भारत में जेंडर, जाति, वर्ग, दल-व्यवस्था में बदलाव, गठबंधन, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और चुनाव सुधार
मुख्य तथ्य
- 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए जहाँ तक संभव हो, एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करता है, जिसका अमल आगे...
- भारत की दल-व्यवस्था कांग्रेस के प्रभुत्व से विखंडन और गठबंधन तक गई, फिर राष्ट्रीय दल का प्रभुत्व लौटा;
- अनुच्छेद 324 चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग को देता है, जबकि चुनाव की शुचिता की जिम्मेदारी कानून, अदालत, दल और नागरिक भी साझा...
मुख्य बिंदु
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समकालीन भारतीय राजनीति को पहचान, भौतिक हित, संस्थान और चुनावी रणनीति के मेल से समझना चाहिए; इसे पहचान से विकास की ओर सीधी यात्रा मानना गलत है।
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जेंडर वर्णनात्मक प्रतिनिधित्व और वास्तविक सत्ता, दोनों का सवाल है; अधिक मतदान अपने-आप उम्मीदवारी, नेतृत्व या नीति पर बराबर असर सुनिश्चित नहीं करता।
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106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए जहाँ तक संभव हो, एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करता है, जिसका अमल आगे की जनगणना पर आधारित परिसीमन से जुड़ा है।
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जाति की राजनीति ने सामाजिक ऊँच-नीच को दोहराया भी है और वंचित समुदायों को संगठित होकर मोल-भाव करने तथा सार्वजनिक पद तक पहुँचने का मौका देकर लोकतंत्र को व्यापक भी बनाया है।
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भूमि, पेशा, आय, रोजगार की सुरक्षा और कल्याण तक पहुँच के ज़रिए वर्ग राजनीति को प्रभावित करता है, पर वह आम तौर पर जाति, क्षेत्र, जेंडर और गाँव-शहर की स्थिति के साथ मिलकर सामने आता है।
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भारत की दल-व्यवस्था कांग्रेस के प्रभुत्व से विखंडन और गठबंधन तक गई, फिर राष्ट्रीय दल का प्रभुत्व लौटा; 2024 के जनादेश ने संघ स्तर पर गठबंधन प्रबंधन को फिर ज़रूरी बनाया।
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गठबंधन संघीय मोल-भाव और सामाजिक समावेशन को मजबूत कर सकते हैं, पर अपारदर्शी सौदेबाजी, अस्थिर समर्थन और विधायकों पर ज़रूरत से ज़्यादा दलीय नियंत्रण जवाबदेही घटा सकते हैं।
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क्षेत्रीय आकांक्षाएँ अपने-आप राष्ट्र-विरोधी नहीं होतीं; संघवाद, राज्य पुनर्गठन, स्वायत्तता और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के ज़रिए संवैधानिक समायोजन क्षेत्रीय टकराव को बातचीत में बदल सकता है।
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अनुच्छेद 324 चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग को देता है, जबकि चुनाव की शुचिता की जिम्मेदारी कानून, अदालत, दल और नागरिक भी साझा करते हैं।
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सर्वाधिक मत से जीत वाली व्यवस्था हर निर्वाचन क्षेत्र में स्पष्ट विजेता देती है, पर मत प्रतिशत और सीट हिस्सेदारी में अंतर पैदा कर सकती है; इससे व्यापक सामाजिक गठजोड़, रणनीतिक गठबंधन और सुधार की माँग बढ़ती है।
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चुनावी सुधार में भागीदारी, समानता, पारदर्शिता, स्थिर सरकार, संघवाद और मतदाता की पसंद का संतुलन चाहिए; कोई एक सुधार धनबल, अपराधीकरण, कमजोर आंतरिक दलीय लोकतंत्र और गलत सूचना को साथ नहीं सुलझा सकता।
- 12
परीक्षा के अच्छे उत्तर में जेंडर, जाति, वर्ग, दल, गठबंधन, क्षेत्रीय दावे और सुधार को प्रतिनिधित्व, हित-समेकन और जवाबदेही की एक ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया के हिस्सों के रूप में जोड़ना चाहिए।
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समकालीन भारतीय राजनीति: अवधारणाएँ और अलग-अलग नज़रिए
समकालीन भारतीय राजनीति में मुख्य सवाल हैं कि किसका प्रतिनिधित्व होता है, अलग-अलग हित कैसे जोड़े जाते हैं और सार्वजनिक सत्ता को जवाबदेह कैसे बनाया जाता है। जेंडर, जाति, वर्ग और क्षेत्र समाज में असमान जगह बताते हैं। दल और गठबंधन इनसे निकली माँगों को चुनावी कार्यक्रम में बदलते हैं। चुनावी नियम तय करते हैं कि मत सीट और सरकार में कैसे बदलेंगे। इसलिए इन्हें अलग-अलग खानों में नहीं पढ़ना चाहिए। कोई मतदाता एक साथ महिला, किसी जाति-समुदाय का सदस्य, मजदूर या किसान, किसी क्षेत्र का निवासी और कल्याण योजना का लाभार्थी हो सकता है। उसकी राजनीतिक पसंद इन सभी स्थितियों के मेल से बनती है, किसी एक स्थायी पहचान से नहीं।
इस बहस को तीन नज़रिए व्यवस्थित करते हैं। उदार-संस्थागत नजरिया समान नागरिकता, व्यक्तिगत पसंद, संवैधानिक अधिकार, प्रतिस्पर्धी चुनाव और निष्पक्ष संस्थानों पर जोर देता है। वह पूछता है कि क्या हर नागरिक स्वतंत्र रूप से मत दे सकता है और क्या नियम निष्पक्ष मुकाबला बनाते हैं। राजनीतिक अर्थव्यवस्था का नजरिया भूमि, पूँजी, रोजगार, शिक्षा और सरकारी संसाधनों पर नियंत्रण देखता है। वह पूछता है कि नीति पर किन भौतिक हितों का असर है और औपचारिक समानता के साथ गहरी असमानता क्यों बनी रहती है। पहचान और मान्यता का नजरिया जाति, जेंडर, धर्म, जनजाति, भाषा और क्षेत्र के राजनीतिक असर को समझता है। वह पूछता है कि ऐतिहासिक रूप से बाहर रखे गए समूह अपनी आवाज में बोलकर मान्यता और पुनर्वितरण, दोनों हासिल कर रहे हैं या नहीं।
कोई एक नजरिया पर्याप्त नहीं है। केवल संस्थानों पर ध्यान देने से संसाधनों की असमानता छूट सकती है। केवल वर्ग देखने से अपमान, दर्जा और सांस्कृतिक मान्यता की समस्या छूट सकती है। केवल पहचान देखने से हर समूह को भीतर से एक जैसा मान लेने और उसके अंदर की असमानता भूलने का खतरा रहता है। अंतर्संबंधी नजरिया इस कमी को सुधारता है। मसलन, भूमिहीन दलित महिला को जाति, वर्ग और जेंडर की मिली-जुली बाधाएँ झेलनी पड़ती हैं; उसका अनुभव संपन्न महिला या जमीन वाले दलित पुरुष से अलग होगा।
इसलिए भारतीय लोकतंत्र पहचान की राजनीति से मुद्दों की राजनीति की ओर सीधी यात्रा नहीं है। विकास, कल्याण, रोजगार, सुरक्षा और भ्रष्टाचार के सवाल सामाजिक पहचान के ज़रिए समझे जाते हैं, जबकि पहचानें नीतिगत माँगों से बदलती रहती हैं। जब पहले बाहर रहे लोग भागीदारी और नेतृत्व में आते हैं तो लोकतंत्र गहरा होता है। जब पहचान नफरत बन जाए, अधिकार की जगह कृपा बाँटी जाए, धन प्रभाव खरीद ले या संस्थान निष्पक्ष न रहें, तब लोकतंत्र बिगड़ता है। यही संतुलित आधार आगे के सभी हिस्सों और परीक्षा के उत्तरों को दिशा देता है।
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