अंतरराष्ट्रीय संबंध के सिद्धांत: उदारवाद, यथार्थवाद, रचनावाद, उत्तर-औपनिवेशिकता, संस्थागतवाद और पर्यावरणवाद
मुख्य तथ्य
- अंतरराष्ट्रीय संबंध के सिद्धांत चुनिंदा व्याख्यात्मक नज़रिए हैं।
- यथार्थवाद की शुरुआत इस बात से होती है कि संप्रभु राज्य किसी विश्व सरकार के बिना काम करते हैं।
- शास्त्रीय यथार्थवाद शक्ति-संघर्ष का एक कारण राजनीतिक महत्वाकांक्षा और विवेक में देखता है, जबकि संरचनात्मक यथार्थवाद क्षमताओं के बँटवारे से पैदा होने व...
- उदारवाद मानता है कि घरेलू पसंद, प्रतिनिधि शासन, व्यापार, अधिकार और बार-बार होने वाला सहयोग राज्यों के व्यवहार को बदल सकते हैं, भले ही संघर्ष पूरी तरह...
- संस्थागतवाद बताता है कि नियम और संगठन अनिश्चितता घटाकर, जानकारी देकर, वादों की निगरानी करके और जवाबी सहयोग को टिकाऊ बनाकर सहयोग बढ़ाते हैं।
मुख्य बिंदु
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अंतरराष्ट्रीय संबंध के सिद्धांत चुनिंदा व्याख्यात्मक नज़रिए हैं। हर नजरिया कुछ पक्षों, हितों और कारणों को सामने लाता है, जबकि कुछ दूसरे पहलू कम दिखाई देते हैं।
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यथार्थवाद की शुरुआत इस बात से होती है कि संप्रभु राज्य किसी विश्व सरकार के बिना काम करते हैं। वह शक्ति, अस्तित्व, अनिश्चितता और अपने बल पर सुरक्षा के ज़रिए प्रतिस्पर्धा समझाता है।
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शास्त्रीय यथार्थवाद शक्ति-संघर्ष का एक कारण राजनीतिक महत्वाकांक्षा और विवेक में देखता है, जबकि संरचनात्मक यथार्थवाद क्षमताओं के बँटवारे से पैदा होने वाले दबाव पर जोर देता है।
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उदारवाद मानता है कि घरेलू पसंद, प्रतिनिधि शासन, व्यापार, अधिकार और बार-बार होने वाला सहयोग राज्यों के व्यवहार को बदल सकते हैं, भले ही संघर्ष पूरी तरह खत्म न हो।
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संस्थागतवाद बताता है कि नियम और संगठन अनिश्चितता घटाकर, जानकारी देकर, वादों की निगरानी करके और जवाबी सहयोग को टिकाऊ बनाकर सहयोग बढ़ाते हैं।
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रचनावाद के अनुसार पहचान और हित सामाजिक संपर्क से बनते हैं। इसलिए मानक और साझा अर्थ अंतरराष्ट्रीय पक्षों को केवल रोकते नहीं, बल्कि उनका स्वरूप भी बनाते हैं।
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उत्तर-औपनिवेशिकता दिखाती है कि औपचारिक आजादी के बाद भी साम्राज्य, नस्ली ऊँच-नीच, असमान ज्ञान और आर्थिक निर्भरता विश्व राजनीति को प्रभावित करते रहते हैं।
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पर्यावरणवाद केवल क्षेत्रीय अस्तित्व के बजाय पारिस्थितिक सीमाओं, परस्पर निर्भरता, आने वाली पीढ़ियों के न्याय और पर्यावरणीय नुकसान के असमान बँटवारे को केंद्र में लाता है।
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छहों नज़रिए मुख्य पक्ष, शक्ति के अर्थ, हितों के स्रोत, बदलाव की संभावना और न्याय के पैमाने पर अलग हैं। इसलिए उनकी तुलना समान विश्लेषणात्मक सवालों पर करनी चाहिए।
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कोई एक सिद्धांत हर नतीजे को नहीं समझाता। युद्ध में यथार्थवादी विश्लेषण, संस्था-निर्माण में उदारवादी और संस्थागत विश्लेषण, तथा वैधता में रचनावादी और उत्तर-औपनिवेशिक विश्लेषण ज़रूरी हो सकता है।
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भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, उपनिवेश-विरोधी विरासत, बहुपक्षीय भागीदारी और जलवायु न्याय की दलीलों को इन नजरियों के मिले-जुले इस्तेमाल से बेहतर समझा जा सकता है।
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परीक्षा के अच्छे उत्तर में नज़रिए की परिभाषा, उसकी मान्यताएँ और कारण-प्रक्रिया, किसी उदाहरण पर उसका इस्तेमाल, गंभीर आलोचना और अंत में तर्कपूर्ण तुलनात्मक निष्कर्ष होना चाहिए।
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अंतरराष्ट्रीय संबंध में अलग-अलग सिद्धांत क्यों ज़रूरी हैं
अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल युद्धों, संधियों और शिखर बैठकों का क्रम नहीं है। यह कुछ नियमित सवाल पूछता है। राज्य एक-दूसरे से डरते क्यों हैं? सहयोग कब टिकता है? संस्थाएँ क्या बदलती हैं? कुछ नियम वैध कैसे माने जाने लगते हैं? अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को समझने का पैमाना किसके अनुभव से बनता है? क्या राजनीतिक सुरक्षा को पारिस्थितिक अस्तित्व से अलग किया जा सकता है? सिद्धांत इन सवालों का जवाब देने के लिए मुख्य पक्ष, मान्यताएँ, कारण और प्रमाण के पैमाने चुनता है। इसलिए सिद्धांत वास्तविकता की पूरी तस्वीर नहीं, बल्कि अनुशासित नजरिया है। यथार्थवाद, उदारवाद, रचनावाद, उत्तर-औपनिवेशिकता, संस्थागतवाद और पर्यावरणवाद अलग-अलग कारण-प्रक्रियाएँ सामने लाते हैं। इसी कारण एक घटना की कई व्याख्याएँ हो सकती हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि सभी व्याख्याएँ बराबर मजबूत हैं।
किसी सिद्धांत को समझते समय पहले उसकी विश्लेषण इकाई पहचाननी चाहिए। यथार्थवाद आम तौर पर संप्रभु राज्य और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्षमताओं के बँटवारे को प्रमुख मानता है। उदारवाद राज्य के भीतर जाकर सामाजिक हित, संस्थाएँ, व्यापार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व देखता है। संस्थागतवाद नियमों, जानकारी, बार-बार होने वाले संपर्क और संगठन की बनावट पर ध्यान देता है। रचनावाद पहचान, मानक, भाषा और साझा अर्थों का अध्ययन करता है। उत्तर-औपनिवेशिकता पूछती है कि साम्राज्य, नस्ल, ऊँच-नीच और ज्ञान विश्व राजनीति तथा उसे पढ़ने वाली अवधारणाओं को कैसे बनाते हैं। पर्यावरणवाद पारिस्थितिक व्यवस्थाओं, कमजोर समुदायों, आने वाली पीढ़ियों और गैर-मानव प्रकृति को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है। शक्ति का अर्थ भी हर नज़रिए में अलग हो सकता है। यह सैन्य दबाव, मोलभाव की बढ़त, संस्थागत एजेंडा तय करने की क्षमता, पहचान गढ़ने वाली शक्ति, औपनिवेशिक ऊँच-नीच या पर्यावरणीय लागत और संसाधनों पर नियंत्रण हो सकता है।
तीन फर्क याद रखना ज़रूरी है। पहला, वर्णन और व्याख्या एक बात नहीं हैं। यह कहना कि राज्यों ने गठबंधन बनाया, नतीजे का वर्णन है। गठबंधन खतरे, साझा पहचान या संस्थागत उम्मीद से बना, यह बताने के लिए सिद्धांत चाहिए। दूसरा, कोई मान्यता अपने-आप नैतिक समर्थन नहीं होती। यथार्थवादी अपने बल पर सुरक्षा को व्यवहार समझाने के लिए मान सकता है, युद्ध का गुणगान करने के लिए नहीं। तीसरा, विश्लेषण के स्तर बिना संबंध बताए नहीं मिलाने चाहिए। नेता का विश्वास, घरेलू गठजोड़, दो राज्यों का रिश्ता और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था सभी असर डाल सकते हैं, लेकिन उत्तर में उनके बीच की कड़ी साफ होनी चाहिए।
सबसे मजबूत तरीका समस्या-केंद्रित तुलना है। पहले उस नतीजे को तय करें जिसे समझाना है। फिर देखें कि हर सिद्धांत क्या उम्मीद करता है, कौन-सी कारण-प्रक्रिया बताता है, उसके खिलाफ क्या प्रमाण है और वह किन परिस्थितियों में काम करता है। सिद्धांत की उपयोगिता बड़े दावे से नहीं, बल्कि फर्क समझाने से तय होती है। वह बताए कि समान राज्य अलग व्यवहार क्यों करते हैं, एक क्षेत्र में सहयोग सफल और दूसरे में विफल क्यों होता है, या कभी स्वीकार किया गया व्यवहार बाद में अनुचित क्यों माना जाता है। शिक्षक के लिए यह तरीका बौद्धिक निष्पक्षता भी सिखाता है। विद्यार्थी सिद्धांतों को हर घटना पर चिपकाने वाले लेबल नहीं, बल्कि सीमाओं वाले तर्क मानना सीखते हैं।
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