मुख्य तथ्य

  • राज्य एक टिकाऊ सार्वजनिक व्यवस्था है, जो आबादी, क्षेत्र, सरकार और संप्रभुता को जोड़ती है।
  • बल-प्रयोग राज्य को स्वैच्छिक संगठनों से अलग करता है, पर वैधता, कानून और सार्वजनिक तर्क तय करते हैं कि बल स्थिर सत्ता बन पाएगा या नहीं।
  • शास्त्रीय और आदर्शवादी विचार नैतिक उद्देश्य तथा सार्वजनिक हित पर जोर देते हैं, जबकि उदार सामाजिक-समझौता सिद्धांत पूछते हैं कि राजनीतिक सत्ता और व्यक्त...
  • हॉब्स अविभाजित संप्रभु के ज़रिए शांति को प्राथमिकता देते हैं, लॉक प्राकृतिक अधिकारों और सहमति से सरकार को सीमित करते हैं, और रूसो सामान्य इच्छा के ज़र...
  • बहुलवाद नीति को संगठित हितों की प्रतिस्पर्धा का नतीजा मानता है, जबकि अभिजन और नौकरशाही के सिद्धांत चेताते हैं कि संसाधन और संगठन लगातार असमान रहते हैं...

मुख्य बिंदु

  1. 1

    राज्य एक टिकाऊ सार्वजनिक व्यवस्था है, जो आबादी, क्षेत्र, सरकार और संप्रभुता को जोड़ती है। सरकार केवल उसकी ओर से काम करने वाली अस्थायी संस्थागत एजेंसी है।

  2. 2

    बल-प्रयोग राज्य को स्वैच्छिक संगठनों से अलग करता है, पर वैधता, कानून और सार्वजनिक तर्क तय करते हैं कि बल स्थिर सत्ता बन पाएगा या नहीं।

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    शास्त्रीय और आदर्शवादी विचार नैतिक उद्देश्य तथा सार्वजनिक हित पर जोर देते हैं, जबकि उदार सामाजिक-समझौता सिद्धांत पूछते हैं कि राजनीतिक सत्ता और व्यक्ति की आजादी में मेल कैसे बैठे।

  4. 4

    हॉब्स अविभाजित संप्रभु के ज़रिए शांति को प्राथमिकता देते हैं, लॉक प्राकृतिक अधिकारों और सहमति से सरकार को सीमित करते हैं, और रूसो सामान्य इच्छा के ज़रिए जन-स्वशासन को केंद्र में रखते हैं।

  5. 5

    बहुलवाद नीति को संगठित हितों की प्रतिस्पर्धा का नतीजा मानता है, जबकि अभिजन और नौकरशाही के सिद्धांत चेताते हैं कि संसाधन और संगठन लगातार असमान रहते हैं।

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    मार्क्सवादी नज़रिए राज्य को वर्ग-संबंधों के भीतर रखते हैं। बाद के विचार सापेक्ष स्वायत्तता, वर्चस्व और पूरी सामाजिक व्यवस्था को स्थिर रखने की ज़रूरत भी जोड़ते हैं।

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    नारीवादी और उत्तर-औपनिवेशिक नज़रिए बताते हैं कि दिखने में निष्पक्ष सार्वजनिक संस्थाएँ लिंग, नस्ल, जाति और औपनिवेशिक गैर-बराबरी को दोहरा सकती हैं।

  8. 8

    राज्य के कार्यों को सुरक्षा, कानून, अर्थव्यवस्था, विकास, कल्याण, नियमन और पर्यावरण से जुड़े कार्यों में बाँटा जा सकता है, पर उनका सही दायरा राजनीतिक बहस का विषय है।

  9. 9

    बड़ा संवैधानिक दायित्व अपने-आप प्रभावी राज्य नहीं बनाता। क्षमता, निष्पक्ष प्रशासन, वित्तीय संसाधन और स्थानीय पहुँच ज़रूरी हैं।

  10. 10

    भारतीय संविधान लोकतांत्रिक सत्ता, अधिकारों, संघवाद और सामाजिक बदलाव को जोड़ता है, इसलिए भारत को केवल न्यूनतम या पूरी तरह राज्य-नियंत्रित मॉडल में नहीं रखा जा सकता।

  11. 11

    वैश्वीकरण राज्य के साधन और काम के स्तर बदलता है, पर कानून, कर, पुनर्वितरण, संकट से निपटने और अंतरराष्ट्रीय वचन निभाने में उसकी भूमिका खत्म नहीं करता।

  12. 12

    भविष्य का राज्य संभवतः सक्षम, संवैधानिक और नेटवर्क से जुड़ा होगा, जिसकी सत्ता कई स्तरों में बँटेगी, लेकिन जिसकी सार्वजनिक जवाबदेही बनी रहेगी।

  13. 13

    परीक्षा के उत्तर में हर सिद्धांत की तुलना मनुष्य के बारे में उसकी धारणा, सत्ता के स्रोत, सामाजिक संघर्ष, पसंदीदा कार्यों, सीमाओं और वैधता की कसौटी पर करें।

राज्य का अर्थ, तत्व और विशिष्ट प्रकृति

राज्य एक निश्चित क्षेत्र में चलने वाली और समय के साथ बनी रहने वाली सार्वजनिक सत्ता की व्यवस्था है। इसकी सामान्य व्याख्या चार तत्वों को जोड़ती है: आबादी, निश्चित क्षेत्र, संगठित सरकार और संप्रभुता। इनमें से कोई तत्व अकेले पर्याप्त नहीं है। स्थिर सार्वजनिक व्यवस्था के बिना आबादी केवल समुदाय हो सकती है। सत्ता के बिना क्षेत्र सिर्फ़ भौगोलिक जगह है। स्वतंत्र सार्वजनिक व्यवस्था के बिना कोई सरकार उपनिवेश या स्थानीय निकाय का प्रशासन भी चला सकती है। संप्रभुता का अर्थ यह दावा है कि कानूनी व्यवस्था के भीतर किसी दूसरे संगठन के पास उससे ऊँची सामान्य सत्ता नहीं है। आधुनिक संविधान इस सत्ता के इस्तेमाल पर सीमाएँ लगाता है, पर इससे साधारण संगठन राज्य के बराबर नहीं हो जाते।

कुछ भेद साफ रखना ज़रूरी है। राज्य सरकार से अधिक टिकाऊ होता है। मंत्रालय और सत्तारूढ़ दल बदलते हैं, लेकिन संवैधानिक सार्वजनिक व्यवस्था जारी रहती है। समाज में परिवार, बाजार, धार्मिक संगठन, मजदूर संघ, आंदोलन और अनेक अनौपचारिक रिश्ते आते हैं। राज्य इसी बड़े क्षेत्र का एक खास, पर असाधारण रूप से शक्तिशाली संगठन है। राष्ट्र साझा पहचान, इतिहास या राजनीतिक आकांक्षा से बना समुदाय है, जबकि राज्य कानूनी और राजनीतिक संगठन है। एक राज्य में कई राष्ट्रीय पहचानें हो सकती हैं और एक राष्ट्रीय समुदाय कई राज्यों में बँटा हो सकता है। देश रोजमर्रा की भौगोलिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति है, हर संदर्भ में सटीक विश्लेषणात्मक विकल्प नहीं।

राज्य का सबसे खास साधन अधिकृत बल-प्रयोग का दावा है। पुलिस, अदालत, जेल और सशस्त्र बल आखिर में पालन करा सकते हैं। लेकिन केवल बल प्रभुत्व बताता है, पूरे राज्य की व्याख्या नहीं करता। स्थिर सत्ता के लिए वैधता भी चाहिए। इसके लिए लोग आमतौर पर पदों, नियमों या प्रक्रियाओं को आदेश देने योग्य मानते हों, भले उन्हें कोई खास फैसला पसंद न हो। कानून आदेशों को सामान्य और अनुमान लगाने योग्य बनाता है। प्रशासन उन्हें अमल में लाता है। कर साझा उद्देश्यों के लिए धन देता है। नागरिकता सदस्यता, अधिकार और कर्तव्य का दोतरफा संबंध बताती है। इस तरह राज्य एक साथ बल-संपन्न, कानूनी, प्रशासनिक, वित्तीय और प्रतीकात्मक व्यवस्था है।

इसकी प्रकृति के दो पहलू हैं। यह शांति, अधिकार और ऐसी साझा सुविधाएँ दे सकता है जिन्हें अलग-अलग व्यक्ति नहीं दे सकते। दूसरी ओर, केंद्रित सार्वजनिक सत्ता मनमानी भी बन सकती है। राजनीतिक सिद्धांत तीन सवालों से इस तनाव को समझता है: राज्य को कौन नियंत्रित करता है, वह किनके हित में काम करता है, और उसकी सत्ता किस कसौटी पर सही मानी जाए। परीक्षा में राज्य को केवल सरकार न लिखें और संप्रभुता को किसी व्यक्ति की असीम इच्छा न मानें। बेहतर परिभाषा संस्थागत क्षमता, कानूनी सत्ता, क्षेत्रीय पहुँच और वैध शासन के लगातार दावे को जोड़ती है।

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