मुख्य तथ्य

  • विदेश नीति राष्ट्रीय क्षमताओं और संवैधानिक मूल्यों को बाहरी विकल्पों में बदलती है; यह कूटनीति से व्यापक है, क्योंकि कूटनीति उसका केवल एक साधन है।
  • अनुच्छेद 51 भारतीय राज्य को अंतर्राष्ट्रीय शांति, सम्मानजनक संबंध, अंतर्राष्ट्रीय कानून के आदर और विवादों को मध्यस्थता से निपटाने को बढ़ावा देने का नि...
  • भारत का नजरिया शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और उपनिवेशवाद-विरोध जैसे आदर्शवादी मूल्यों को सुरक्षा, शक्ति और आर्थिक क्षमता जैसे यथार्थवादी हितों से जोड़ता है...
  • गुटनिरपेक्षता का अर्थ निर्णय की स्वतंत्रता था; यह तटस्थता, अलगाव या हर महाशक्ति से बराबर दूरी नहीं थी।
  • आज की सामरिक स्वायत्तता भारत को किसी संधि-गठबंधन के बिना अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और दूसरे साझेदारों से मुद्दे के अनुसार सहयोग करने देती है।

मुख्य बिंदु

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    विदेश नीति राष्ट्रीय क्षमताओं और संवैधानिक मूल्यों को बाहरी विकल्पों में बदलती है; यह कूटनीति से व्यापक है, क्योंकि कूटनीति उसका केवल एक साधन है।

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    अनुच्छेद 51 भारतीय राज्य को अंतर्राष्ट्रीय शांति, सम्मानजनक संबंध, अंतर्राष्ट्रीय कानून के आदर और विवादों को मध्यस्थता से निपटाने को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।

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    भारत का नजरिया शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और उपनिवेशवाद-विरोध जैसे आदर्शवादी मूल्यों को सुरक्षा, शक्ति और आर्थिक क्षमता जैसे यथार्थवादी हितों से जोड़ता है।

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    गुटनिरपेक्षता का अर्थ निर्णय की स्वतंत्रता था; यह तटस्थता, अलगाव या हर महाशक्ति से बराबर दूरी नहीं थी।

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    आज की सामरिक स्वायत्तता भारत को किसी संधि-गठबंधन के बिना अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और दूसरे साझेदारों से मुद्दे के अनुसार सहयोग करने देती है।

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    चीन के साथ संबंधों में अनसुलझी सीमा और सुरक्षा प्रतिस्पर्धा के साथ आर्थिक संपर्क तथा राजनयिक बातचीत भी चलती है।

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    पड़ोस नीति कनेक्टिविटी, विकास साझेदारी और संकट-सहायता को आतंकवाद, सीमा, नदी-जल और बाहरी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के सख्त प्रबंधन से जोड़ती है।

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    भारत संयुक्त राष्ट्र को वैधता का स्रोत, विकासशील देशों की बात रखने का मंच और आवश्यक पर अधूरी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था मानता है।

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    गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका शीत युद्ध के गुटों से दूरी से आगे बढ़कर दक्षिण-दक्षिण सहयोग, बहुपक्षीय सुधार और ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व तक पहुँची है।

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    राष्ट्रीय सुरक्षा समग्र है; बाहरी रक्षा, आंतरिक व्यवस्था, आर्थिक मजबूती, ऊर्जा, तकनीक, साइबर तंत्र, समुद्री मार्ग और सामाजिक एकता एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।

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    निर्वाचित कार्यपालिका विदेश और सुरक्षा नीति का नेतृत्व करती है, जबकि संसद, न्यायालय, सशस्त्र बल, मंत्रालय, खुफिया संस्थाएँ और राज्य सरकारें अलग संवैधानिक भूमिकाएँ निभाती हैं।

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    अच्छे परीक्षा-उत्तर में निष्कर्ष से पहले मूल्यों और हितों, निरंतरता और बदलाव, तथा स्वायत्तता और साझेदारी की तुलना करनी चाहिए।

विदेश नीति: अर्थ, संदर्भ और निर्धारक

विदेश नीति उन लक्ष्यों, फैसलों और कामों की व्यवस्थित रूपरेखा है जिनसे कोई राज्य अपनी सीमाओं के बाहर संबंध सँभालता है। कूटनीति, बातचीत, सहायता, व्यापार नीति, प्रतिबंध, रक्षा सहयोग और असाधारण स्थिति में बल-प्रयोग इसके साधन हैं। यह फर्क याद रखना ज़रूरी है: कूटनीति तरीका है, जबकि विदेश नीति उद्देश्य तय करती है। भारत ऐसी शांतिपूर्ण बाहरी स्थिति चाहता है जिसमें राष्ट्रीय एकीकरण, विकास और लोकतांत्रिक फैसले बाहरी दबाव के बिना आगे बढ़ सकें।

इसका मूल्यगत आधार संविधान में भी है। अनुच्छेद 51 राज्य से अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बढ़ाने, न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंध बनाए रखने, अंतर्राष्ट्रीय कानून तथा संधि-दायित्वों के प्रति आदर बढ़ाने और मध्यस्थता से विवाद निपटाने को कहता है। ये मार्गदर्शक सिद्धांत हैं; इनका अर्थ राष्ट्रीय हित की अनदेखी नहीं है। इसलिए भारत के व्यवहार में आदर्शवाद और यथार्थवाद दोनों मिलते हैं। उपनिवेशवाद-विरोध, नस्ली समानता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और बहुपक्षीय संस्थाओं के समर्थन में आदर्शवाद दिखता है। सैन्य तैयारी, निरोध, सीमा प्रबंधन, तकनीक तक पहुँच और अपने खिलाफ शक्ति के अत्यधिक जमाव को संतुलित करने में यथार्थवाद दिखता है।

कई निर्धारक एक साथ काम करते हैं। भूगोल भारत को महाद्वीपीय प्रतिद्वंद्वियों के पास और हिंद महासागर के समुद्री मार्गों के बीच रखता है। इतिहास में औपनिवेशिक शासन, विभाजन, स्वतंत्रता आंदोलन और एशिया-अफ्रीका से सभ्यतागत रिश्तों की याद शामिल है। आर्थिक ज़रूरतें ऊर्जा, बाजार, पूँजी, सप्लाई चेन और तकनीक को केंद्रीय बनाती हैं। घरेलू कारणों में जनमत, संघीय हित, सीमावर्ती राज्य, कारोबार, प्रवासी समुदाय और सरकारों का राजनीतिक नजरिया आते हैं। विश्व में शक्ति का बँटवारा अवसर और सीमाएँ तय करता है। नेतृत्व गति और शैली बदल सकता है, पर भूगोल या भौतिक क्षमता को समाप्त नहीं कर सकता।

विश्लेषण में तीन सावधानियाँ रखें। पहली, राष्ट्रीय हित केवल सैन्य अस्तित्व नहीं; इसमें समृद्धि, स्वायत्तता, सामाजिक स्थिरता और संवैधानिक मूल्य भी हैं। दूसरी, एक नीति कई लक्ष्य साध सकती है; कोई बंदरगाह व्यापार, समुद्री मौजूदगी और आपदा-सहायता तीनों में काम आ सकता है। तीसरी, निरंतरता और बदलाव साथ चलते हैं। शांति, स्वायत्तता और विकास स्थायी लक्ष्य हैं, जबकि तरीके शुरुआती गुटनिरपेक्षता से विविध साझेदारियों, छोटे समूहों और मजबूत समुद्री जुड़ाव तक बदले हैं। इसलिए अच्छे विश्लेषण में हित, चुना गया साधन, मौजूद सीमा और कौन-सा संतुलन साधना पड़ा साफ दिखना चाहिए।

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