मुख्य तथ्य

  • संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्य और 6 प्रमुख अंग हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्य गैर-प्रक्रियात्मक फैसलों पर वीटो लगा सकते हैं।
  • यूरोपीय संघ गहरे क्षेत्रीय एकीकरण का उदाहरण है: इसमें 27 सदस्य, बाध्यकारी कानून, साझा संस्थाएं और 21 देशों वाला यूरो क्षेत्र है।
  • G7 सात उन्नत औद्योगिक लोकतंत्रों का अनौपचारिक मंच है जिसमें यूरोपीय संघ भी भाग लेता है, जबकि G20 में 19 देश, यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ शामिल हैं।
  • NATO में 32 सहयोगी देश हैं, फैसले आम सहमति से होते हैं और उत्तर अटलांटिक संधि राजनीतिक परामर्श को सामूहिक रक्षा से जोड़ती है।
  • BRICS ग्लोबल साउथ के 11 पूर्ण सदस्यों का अनौपचारिक तालमेल मंच है, जिसका एजेंडा राजनीति, वित्त, विकास और लोगों के बीच सहयोग तक फैला है।

मुख्य बिंदु

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    अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं संधि से बने कानूनी निकायों से लेकर ऐसे अनौपचारिक समूहों तक फैली हैं जिनका असर मुख्यतः राजनीतिक तालमेल पर टिका होता है।

  2. 2

    उदार संस्थावाद सहयोग, सूचना और नियमों पर ज़ोर देता है; यथार्थवाद शक्ति और राष्ट्रीय हित पर; आलोचनात्मक नजरिया पूछता है कि संस्थाएं किसकी पसंद को आगे बढ़ाती हैं।

  3. 3

    संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्य और 6 प्रमुख अंग हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्य गैर-प्रक्रियात्मक फैसलों पर वीटो लगा सकते हैं।

  4. 4

    यूरोपीय संघ गहरे क्षेत्रीय एकीकरण का उदाहरण है: इसमें 27 सदस्य, बाध्यकारी कानून, साझा संस्थाएं और 21 देशों वाला यूरो क्षेत्र है।

  5. 5

    G7 सात उन्नत औद्योगिक लोकतंत्रों का अनौपचारिक मंच है जिसमें यूरोपीय संघ भी भाग लेता है, जबकि G20 में 19 देश, यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ शामिल हैं।

  6. 6

    NATO में 32 सहयोगी देश हैं, फैसले आम सहमति से होते हैं और उत्तर अटलांटिक संधि राजनीतिक परामर्श को सामूहिक रक्षा से जोड़ती है।

  7. 7

    BRICS ग्लोबल साउथ के 11 पूर्ण सदस्यों का अनौपचारिक तालमेल मंच है, जिसका एजेंडा राजनीति, वित्त, विकास और लोगों के बीच सहयोग तक फैला है।

  8. 8

    WTO में 166 सदस्य हैं, फैसले आमतौर पर आम सहमति से होते हैं और इसके समझौते गैर-भेदभाव तथा सदस्य-चालित विवाद प्रक्रिया से व्यापार को नियमबद्ध करते हैं।

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    विश्व बैंक का सही अर्थ आईबीआरडी और आईडीए है, जबकि व्यापक विश्व बैंक समूह में आईएफसी, एमआईजीए और आईसीएसआईडी भी शामिल हैं।

  10. 10

    फैसला लेने के नियम बहुत मायने रखते हैं: एक देश-एक मत, वीटो, आम सहमति, योग्य बहुमत और पूंजी से जुड़ा भारित मतदान प्रभाव को अलग-अलग तरह से बांटते हैं।

  11. 11

    भारत सार्वभौमिक संस्थाओं में आवाज और सुधार, व्यापार व विकास वित्त में नीतिगत गुंजाइश, तथा G20 और BRICS में लचीली साझेदारी चाहता है।

  12. 12

    किसी संस्था को केवल सफल या असफल कहना ठीक नहीं; उसका प्रदर्शन अधिदेश, सदस्य सहमति, संसाधन, पालन और वैधता के अनुसार बदलता है।

अंतरराष्ट्रीय संगठन, संस्था और समूह: समझने का ढांचा

अंतरराष्ट्रीय संस्था देशों द्वारा बनाई गई एक लगातार चलने वाली व्यवस्था है। आमतौर पर उसकी स्थापना संधि से होती है और उसके अंग, प्रक्रियाएं तथा उद्देश्य तय होते हैं। संयुक्त राष्ट्र, NATO और WTO इस मूल अर्थ में आते हैं, हालांकि इनके काम बहुत अलग हैं। यूरोपीय संघ इससे आगे जाता है, क्योंकि उसके सदस्य देशों ने कानून बनाने, न्यायिक निगरानी और मुद्रा से जुड़े कुछ अधिकार साझा संस्थाओं को दिए हैं। G7, G20 और BRICS को समूह या मंच कहना अधिक सही है। उनकी नियमित बैठकें होती हैं और वे देशों की अपेक्षाओं को दिशा देते हैं, पर उनके राजनीतिक घोषणापत्र आमतौर पर संधि-कानून की तरह लागू नहीं होते। विश्व बैंक संधि से बनी वित्तीय संस्था है, जिसमें सदस्य देश शेयरधारक भी हैं।

तीन फर्क साफ रखना ज़रूरी है। पहला, सदस्यता और अधिकार एक बात नहीं हैं। लगभग सार्वभौमिक संस्था के पास कमजोर प्रवर्तन हो सकता है, जबकि छोटा क्षेत्रीय संगठन अपने सदस्यों पर सीधे लागू होने वाले नियम बना सकता है। दूसरा, अधिदेश बताता है कि संस्था कौन-सा काम उचित रूप से कर सकती है। सामूहिक सुरक्षा, सामूहिक रक्षा, व्यापार नियम, आर्थिक तालमेल और विकास वित्त को एक नहीं समझना चाहिए। तीसरा, फैसला लेने का नियम तय करता है कि अलग हित किसी नतीजे में कैसे बदलेंगे। संयुक्त राष्ट्र महासभा में मोटे तौर पर एक देश-एक मत है; सुरक्षा परिषद में बहुमत के साथ स्थायी सदस्यों का वीटो है; NATO, WTO, G7, G20 और BRICS काफी हद तक आम सहमति पर चलते हैं; यूरोपीय संघ में योग्य बहुमत सहित कई तरीके हैं; और विश्व बैंक में मत-शक्ति का बड़ा हिस्सा शेयरों से जुड़ा है।

उदार संस्थावाद के अनुसार संस्थाएं अनिश्चितता घटाती हैं, सूचना देती हैं, सौदे की लागत कम करती हैं और बार-बार सहयोग संभव बनाती हैं। प्रकार्यवाद मानता है कि तकनीकी क्षेत्र में सहयोग पास के क्षेत्रों में भी सहयोग का दबाव बनाता है; यूरोपीय एकीकरण इसका जाना-पहचाना उदाहरण है। यथार्थवादी कहते हैं कि संस्थाएं शक्ति-वितरण को दिखाती हैं और तभी असरदार रहती हैं जब बड़े देश उन्हें उपयोगी मानते हैं। इस नज़रिए से सुरक्षा परिषद का वीटो, NATO की सैन्य क्षमता और वित्तीय संस्थाओं का असमान मतदान शक्ति की अभिव्यक्ति हैं। रचनावादी जोड़ते हैं कि संस्थाएं पहचान और उचित आचरण के मानक भी गढ़ती हैं। मानवाधिकार, गैर-भेदभाव और सामूहिक रक्षा जैसे विचार सरकारों की वैधता की भाषा बदलते हैं। मार्क्सवादी, निर्भरता और उत्तर-औपनिवेशिक नज़रिए असमान विनिमय, कर्जदाता प्रभाव और ग्लोबल साउथ के कम प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाते हैं।

अच्छे उत्तर में हर मामले पर एक ही सिद्धांत नहीं थोपना चाहिए। संस्थाएं देशों को सीमित भी कर सकती हैं और शक्ति की असमानता को बनाए भी रख सकती हैं। वे भरोसेमंद प्रक्रिया दे सकती हैं, पर न्यायपूर्ण परिणाम की गारंटी नहीं देतीं। उनके कानूनी नियम, संसाधन, विशेषज्ञता और साख महत्त्व रखते हैं, लेकिन नियमों का पालन आखिरकार घरेलू राजनीति और सदस्य देशों के समर्थन पर निर्भर करता है। हर संगठन पर 5 सवाल लगाइए: सदस्य कौन हैं, अधिदेश क्या है, फैसला कौन-सा अंग करता है, मत या सहमति कार्रवाई में कैसे बदलते हैं, और कोई सदस्य न माने तो क्या होता है। इससे तारीखों और मुख्यालयों की सूची राजनीतिक विश्लेषण बन जाती है।

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