मुख्य तथ्य

  • समकालीन राजनीतिक सिद्धांत आधुनिक सिद्धांत से मिली कथित तटस्थ व्यक्ति, सार्वभौमिक तर्क और राज्य-केंद्रित दायरे की धारणाओं पर सवाल उठाता है।
  • उत्तर-आधुनिकतावाद समग्र महाख्यानों पर संदेह करता है, पर इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर व्याख्या समान रूप से सही है।
  • उत्तर-संरचनावाद देखता है कि भाषा, विमर्श और सत्ता राजनीतिक व्यक्तियों, श्रेणियों और सत्य की व्यवस्थाओं को कैसे बनाते हैं।
  • लियोतार, फूको और देरिदा आधारभूत निश्चितता के आलोचक हैं, फिर भी उनकी अवधारणाएँ और पद्धतियाँ एक-दूसरे की जगह नहीं रखी जा सकतीं।
  • बहुसंस्कृतिवाद पूछता है कि समान नागरिकता के लिए कभी-कभी एक जैसा व्यवहार नहीं, बल्कि मान्यता, समायोजन या समूह-भेदित अधिकार कब ज़रूरी होते हैं।

मुख्य बिंदु

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    समकालीन राजनीतिक सिद्धांत आधुनिक सिद्धांत से मिली कथित तटस्थ व्यक्ति, सार्वभौमिक तर्क और राज्य-केंद्रित दायरे की धारणाओं पर सवाल उठाता है।

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    उत्तर-आधुनिकतावाद समग्र महाख्यानों पर संदेह करता है, पर इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर व्याख्या समान रूप से सही है।

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    उत्तर-संरचनावाद देखता है कि भाषा, विमर्श और सत्ता राजनीतिक व्यक्तियों, श्रेणियों और सत्य की व्यवस्थाओं को कैसे बनाते हैं।

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    लियोतार, फूको और देरिदा आधारभूत निश्चितता के आलोचक हैं, फिर भी उनकी अवधारणाएँ और पद्धतियाँ एक-दूसरे की जगह नहीं रखी जा सकतीं।

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    बहुसंस्कृतिवाद पूछता है कि समान नागरिकता के लिए कभी-कभी एक जैसा व्यवहार नहीं, बल्कि मान्यता, समायोजन या समूह-भेदित अधिकार कब ज़रूरी होते हैं।

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    सांस्कृतिक विविधता की लोकतांत्रिक रक्षा पर मानव गरिमा, व्यक्ति की निर्णय-क्षमता और मूल अधिकारों की सीमा बनी रहती है।

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    विश्वनागरिकतावाद सीमाओं के पार हर व्यक्ति को नैतिक महत्त्व देता है, जबकि इसके संस्थागत रूप राज्यों और वैश्विक संस्थाओं की उचित भूमिका पर असहमत हैं।

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    नारीवादी राजनीतिक सिद्धांत सार्वजनिक और निजी जीवन के बँटवारे की राजनीतिक प्रकृति को उजागर करता है और देखता है कि संस्थाएँ पितृसत्ता को कैसे दोहराती हैं।

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    उदारवादी, उग्र, समाजवादी, देखभाल-आधारित, उत्तर-औपनिवेशिक और अंतर्संबंधी नारीवाद प्रभुत्व के अलग कारण बताते हैं, इसलिए उनके उपाय भी अलग हैं।

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    हरित राजनीतिक सिद्धांत मानव-केंद्रितता, असीम वृद्धि और केवल वर्तमान मतदाताओं तक सीमित समय-दृष्टि को चुनौती देता है।

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    पर्यावरणीय न्याय पारिस्थितिक हानि को असमान सत्ता, बँटवारे, मान्यता, भागीदारी और जिम्मेदारी से जोड़ता है।

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    ये छह दृष्टियाँ बहिष्करण की आलोचना में एक-दूसरे से मिलती हैं, पर सार्वभौमिकता, पहचान, मानव व्यक्ति, संस्थाओं और निर्णय के मानकों पर अलग हैं।

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    कक्षा और परीक्षा में मजबूत उत्तर पहले अवधारणा स्पष्ट करता है, फिर उसका अंदरूनी विवाद बताता है, किसी संस्था पर लागू करता है और संतुलित निष्कर्ष देता है।

समकालीन सिद्धांत ने सवाल क्यों बदले

समकालीन राजनीतिक सिद्धांत कोई एक मत नहीं है। यह तर्कों का ऐसा क्षेत्र है जो 20वीं सदी के उत्तरार्ध में खास तौर पर प्रभावशाली हुआ, क्योंकि पुरानी श्रेणियाँ प्रभुत्व के कई रूपों को समझाने में कमजोर पड़ रही थीं। आधुनिक सिद्धांत का बड़ा हिस्सा एक अमूर्त व्यक्ति, एकीकृत संप्रभु राज्य, निजी जीवन से अलग सार्वजनिक क्षेत्र और सामान्य नियम देने में सक्षम तर्क की कल्पना करता था। आलोचकों ने पूछा कि इस तस्वीर से कौन गायब है। इस तस्वीर से बिना वेतन के देखभाल-कार्य से सार्वजनिक नागरिकता को टिकाए रखने वाली महिलाएँ, घुल-मिल जाने के दबाव में जीते अल्पसंख्यक, यूरोपीय श्रेणियों में समझे गए उपनिवेशित लोग, संसाधन बना दी गई मानवेतर प्रकृति और आज के चुनावों में आवाज़ न रखने वाली भावी पीढ़ियाँ गायब थीं। नई दृष्टियों ने स्वतंत्रता, समानता या न्याय को बस खारिज नहीं किया। उन्होंने फिर से पूछा कि इन मूल्यों का अर्थ क्या है, ये किस पर लागू हों और इनका दायरा क्या हो।

इस क्षेत्र को समझने के लिए 3 भेद उपयोगी हैं। पहला, मानक सिद्धांत पूछता है कि न्यायपूर्ण व्यवस्था कैसी होनी चाहिए, जबकि वंशावली या व्याख्यात्मक जाँच पूछती है कि कोई श्रेणी स्वाभाविक कैसे दिखाई देने लगी। नारीवाद, बहुसंस्कृतिवाद, विश्वनागरिकतावाद और हरित सिद्धांत अक्सर साफ़ राजनीतिक उपाय देते हैं। उत्तर-संरचनावाद अधिकतर यह जाँचता है कि व्यक्ति और सत्य की धारणाएँ कैसे बनती हैं। फिर भी यह सीमा पूरी तरह कठोर नहीं है, क्योंकि समस्या को नए ढंग से समझने पर सुधार का अर्थ भी बदलता है। दूसरा, सार्वभौमिक दृष्टि सबके लिए एक जैसे मानक चाहती है, जबकि भिन्नता पर ज़ोर देने वाली दृष्टियाँ चेताती हैं कि कथित सार्वभौमिक व्यक्ति में प्रभुत्वशाली समूह का अनुभव छिपा हो सकता है। असली विवाद समानता और भिन्नता को साधारण विरोध मानने का नहीं है। सवाल यह है कि किन भिन्नताओं को मान्यता मिले, किन असमानताओं को सुधारा जाए और कौन-से साझा मानक लोगों को प्रभुत्व से बचाएँ। तीसरा, राजनीति का दायरा स्थानीय, राष्ट्रीय, सीमापार, वैश्विक या पारिस्थितिक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन, प्रवासन और आर्थिक परस्पर निर्भरता के कारण केवल राज्य तक सीमित विश्लेषण अधूरा है, लेकिन लोकतांत्रिक जवाबदेही अब भी अधिकतर क्षेत्रीय संस्थाओं से चलती है।

ये सिद्धांत सत्ता की धारणा भी बदलते हैं। सत्ता केवल सरकार का आदेश नहीं होती। वह स्वीकृत भाषा, पेशेवर वर्गीकरण, पारिवारिक भूमिकाओं, बाज़ार पर निर्भरता, सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और पर्यावरणीय नुकसान का बोझ तय करने के ज़रिए भी चल सकती है। इसलिए स्वतंत्रता का अर्थ हमेशा केवल कानूनी रोक का न होना नहीं है। उसके लिए आवाज़, मान्यता, ज़रूरी साधन, सामान्य बनाने वाली निगरानी से मुक्ति या ऐसा पर्यावरण भी चाहिए जिसमें निर्णय लेना संभव रहे। समानता का अर्थ एक जैसी कानूनी स्थिति, न्यायपूर्ण संसाधन, भागीदारी में बराबरी या संकटग्रस्त संस्कृति की रक्षा हो सकता है। न्याय का संबंध बँटवारे, मान्यता, प्रक्रिया, ऐतिहासिक जिम्मेदारी और भावी पीढ़ियों से हो सकता है।

परीक्षा में किसी दृष्टि को एक नारे तक सीमित नहीं करना चाहिए। पूरा उत्तर बताता है कि वह किस समस्या की आलोचना करती है, सत्ता को कैसे समझती है, व्यक्ति की कैसी छवि रखती है, कौन-सा राजनीतिक उपाय चाहती है और उस पर मुख्य आपत्ति क्या है। जुड़ी हुई परंपराओं का भेद भी ज़रूरी है। उत्तर-आधुनिकतावाद आधारभूत निश्चितता और समग्र कथाओं पर व्यापक संदेह है। उत्तर-संरचनावाद भाषा, भिन्नता, विमर्श और व्यक्ति-निर्माण का विश्लेषण करने वाली पद्धतियों का समूह है। बहुसंस्कृतिवाद राजनीतिक समुदाय के भीतर सांस्कृतिक समूहों के बीच न्यायपूर्ण शर्तों से जुड़ा है। विश्वनागरिकतावाद सीमाओं के पार नैतिक चिंता फैलाता है। नारीवाद लिंग, सामाजिक भूमिकाओं और उनके दूसरे संबंधों में बसी सत्ता पर ध्यान देता है। हरित सिद्धांत पारिस्थितिक सीमाओं, मानवेतर मूल्य और पीढ़ियों के बीच न्याय पर ध्यान देता है। इनके मेल उपयोगी हैं, फिर भी इनके उत्तर विवाद के लिए खुले रहते हैं।

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