भारतीय राजनीतिक चिंतक: कौटिल्य, विवेकानंद, तिलक, गांधी, अरविंद, आंबेडकर, नेहरू और लोहिया
मुख्य तथ्य
- भारतीय राजनीतिक चिंतन राज्यकला, स्वतंत्रता और संस्थाओं के सवालों को कर्तव्य, गरिमा, सामाजिक ऊंच-नीच और सामूहिक जीवन के नैतिक सवालों से जोड़ता है।
- कौटिल्य शासन को सुरक्षा, प्रशासन और लोक-कल्याण का व्यवस्थित विज्ञान मानते हैं, जिसमें राज्य के सातों अंग परस्पर निर्भर तंत्र की तरह काम करते हैं।
- विवेकानंद आध्यात्मिक समानता को शक्ति, जन-शिक्षा, सेवा और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की सार्वजनिक नैतिकता बनाते हैं, पर कोई विस्तृत संवैधानिक ढांचा नहीं देते...
- तिलक स्वराज को तत्काल राजनीतिक अधिकार बनाते हैं और जन-संगठन को स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा तथा दबावपूर्ण संवैधानिक राजनीति से जोड़ते हैं।
- गांधी स्वराज को व्यक्ति, गांव और राष्ट्र के स्तर पर आत्म-शासन तक फैलाते हैं तथा सत्य, अहिंसा और साधन-साध्य की एकता को राजनीति का आधार बनाते हैं।
मुख्य बिंदु
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भारतीय राजनीतिक चिंतन राज्यकला, स्वतंत्रता और संस्थाओं के सवालों को कर्तव्य, गरिमा, सामाजिक ऊंच-नीच और सामूहिक जीवन के नैतिक सवालों से जोड़ता है।
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कौटिल्य शासन को सुरक्षा, प्रशासन और लोक-कल्याण का व्यवस्थित विज्ञान मानते हैं, जिसमें राज्य के सातों अंग परस्पर निर्भर तंत्र की तरह काम करते हैं।
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विवेकानंद आध्यात्मिक समानता को शक्ति, जन-शिक्षा, सेवा और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की सार्वजनिक नैतिकता बनाते हैं, पर कोई विस्तृत संवैधानिक ढांचा नहीं देते।
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तिलक स्वराज को तत्काल राजनीतिक अधिकार बनाते हैं और जन-संगठन को स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा तथा दबावपूर्ण संवैधानिक राजनीति से जोड़ते हैं।
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गांधी स्वराज को व्यक्ति, गांव और राष्ट्र के स्तर पर आत्म-शासन तक फैलाते हैं तथा सत्य, अहिंसा और साधन-साध्य की एकता को राजनीति का आधार बनाते हैं।
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अरविंद का शुरुआती राजनीतिक चिंतन पूर्ण स्वतंत्रता, संगठित प्रतिरोध और राष्ट्रीय शिक्षा की मांग करता है; बाद का सामाजिक चिंतन स्वतंत्र राष्ट्रीयता से मानव एकता की ओर बढ़ता है।
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आंबेडकर का तर्क है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर टिका सामाजिक लोकतंत्र न हो तो राजनीतिक लोकतंत्र नहीं टिक सकता; वे जाति को श्रेणीबद्ध असमानता की व्यवस्था मानते हैं।
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नेहरू संसदीय लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष नागरिकता, वैज्ञानिक दृष्टि, नियोजन और अधिक समान समाज की ओर शांतिपूर्ण बदलाव को साथ रखते हैं।
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लोहिया पूंजीवाद और केंद्रीकृत रूढ़ समाजवाद दोनों की आलोचना करते हुए जाति, लिंग, वर्ग, नस्ल, साम्राज्य और विकेंद्रीकरण को एक मूलगामी लोकतांत्रिक कार्यक्रम में जोड़ते हैं।
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बल-प्रयोग पर इनकी राय अलग है: कौटिल्य दंड को ज़रूरी मानते हैं, गांधी हिंसा पर गहरा अविश्वास करते हैं, आंबेडकर राज्य-शक्ति को संविधान की सीमा में रखते हैं और लोहिया अन्याय के विरुद्ध सविनय अवज्ञा बचाए रखते हैं।
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इनकी स्वतंत्रता की धारणाएं एक जैसी नहीं हैं: तिलक में राजनीतिक स्वशासन, गांधी में आत्म-संयम, आंबेडकर में बराबर सामाजिक दर्जा, नेहरू में लोकतांत्रिक विकास और लोहिया में कई असमानताओं से मुक्ति प्रमुख है।
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परीक्षा के उत्तर में हर चिंतक की मूल समस्या, प्रमुख अवधारणाएं, राजनीतिक साधन, संस्थागत अर्थ और सीमा स्पष्ट करके ही तुलना करनी चाहिए।
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भारतीय राजनीतिक चिंतकों को कैसे पढ़ें
भारतीय राजनीतिक चिंतन कोई एक सिद्धांत नहीं है। यह राजनीतिक व्यवस्था, स्वतंत्रता, न्याय, समुदाय, सामाजिक ऊंच-नीच और सामूहिक कार्रवाई के सही साधनों पर चलने वाली बहसों का क्षेत्र है। सिलेबस के आठ चिंतक बहुत अलग स्थितियों में लिखते हैं। कौटिल्य राजसत्ता और राज्यों की आपसी प्रतिस्पर्धा पर विचार करते हैं। विवेकानंद, तिलक, गांधी और अरविंद औपनिवेशिक अधीनता तथा राष्ट्रीय पुनर्जागरण का जवाब देते हैं। आंबेडकर जाति और संवैधानिक ढांचे से जूझते हैं। नेहरू लोकतांत्रिक राज्य-निर्माण के भीतर काम करते हैं। लोहिया जाति, लिंग और केंद्रीकरण को समझने वाले समाजवादी बदलाव की मांग करते हैं। सबका संबंध भारत से है, पर उनका भारत और उनकी राजनीति एक जैसी नहीं है।
इन्हें तीन तरीकों से व्यवस्थित किया जा सकता है। राज्यकला का दृष्टिकोण पूछता है कि शासन कौन करता है, किन संस्थाओं से करता है और उसके पास सूचना तथा बल की कितनी क्षमता है। यह कौटिल्य में सबसे साफ है, पर आंबेडकर के संवैधानिक नियंत्रण और नेहरू की नियोजन-आधारित राज्य-व्यवस्था में भी दिखता है। स्वतंत्रता आंदोलन वाला तरीका स्वराज, राष्ट्रवाद, प्रतिरोध और जन-संगठन को देखता है। तिलक, गांधी और शुरुआती अरविंद इसके केंद्र में हैं। सामाजिक बदलाव वाला तरीका पूछता है कि क्या केवल राजनीतिक आजादी जाति, गरीबी, लिंग असमानता और पुराने विशेषाधिकारों को मिटा सकती है। विवेकानंद नैतिक पुकार देते हैं, जबकि आंबेडकर, नेहरू और लोहिया अलग राजनीतिक रास्ते बताते हैं।
एक ही ढांचे पर तुलना करें। पहले मूल समस्या पहचानें—अव्यवस्था, विदेशी शासन, नैतिक कमजोरी, जाति या गरीबी। फिर राजनीतिक कर्ता पहचानें—राजा, राष्ट्र, गांव, नागरिक, उत्पीड़ित जाति या जन-आंदोलन। इसके बाद साधन देखें—दंड, शिक्षा, बहिष्कार, सत्याग्रह, संवैधानिक कानून, नियोजन या सविनय अवज्ञा। फिर संस्थाएं देखें—राजतंत्र, विकेंद्रीकृत ग्राम-जीवन, संसदीय लोकतंत्र, सुरक्षा उपाय, मजबूत केंद्र या चौखंभा राज्य। अंत में सीमा लिखें। कोई चिंतक प्रभुत्व के एक रूप को बहुत गहराई से समझ सकता है और दूसरे को कम महत्व दे सकता है। यह तरीका याद रहने वाले नारों को पूरा सिद्धांत मानने की गलती से बचाता है और उत्तर को जीवनी के बजाय राजनीति विज्ञान के अनुरूप बनाता है।
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