ञान, उपलब्ध समय और संसाधनों तथा शिक्षक के ढाँचे और विद्यार्थी की पहल के अपेक्षित संतुलन से होना चाहिए।
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डेविड ऑसुबेल का अग्रिम संगठन विस्तृत विषय-वस्तु से पहले व्यापक वैचारिक सेतु देकर अर्थपूर्ण ग्रहण अधिगम में मदद करता है; यह सारांश से अलग है क्योंकि यह पहले आता, अधिक सामान्य होता और संबंध स्पष्ट करता है।
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व्याख्यात्मक संगठन काफी अपरिचित विषय के लिए व्यापक ढाँचा देता है, जबकि तुलनात्मक संगठन पहले के उपयोगी ज्ञान को सक्रिय करके समानताएँ और अंतर साफ करता है।
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रिचर्ड सचमैन का खोज-प्रशिक्षण एक उलझाने वाली घटना से शुरू होकर सत्यापन, प्रयोग, व्याख्या और खोज-प्रक्रिया के विश्लेषण तक जाता है; अनुशासित सवाल और बदली जा सकने वाली परिकल्पनाएँ इसके केंद्र में हैं।
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खोज-प्रशिक्षण के लिए ऐसा माहौल चाहिए जहाँ सवालों पर ज़रूरी सूचना मिले, प्रमाण उपलब्ध हों और शिक्षक संयम रखे; फिर भी यह क्रमबद्ध खोज है, बिना मार्गदर्शन की खोज नहीं।
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हर्बर्ट थेलन से जुड़ा और श्लोमो तथा याएल शरण द्वारा कक्षा के लिए विकसित समूह अन्वेषण लोकतांत्रिक समस्या-चयन, सहयोगी जाँच, जिम्मेदारी के बँटवारे, निष्कर्षों के मेल, प्रस्तुति और मूल्यांकन को जोड़ता है।
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समूह कार्य तभी समूह अन्वेषण बनता है जब विद्यार्थियों में वास्तविक बौद्धिक परस्पर निर्भरता, व्यक्तिगत जवाबदेही, साझा योजना और निष्कर्षों का मेल हो; केवल साथ बैठना या असंबंधित काम बाँटना पर्याप्त नहीं है।
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कार्ल रोजर्स का गैर-निर्देशात्मक प्रतिमान संवेदनशील सुनने, स्वीकार, स्पष्टीकरण और भावनाओं को वापस स्पष्ट करने से विद्यार्थी को व्यक्त भावनाओं से समझ, स्वयं चुनी कार्रवाई और एकीकरण तक ले जाता है; इसका अर्थ शिक्षक की गैर-मौजूदगी नहीं है।
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अग्रिम संगठन में शिक्षक का ढाँचा सबसे अधिक रहता है, खोज-प्रशिक्षण में प्रक्रिया का नियंत्रण साझा होता है, समूह अन्वेषण में योजना समूह की ओर जाती है और गैर-निर्देशात्मक शिक्षण में लक्ष्य तथा कार्रवाई पर विद्यार्थी का नियंत्रण सबसे अधिक होता है।
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राजनीति विज्ञान के अच्छे पाठ में प्रतिमानों को सोच-समझकर जोड़ा जा सकता है, पर उनकी अलग तर्क-प्रणाली नहीं मिटानी चाहिए; वैचारिक ढाँचा, अनुशासित कारण-खोज, लोकतांत्रिक सामूहिक शोध और निजी मनन अलग उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं।
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मूल्यांकन प्रतिमान के अनुरूप होना चाहिए: अग्रिम संगठन के लिए अवधारणा-मानचित्र और नए संदर्भ में प्रयोग, खोज-प्रशिक्षण के लिए सवाल तथा प्रमाण दर्ज करना, समूह अन्वेषण के लिए परिणाम और प्रक्रिया दोनों की कसौटी तथा गैर-निर्देशात्मक शिक्षण के लिए चिंतनशील स्व-मूल्यांकन।
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परीक्षा उत्तर में हर प्रतिमान की तुलना प्रवर्तक, परिवार, केंद्र, चरण-क्रम, सामाजिक व्यवस्था, शिक्षक की प्रतिक्रिया, सहायक व्यवस्था, उपयोग, गुण और सीमाओं के आधार पर करनी चाहिए तथा यह भ्रम नहीं रखना चाहिए कि कोई प्रतिमान शिक्षक की योजना को समाप्त कर देता है।
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कक्षा-संचार और शिक्षण प्रतिमान की समझ
कक्षा-संचार वह व्यवस्थित प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी अर्थ बनाते, बाँटते और जाँचते हैं। इसके घटक हैं संदेश देने वाला, अपेक्षित अर्थ, अर्थ को संकेतों में ढालना, मौखिक, अमौखिक या किसी माध्यम से दिया संदेश, माध्यम, ग्रहण करने वाला, संकेतों का अर्थ निकालना, फीडबैक और संदर्भ। अर्थ बिगाड़ने वाली हर चीज बाधा है, जैसे बाहर का शोर, अनजाना शब्द, मज़ाक उड़ाए जाने का डर, अस्पष्ट चार्ट, सांस्कृतिक मान्यता या बहुत अधिक सूचना। इसलिए संचार केवल शिक्षक के बोल देने से सफल नहीं होता। सफलता तब है जब विद्यार्थी विचार को समझें, उस पर सवाल करें, उसका उपयोग करें और उत्तर दें। फीडबैक प्रक्रिया को पूरा करता है। उलझा चेहरा, उत्तर, विरोधी उदाहरण, छोटी लिखित प्रतिक्रिया या अवधारणा-मानचित्र शिक्षक को बताता है कि आगे बढ़ना है, बात दूसरे ढंग से रखनी है या नया उदाहरण देना है।
संचार शिक्षक से पूरी कक्षा, शिक्षक से एक विद्यार्थी, विद्यार्थी से शिक्षक या विद्यार्थियों के बीच हो सकता है। वह मौखिक, लिखित, दृश्य, हाव-भाव वाला या डिजिटल माध्यम से हो सकता है। राजनीति विज्ञान का शिक्षक संप्रभुता समझाते समय थोड़ी व्याख्या कर सकता है, संबंधों का मानचित्र बना सकता है, परिभाषा पर आपत्ति बुला सकता है और समूहों से उदाहरणों का वर्गीकरण करा सकता है। हर रूप का अपना काम है। संवाद के बिना साफ व्याख्या शब्द तो पहुँचा सकती है, पर गलत समझ छिपी रह सकती है। बिना नियंत्रण की चर्चा भागीदारी तो बढ़ा सकती है, पर अवधारणा आगे नहीं बढ़ाती। उपयोगी संचार में स्पष्टता, सुरक्षित माहौल, बोलने का समान अवसर, ध्यान से सुनना, गहराई वाले सवाल और प्रमाण के आधार पर उत्तर शामिल होते हैं। शब्द और अमौखिक व्यवहार में मेल भी ज़रूरी है। असहमति बुलाने के बाद उसका मज़ाक उड़ाया जाए तो निमंत्रण बेकार हो जाता है।
शिक्षण प्रतिमान किसी एक तकनीक से बड़ा है। यह सीखने का वातावरण बनाने की सिद्धांत-आधारित योजना है। उसका केंद्र बताता है कि कैसी सीख अपेक्षित है। चरण-क्रम गतिविधियों का क्रम देता है। सामाजिक व्यवस्था अधिकार और पहल बाँटती है। प्रतिक्रिया के सिद्धांत बताते हैं कि शिक्षक कैसे उत्तर देगा। सहायक व्यवस्था ज़रूरी सामग्री और परिस्थितियाँ बताती है। प्रत्यक्ष शिक्षण प्रभाव नियोजित परिणाम हैं, जबकि आत्मविश्वास, सहयोग या अनिश्चितता सहने जैसे सहवर्ती प्रभाव साथ में विकसित हो सकते हैं। व्याख्यान, सवाल और समूह कार्य कई प्रतिमानों में आ सकते हैं; केवल उनकी मौजूदगी किसी प्रतिमान की पहचान नहीं है।
हर प्रतिमान में संचार रहता है, पर उसका रूप बदलता है। अग्रिम संगठन में शिक्षक आरंभ में अर्थ को ढाँचा देता और वैचारिक संबंध जाँचता है। खोज-प्रशिक्षण में शिक्षक सवाल और प्रमाण की अनुशासित बातचीत बचाए रखता है। समूह अन्वेषण में संचार योजना, बातचीत, साथी को समझाने और निष्कर्ष जोड़ने का रूप लेता है। गैर-निर्देशात्मक शिक्षण में ध्यान से सुनना और भावना को स्पष्ट करके लौटाना विद्यार्थी को अपना अनुभव समझने में मदद देता है। इसलिए मुख्य परीक्षा-बिंदु केवल शिक्षक-केंद्रित या विद्यार्थी-केंद्रित का नारा नहीं, बल्कि तय उद्देश्य के लिए संचार, बौद्धिक काम और जिम्मेदारी का बँटवारा है।
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