राजनीतिक व्यवस्था, विकास, आधुनिकीकरण, संस्कृति, समाजीकरण, सामाजिक पूँजी और लोकतंत्रीकरण
मुख्य तथ्य
- राजनीतिक व्यवस्था सरकार से व्यापक है: इसमें संस्थाएँ, राजनीतिक व्यवहार, अनौपचारिक सत्ता, सामाजिक माँगें, फैसले और फीडबैक शामिल हैं।
- डेविड ईस्टन राजनीति को इनपुट, रूपांतरण, आउटपुट और फीडबैक के ज़रिए समाज के लिए मूल्यों के बाध्यकारी आवंटन के रूप में समझाते हैं, जबकि गैब्रियल आलमंड सं...
- राजनीतिक विकास बहुआयामी है: संस्थागत क्षमता, समानता, भागीदारी, वैधता और शांतिपूर्ण संघर्ष-प्रबंधन अलग-अलग गति से आगे बढ़ सकते हैं।
- आधुनिकीकरण में विभेदीकरण, गतिशीलता, शिक्षा, संचार और शक्ति-संबंधों का बदलाव शामिल है, पर यह न तो अपने-आप लोकतंत्रीकरण है और न केवल पश्चिमीकरण।
- निर्भरता, उत्तर-औपनिवेशिक और नारीवादी आलोचनाएँ दिखाती हैं कि कथित सार्वभौमिक विकास-पथ असमान वैश्विक विनिमय, औपनिवेशिक विरासत और बिना भुगतान वाले या अन...
मुख्य बिंदु
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राजनीतिक व्यवस्था सरकार से व्यापक है: इसमें संस्थाएँ, राजनीतिक व्यवहार, अनौपचारिक सत्ता, सामाजिक माँगें, फैसले और फीडबैक शामिल हैं।
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डेविड ईस्टन राजनीति को इनपुट, रूपांतरण, आउटपुट और फीडबैक के ज़रिए समाज के लिए मूल्यों के बाध्यकारी आवंटन के रूप में समझाते हैं, जबकि गैब्रियल आलमंड संरचनाओं और कार्यों को जोड़ते हैं।
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राजनीतिक विकास बहुआयामी है: संस्थागत क्षमता, समानता, भागीदारी, वैधता और शांतिपूर्ण संघर्ष-प्रबंधन अलग-अलग गति से आगे बढ़ सकते हैं।
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आधुनिकीकरण में विभेदीकरण, गतिशीलता, शिक्षा, संचार और शक्ति-संबंधों का बदलाव शामिल है, पर यह न तो अपने-आप लोकतंत्रीकरण है और न केवल पश्चिमीकरण।
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निर्भरता, उत्तर-औपनिवेशिक और नारीवादी आलोचनाएँ दिखाती हैं कि कथित सार्वभौमिक विकास-पथ असमान वैश्विक विनिमय, औपनिवेशिक विरासत और बिना भुगतान वाले या अनदेखे राजनीतिक काम को छिपा सकते हैं।
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राजनीतिक संस्कृति में ज्ञानात्मक, भावात्मक और मूल्यांकनपरक रुझान आते हैं; आलमंड और वर्बा संकुचित, अधीन और सहभागी आदर्श प्रकार बताते हैं।
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राजनीतिक समाजीकरण जीवन भर चलता है और परिवार, स्कूल, साथी समूह, मीडिया, संगठन, दल, आंदोलन तथा सार्वजनिक संस्थाओं के सीधे अनुभव से बनता है।
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सामाजिक पूँजी में नेटवर्क, मानदंड और भरोसा आते हैं; समूह-अंदर रिश्ते अपनों को सहारा देते हैं, समूह-पार रिश्ते समुदायों को जोड़ते हैं और संस्थागत रिश्ते नागरिकों को सत्ता-संस्थाओं से जोड़ते हैं।
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सामाजिक पूँजी अपने-आप लोकतांत्रिक नहीं होती, क्योंकि घने नेटवर्क बाहरी लोगों को अलग कर सकते हैं, पूर्वाग्रह फैला सकते हैं या स्थानीय वर्चस्व बचा सकते हैं।
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लोकतंत्रीकरण में संक्रमण, संस्थागत सुदृढ़ीकरण और लोकतांत्रिक गहराई शामिल हैं; अधिकार, जवाबदेही और सार्थक समावेश के बिना चुनाव पर्याप्त नहीं हैं।
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भारत संवैधानिक लोकतंत्र, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, संघवाद, न्यायालय, चुनाव और स्थानीय स्वशासन को उन लगातार बनी असमानताओं के साथ जोड़ता है जो वास्तविक भागीदारी को आकार देती हैं।
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सुशासन तब राजनीतिक विकास में योगदान देता है जब पारदर्शिता, कानून का शासन, भागीदारी, समावेश और जवाबदेही राज्य की क्षमता तथा जनता का भरोसा दोनों बढ़ाते हैं।
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परीक्षा-उत्तर में विकास, आधुनिकीकरण और लोकतंत्रीकरण को समानार्थी मानने के बजाय अर्थ, प्रक्रिया, संकेतक, विचारक, आलोचना और भारतीय उपयोग के आधार पर तुलना करें।
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राजनीतिक व्यवस्था: अर्थ, सीमा और विश्लेषण के मॉडल
राजनीतिक व्यवस्था उन सभी रिश्तों का पूरा ढाँचा है जिनके ज़रिए समाज सामूहिक रूप से बाध्यकारी फैसले लेता, स्वीकार करता, चुनौती देता और लागू करता है। इसमें विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, नौकरशाही और स्थानीय सरकार तो आती ही हैं, साथ में दल, दबाव समूह, आंदोलन, मीडिया, जाति और समुदाय के संगठन, आर्थिक हित, राजनीतिक सोच और अनौपचारिक नेटवर्क भी आते हैं। इसलिए सरकार राजनीतिक व्यवस्था का संस्थागत केंद्र है, पूरी व्यवस्था नहीं। राज्य संप्रभु कानूनी सत्ता देता है, सरकार सार्वजनिक पदों पर बैठा अस्थायी तंत्र है और राजनीतिक व्यवस्था दोनों को समाज तथा उसके माहौल से जोड़ती है।
डेविड ईस्टन का व्यवस्था-विश्लेषण पूछता है कि माँगों और दबावों के बीच राजनीतिक सुव्यवस्था कैसे बनी रहती है। नागरिक और समूह माँग तथा समर्थन के रूप में इनपुट भेजते हैं। राजनीतिक संस्थाएँ इन्हें कानून, नीति, कर और सार्वजनिक सेवा जैसे आउटपुट में बदलती हैं। इन फैसलों के परिणाम फीडबैक पैदा करते हैं, जो अगली माँगों और समर्थन को बदलता है। व्यवस्था की सीमा समझने के लिए बनाई गई है, पूरी तरह बंद नहीं। आर्थिक बदलाव, पर्यावरणीय संकट, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ बाहर के माहौल से आकर राजनीतिक पसंद बदलती हैं। ईस्टन का मॉडल प्रवाह और स्थिरता समझने में उपयोगी है, लेकिन इसकी अमूर्त भाषा असमान शक्ति को कम दिखा सकती है। संगठित ताकतवर समूह और बिखरे कमजोर समुदाय की माँग एक ही शर्त पर व्यवस्था में प्रवेश नहीं करती।
गैब्रियल आलमंड का संरचनात्मक-कार्यात्मक नजरिया अलग समाजों की तुलना आसान बनाता है। हर राजनीतिक व्यवस्था को कुछ समान कार्य करने होते हैं, भले उन्हें करने वाली संरचनाएँ अलग हों। इनपुट कार्यों में राजनीतिक समाजीकरण और भर्ती, हितों की अभिव्यक्ति, हितों का समूहन और राजनीतिक संचार आते हैं। आउटपुट कार्यों में नियम बनाना, लागू करना और विवाद पर फैसला देना आता है। विधायिका नियम बनाती है, पर न्यायालय, कार्यपालिका, दल, परंपरागत निकाय और आंदोलन भी मानदंडों को आकार दे सकते हैं। इससे यह गलती नहीं होती कि केवल पश्चिमी संस्थागत रूप ही राजनीतिक कार्य कर सकते हैं। इसकी सीमा यह है कि यह स्थिरता को सामान्य मानकर संघर्ष और बदलाव को कम जगह दे सकता है।
तीन जुड़ी अवधारणाएँ विश्लेषण साफ करती हैं। प्राधिकार का अर्थ आदेश देने का स्वीकृत अधिकार है। शक्ति किसी के व्यवहार को प्रभावित करने की व्यापक क्षमता है, चाहे उसे मान्यता मिली हो या नहीं। वैधता यह विश्वास है कि सत्ता को स्वीकार करना उचित है। बल कुछ समय आज्ञापालन करा सकता है, पर टिकाऊ व्यवस्था को सामान्यतः वैधता चाहिए। राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता संस्थाकरण पर भी निर्भर है। संगठन और प्रक्रिया मूल्यवान, अनुमान-योग्य और किसी एक नेता से अधिक टिकाऊ बनें। सैमुअल हंटिंगटन ने इसलिए संस्थाओं की अनुकूलन क्षमता, जटिलता, स्वायत्तता और एकता पर जोर दिया। तेज राजनीतिक लामबंदी के साथ सक्षम संस्थाएँ न हों तो अस्थिरता आ सकती है, पर इस तर्क से लोकतांत्रिक भागीदारी बंद करना सही नहीं हो जाता।
राजनीतिक व्यवस्था की जाँच में क्षमता और जवाबदेही दोनों रखें। सक्षम प्रशासन फैसले लागू कर सकता है, लेकिन कानूनी रोक के बिना यही क्षमता मनमानी सत्ता मजबूत कर सकती है। दूसरी ओर, काम करने योग्य संस्थाओं के बिना बहुत भागीदारी ऐसे वादे पैदा कर सकती है जिन्हें पूरा नहीं किया जा सके। बेहतर कसौटी प्राधिकार, संवेदनशीलता, अधिकार, क्रियान्वयन और फीडबैक को जोड़ती है। लोक प्रशासन राजनीतिक फैसले को नागरिक के वास्तविक अनुभव में बदलता है। सुशासन आगे पूछता है कि फैसला कानूनसम्मत, पारदर्शी, सहभागी, समावेशी, प्रभावी और जनता के प्रति जवाबदेह है या नहीं।
परीक्षा-उत्तर में पहले राज्य, सरकार और राजनीतिक व्यवस्था का अंतर लिखें। फिर ईस्टन और आलमंड समझाएँ, वैधता तथा संस्थाकरण जोड़ें और आलोचना के साथ समाप्त करें। राजनीतिक व्यवस्था को केवल संवैधानिक अंगों की सूची मानना एक सामान्य भूल है। इनपुट को तटस्थ आँकड़ा मानना भी गलत है, क्योंकि सामाजिक शक्ति माँग की पहुँच तय करती है। सही निष्कर्ष यह है कि राजनीतिक व्यवस्था बाध्यकारी फैसले, संघर्ष और फीडबैक का खुला क्षेत्र है। उसकी लोकतांत्रिक गुणवत्ता इस पर निर्भर है कि कौन बोल सकता है, संस्थाएँ माँगों को कैसे बदलती हैं और फैसलों की समीक्षा हो सकती है या नहीं।
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