भारत में राष्ट्र-निर्माण, एकीकरण, राजनीतिक दल, दबाव समूह और सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन
मुख्य तथ्य
- राष्ट्र-निर्माण केवल क्षेत्रीय विलय नहीं है; इसमें राजनीतिक एकीकरण, लोकतांत्रिक वैधता, साझा नागरिकता, सामाजिक न्याय और विविधता का समायोजन एक साथ जुड़त...
- रियासतों के विलय ने शुरुआती क्षेत्रीय ढाँचा बनाया, जबकि संविधान ने उस समझौते को राज्यों के संघ में बदला और अनुच्छेद 3 के तहत संसद को राज्यों की सीमाएँ...
- भाषाई पुनर्गठन क्षेत्रवाद को केवल पुरस्कार देना नहीं था; उसने पहचान की बड़ी माँग को संघीय संस्थाओं में जगह देकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया।
- रजनी कोठारी की कांग्रेस प्रणाली शुरुआती प्रभुत्व को प्रतिस्पर्धी और गुटीय बताती है, कानूनी एकदलीय शासन नहीं;
- भारत की दलीय व्यवस्था कांग्रेस प्रभुत्व, 1967 के बाद विखंडन, 1989–2014 के गठबंधन दौर, 2014 के बाद राष्ट्रीय दल के नए प्रभुत्व और 2024 के बाद फिर बढ़ी...
मुख्य बिंदु
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राष्ट्र-निर्माण केवल क्षेत्रीय विलय नहीं है; इसमें राजनीतिक एकीकरण, लोकतांत्रिक वैधता, साझा नागरिकता, सामाजिक न्याय और विविधता का समायोजन एक साथ जुड़ते हैं।
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रियासतों के विलय ने शुरुआती क्षेत्रीय ढाँचा बनाया, जबकि संविधान ने उस समझौते को राज्यों के संघ में बदला और अनुच्छेद 3 के तहत संसद को राज्यों की सीमाएँ पुनर्गठित करने की शक्ति दी।
- 3
भाषाई पुनर्गठन क्षेत्रवाद को केवल पुरस्कार देना नहीं था; उसने पहचान की बड़ी माँग को संघीय संस्थाओं में जगह देकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया।
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रजनी कोठारी की कांग्रेस प्रणाली शुरुआती प्रभुत्व को प्रतिस्पर्धी और गुटीय बताती है, कानूनी एकदलीय शासन नहीं; विपक्षी गतिविधि और चुनाव वास्तविक बने रहे।
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भारत की दलीय व्यवस्था कांग्रेस प्रभुत्व, 1967 के बाद विखंडन, 1989–2014 के गठबंधन दौर, 2014 के बाद राष्ट्रीय दल के नए प्रभुत्व और 2024 के बाद फिर बढ़ी गठबंधन-निर्भरता से गुज़री।
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क्षेत्रीय दल भाषाई, सांस्कृतिक, जातिगत, जनजातीय और विकास-संबंधी दावों को आवाज़ देते हैं; वे संघीय प्रतिनिधित्व गहरा सकते हैं, पर व्यक्तित्व-केंद्रित या बहिष्कारी राजनीति भी बढ़ा सकते हैं।
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गठबंधन प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ाते और एकतरफा शासन पर रोक लगाते हैं, पर उन्हें साझा कार्यक्रम, समन्वय, सौदेबाज़ी और भरोसेमंद विधायी समर्थन चाहिए।
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दबाव समूह सामान्यतः सरकारी सत्ता हासिल करने के बजाय नीति को प्रभावित करना चाहता है, जबकि राजनीतिक दल उम्मीदवार उतारता और सार्वजनिक पदों पर नियंत्रण चाहता है।
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भारतीय दबाव समूहों में उद्योग संगठन, ट्रेड यूनियन, किसान संगठन, पेशेवर निकाय, जाति और समुदाय संगठन, मुद्दा-आधारित नेटवर्क तथा जनहित अभियान शामिल हैं।
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सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन दबाव समूहों से अधिक व्यापक और कई बार कम औपचारिक होते हैं; किसान, आदिवासी, दलित, पिछड़ा वर्ग, महिला, पर्यावरण और भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों ने एजेंडे और संस्थाओं को बदला है।
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विचार और अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा तथा संगठन बनाने की संवैधानिक स्वतंत्रताएँ संगठित हितों और आंदोलनों का लोकतांत्रिक आधार देती हैं, हालांकि उन पर उचित प्रतिबंध लग सकते हैं।
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सबसे अच्छा मूल्यांकन इनके आपसी संबंध से बनता है: दल हितों को समेटते हैं, दबाव समूह खास माँग रखते हैं, आंदोलन सार्वजनिक सवालों को नया रूप देते हैं, चुनाव सत्ता देते हैं और संघीय संस्थाएँ टकराव का समाधान करती हैं।
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राष्ट्र-निर्माण और एकीकरण: वैचारिक आधार
राष्ट्र-निर्माण वह लगातार चलने वाली कोशिश है जिसमें एक निश्चित भूभाग में रहने वाली आबादी को राजनीतिक समुदाय बनाया जाता है। इसके कम-से-कम 5 जुड़े आयाम हैं। क्षेत्रीय एकीकरण साझा अधिकार-क्षेत्र बनाता है। राजनीतिक एकीकरण ऐसी संस्थाएँ खड़ी करता है जिन्हें अलग-अलग क्षेत्र स्वीकार करें। सामाजिक एकीकरण जाति, धर्म, भाषा, जनजाति और लिंग के आर-पार समान नागरिकता फैलाता है। आर्थिक एकीकरण क्षेत्रों को जोड़ता है और असमान विकास से निपटता है। भावनात्मक एकीकरण यह भरोसा पैदा करता है कि मतभेद साझा संवैधानिक व्यवस्था के भीतर सुलझ सकते हैं। कोई देश एक आयाम में आगे और दूसरे में पीछे हो सकता है; इसलिए भूभाग का विलय ज़रूरी होते हुए भी राष्ट्र-निर्माण को अकेले पूरा नहीं करता।
राज्य-निर्माण और राष्ट्र-निर्माण में फर्क उपयोगी है। राज्य-निर्माण प्रशासनिक क्षमता, कर-व्यवस्था, सुरक्षा, अदालत और नियम-आधारित सरकार विकसित करता है। राष्ट्र-निर्माण अपनापन और वैध साझा पहचान बनाता है। लोकतांत्रिक भारत को दोनों काम करने थे, पर जबरन सांस्कृतिक एकरूपता से बचना भी था। संवैधानिक उत्तर न तो ढीला परिसंघ था, न सांस्कृतिक रूप से एक जैसे लोगों वाला एकात्मक राज्य। अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ कहता है और संघीय संस्थाएँ क्षेत्रीय दावों को राष्ट्रीय राजनीति तक लाती हैं। साथ ही एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएँ और मजबूत संघ व्यवस्था को बाँधने की क्षमता देते हैं।
इस पूरी कोशिश को 3 नजरियों से समझ सकते हैं। आत्मसातवादी नजरिया चाहता है कि अल्पसंख्यक और क्षेत्र प्रधान राष्ट्रीय संस्कृति अपना लें; इससे प्रशासन आसान हो सकता है, पर अलगाव बढ़ने का खतरा रहता है। बहुलवादी नजरिया भाषा, धर्म और सांस्कृतिक स्वायत्तता बचाता है; यह विविधता का सम्मान करता है, पर ऐसे संस्थान भी चाहता है जो सामाजिक अलगाव को राजनीतिक बहिष्कार न बनने दें। एकीकरणवादी नजरिया साझा नागरिकता बनाते हुए अनेक पहचानों को जगह देता है। भारत की भाषा नीति, संघीय ढाँचा, अल्पसंख्यक अधिकार और राज्यों का पुनर्गठन मुख्यतः इसी तीसरे नज़रिये को दिखाते हैं, हालांकि व्यवहार में तीनों का असर अलग-अलग समय पर दिखा है।
मुख्य तनाव एकता और एकरूपता के बीच है। एकता के लिए संवैधानिक प्रक्रिया के प्रति निष्ठा और टकराव का शांतिपूर्ण समाधान चाहिए; एकरूपता सबको एक जैसा बनाना चाहती है। भारतीय राष्ट्र-निर्माण तब मजबूत रहा जब उसने विविधता को चुनाव, अदालत, विधानमंडल और संघीय सौदेबाज़ी से संभाला। वह तब कमजोर पड़ा जब विकास की असमानता, सांप्रदायिक हिंसा, जातिगत प्रभुत्व या क्षेत्रीय उपेक्षा ने औपचारिक नागरिकता को असमान बना दिया। इसलिए एकीकरण 1947–50 में पूरी हुई घटना नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में संस्थाओं को टकराव को प्रतिनिधित्व, अधिकार और व्यावहारिक समझौते में बदलना पड़ता है।
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