शीत युद्ध, अमेरिकी वर्चस्व, संसाधन भू-राजनीति, पर्यावरण, आतंकवाद, परमाणु प्रसार और वैश्वीकरण
मुख्य तथ्य
- 1991 में सोवियत संघ के विघटन से अमेरिका-नेतृत्व वाला एकध्रुवीय दौर शुरू हुआ, फिर भी एकध्रुवीयता का अर्थ यह नहीं था कि वॉशिंगटन हर राज्य को आदेश दे सकत...
- पर्यावरण राजनीति पारिस्थितिक सीमाओं को विकास, न्याय और सुरक्षा से जोड़ती है, जबकि पेरिस समझौता सभी पर एक जैसे लक्ष्य थोपने के बजाय राष्ट्रीय योगदान और...
- सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1373 राज्यों से आतंकी वित्तपोषण रोकने को कहता है, पर आतंकवाद-रोधी कदमों पर मानवाधिकार और मानवीय कानून की जिम्मेदारियाँ बनी रहती...
मुख्य बिंदु
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शीत युद्ध एक द्विध्रुवीय राजनीतिक, वैचारिक और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता था जिसमें परमाणु निरोध ने महाशक्तियों का सीधा युद्ध रोका, लेकिन दुनिया भर में प्रॉक्सी संघर्ष फैले।
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1991 में सोवियत संघ के विघटन से अमेरिका-नेतृत्व वाला एकध्रुवीय दौर शुरू हुआ, फिर भी एकध्रुवीयता का अर्थ यह नहीं था कि वॉशिंगटन हर राज्य को आदेश दे सकता था या क्षेत्रीय विरोध मिट गया था।
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अमेरिकी वर्चस्व सैन्य पहुँच, डॉलर-केंद्रित वित्त, तकनीकी और सांस्कृतिक आकर्षण, गठबंधनों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के भीतर प्रभाव से मिलकर बना।
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आज की व्यवस्था को असमान या विवादित बहुध्रुवीयता कहना बेहतर है, क्योंकि अमेरिका अब भी बहुत शक्तिशाली है, पर चीन, रूस, भारत, यूरोपीय संघ और क्षेत्रीय शक्तियाँ नतीजों को सीमित करती हैं।
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संसाधन भू-राजनीति में तेल-गैस मार्ग, समुद्री सँकरे रास्ते, जल, भोजन, यूरेनियम और महत्त्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन शामिल हैं; प्रसंस्करण और ढुलाई पर नियंत्रण भंडार के मालिकाने जितना महत्त्वपूर्ण हो सकता है।
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पर्यावरण राजनीति पारिस्थितिक सीमाओं को विकास, न्याय और सुरक्षा से जोड़ती है, जबकि पेरिस समझौता सभी पर एक जैसे लक्ष्य थोपने के बजाय राष्ट्रीय योगदान और 5 साल के बढ़ते प्रयास वाले चक्र पर चलता है।
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आतंकवाद कोई एक विचारधारा नहीं, बल्कि राजनीतिक डर पैदा करने की एक पद्धति है; प्रभावी जवाब में पुलिस, खुफिया तंत्र, वित्तीय रोक, रोकथाम और कानूनसम्मत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग साथ चाहिए।
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सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1373 राज्यों से आतंकी वित्तपोषण रोकने को कहता है, पर आतंकवाद-रोधी कदमों पर मानवाधिकार और मानवीय कानून की जिम्मेदारियाँ बनी रहती हैं।
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परमाणु व्यवस्था निरोध, हथियार नियंत्रण और अप्रसार पर टिकी है, लेकिन असमान कानूनी दर्जे, धीमे निरस्त्रीकरण, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता, संवेदनशील तकनीक और गैर-राज्य समूहों के खतरे के कारण इसकी आलोचना होती है।
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वैश्वीकरण समृद्धि, जुड़ाव और नीतियों को एक-दूसरे से सीखने का मौका देता है, लेकिन लाभ और लागत बराबर नहीं बँटते; संकट, प्रतिबंध और सप्लाई रुकने से पूर्ण वैश्वीकरण-वापसी के बजाय विविधीकरण बढ़ा है।
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संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और जलवायु व्यवस्था जैसी संस्थाएँ अनिश्चितता घटाती और सौदेबाजी व्यवस्थित करती हैं, लेकिन वीटो, कमजोर अमल और असमान बातचीत-क्षमता उन्हें सीमित करते हैं।
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भारत की परीक्षा-उपयोगी स्थिति रणनीतिक स्वायत्तता है: सुधरे हुए बहुपक्षीय ढाँचे का समर्थन, आतंकवाद का विरोध, विश्वसनीय न्यूनतम निरोध, संसाधन विविधीकरण और विकास न्याय के साथ जलवायु जिम्मेदारी।
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अंतर्राष्ट्रीय राजनीति: अवधारणाएँ और अलग-अलग दृष्टिकोण
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति यह समझती है कि असमान शक्ति वाली दुनिया में राज्य, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, कंपनियाँ, सामाजिक आंदोलन और हथियारबंद समूह सीमा-पार अपने हित कैसे साधते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंध इसका बड़ा क्षेत्र है; अंतर्राष्ट्रीय राजनीति खास तौर पर सत्ता, संघर्ष, सौदेबाजी और लाभ के बँटवारे पर ध्यान देती है। संप्रभु राज्यों के ऊपर कोई विश्व सरकार नहीं है, इसलिए यथार्थवादी व्यवस्था को अराजक कहते हैं। यहाँ अराजकता का मतलब केंद्रीय शासक का अभाव है, लगातार अव्यवस्था नहीं। राज्य फिर भी नियम बना सकते हैं, संस्थाएँ खड़ी कर सकते हैं और सहयोग कर सकते हैं।
यथार्थवाद की शुरुआत अस्तित्व, शक्ति और अनिश्चितता से होती है। हांस मॉर्गेन्थाऊ ने राष्ट्रीय हित को शक्ति के रूप में समझने पर जोर दिया। केनेथ वाल्ट्ज के संरचनात्मक यथार्थवाद में क्षमताओं का बँटवारा—एकध्रुवीय, द्विध्रुवीय या बहुध्रुवीय—राज्यों के व्यवहार को आकार देता है। यह दृष्टिकोण हथियारों की होड़, गठबंधन, निरोध और संसाधन प्रतिस्पर्धा अच्छी तरह समझाता है, लेकिन घरेलू राजनीति, कानून और साझा विचारों को कम आँक सकता है।
उदारवादी दृष्टिकोण संस्था, लोकतंत्र, व्यापार और परस्पर निर्भरता पर जोर देते हैं। रॉबर्ट कीओहेन और जोसेफ नाय की जटिल परस्पर निर्भरता बताती है कि समाज कई रास्तों से जुड़े हैं, मुद्दों की कोई स्थायी ऊँच-नीच नहीं होती और सैन्य बल हर क्षेत्र में बराबर उपयोगी नहीं है। संस्था शक्ति को खत्म नहीं करती; वह सूचना की लागत घटाती, बार-बार बातचीत कराती और सौदेबाजी के नियम देती है। रचनावाद बताता है कि पहचान और मानक हितों को आकार देते हैं: मित्र देश और विरोधी देश के परमाणु हथियारों का राजनीतिक अर्थ अलग होता है। आलोचनात्मक और मार्क्सवादी दृष्टिकोण पूछते हैं कि वैश्विक बाजार, वित्त और असमान उत्पादन शृंखला से किसे लाभ मिलता है। नारीवादी विश्लेषण दिखाता है कि युद्ध, पलायन और प्रतिबंध अलग सामाजिक समूहों पर असुरक्षा का अलग बोझ डालते हैं।
इस पाठ्यक्रम में 3 फर्क महत्त्वपूर्ण हैं। शक्ति नतीजे प्रभावित करने की क्षमता है; वर्चस्व ऐसी अगुआई या प्रभुत्व है जिसे भौतिक ताकत, संस्थाएँ और कुछ सहमति सहारा देती हैं; ध्रुवीयता बड़ी क्षमताओं के बँटवारे का ढाँचा है। सुरक्षा राष्ट्रीय, सामूहिक, मानवीय, पर्यावरणीय या आर्थिक हो सकती है। सुरक्षाकरण में नेता किसी मुद्दे को असाधारण खतरा बताकर विशेष कदम माँगते हैं। इसलिए अच्छे उत्तर में भौतिक शक्ति के साथ नियम, विचार, घरेलू हित और न्याय भी जोड़ें। शीत युद्ध, अमेरिकी वर्चस्व, आतंकवाद, जलवायु सौदेबाजी, परमाणु नियंत्रण और वैश्वीकरण को कोई एक सिद्धांत पूरा नहीं समझाता; परीक्षा तुलना की यही क्षमता जाँचती है।
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