मुख्य तथ्य

  • राजनीतिक अवधारणाएँ केवल वर्णन के औजार नहीं, बल्कि विवादित मानदंड भी हैं।
  • संप्रभुता में आंतरिक सर्वोच्चता और बाहरी स्वतंत्रता दोनों शामिल हैं, फिर भी संविधानवाद, संघवाद, अंतरराष्ट्रीय विधि और परस्पर निर्भरता उसके प्रयोग को आ...
  • स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप से मुक्ति और आत्मनिर्देशन की वास्तविक क्षमता दोनों आती हैं। दोनों में से कोई अर्थ हर रोक को अपने आप अनुचित नहीं बनाता।
  • समानता हर परिस्थिति में एक जैसा व्यवहार नहीं माँगती। वह पूछती है कि कौन-से अंतर प्रासंगिक हैं और किन वंचनाओं को सुधारना ज़रूरी है।
  • न्याय प्रक्रिया, वितरण, मान्यता, अधिकार और उपचार के आधार पर संस्थाओं को परखता है। इसलिए कोई नियम निष्पक्ष दिखते हुए भी अन्यायपूर्ण ढाँचा बना सकता है।

मुख्य बिंदु

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    राजनीतिक अवधारणाएँ केवल वर्णन के औजार नहीं, बल्कि विवादित मानदंड भी हैं। प्रतिद्वंद्वी व्याख्याओं और उनके संस्थागत परिणामों की तुलना से उनका अर्थ साफ होता है।

  2. 2

    संप्रभुता में आंतरिक सर्वोच्चता और बाहरी स्वतंत्रता दोनों शामिल हैं, फिर भी संविधानवाद, संघवाद, अंतरराष्ट्रीय विधि और परस्पर निर्भरता उसके प्रयोग को आकार देते हैं।

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    स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप से मुक्ति और आत्मनिर्देशन की वास्तविक क्षमता दोनों आती हैं। दोनों में से कोई अर्थ हर रोक को अपने आप अनुचित नहीं बनाता।

  4. 4

    समानता हर परिस्थिति में एक जैसा व्यवहार नहीं माँगती। वह पूछती है कि कौन-से अंतर प्रासंगिक हैं और किन वंचनाओं को सुधारना ज़रूरी है।

  5. 5

    न्याय प्रक्रिया, वितरण, मान्यता, अधिकार और उपचार के आधार पर संस्थाओं को परखता है। इसलिए कोई नियम निष्पक्ष दिखते हुए भी अन्यायपूर्ण ढाँचा बना सकता है।

  6. 6

    नागरिकता कानूनी दर्जे को नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक सदस्यता से जोड़ती है, जबकि लोकतांत्रिक नागरिकता में भागीदारी और बराबर सार्वजनिक सम्मान भी ज़रूरी हैं।

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    राष्ट्रवाद उपनिवेश-विरोधी स्वतंत्रता और एकजुटता को बल दे सकता है, पर उसका बहिष्कारी जातीय रूप सांस्कृतिक अपनापन को असमान नागरिकता में बदल सकता है।

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    शक्ति निर्णयों, एजेंडा पर नियंत्रण और पसंद को आकार देने के ज़रिए काम करती है। इसलिए वह खुली आज्ञा या शारीरिक बल से कहीं व्यापक है।

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    सत्ता शासन करने का स्वीकृत अधिकार है, जबकि वैधता बताती है कि उस अधिकार को उचित क्यों माना जाता है। बल से आज्ञापालन मिल सकता है, सत्ता या वैधता ज़रूरी नहीं।

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    वेबर के परंपरागत, करिश्माई और कानूनी-तार्किक प्रकार वैध सत्ता के अलग आधार बताते हैं। वे नैतिक श्रेष्ठता के क्रम में रखी तीन शासन-व्यवस्थाएँ नहीं हैं।

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    भारतीय संवैधानिक व्यवस्था लोक-संप्रभुता को न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, अधिकारों, प्रतिनिधित्व और जवाबदेह सार्वजनिक संस्थाओं से जोड़ती है।

  12. 12

    परीक्षा के अच्छे उत्तर में अवधारणा की परिभाषा, प्रतिद्वंद्वी नज़रिए, संबंधित विचारक, संस्थागत प्रयोग और अंत में संतुलित तुलना होनी चाहिए।

अवधारणाओं का नक्शा: वर्णन, मूल्यांकन और विवाद

राजनीतिक सिद्धांत तब शुरू होता है जब रोज सुनाई देने वाले राजनीतिक शब्द अपने आप साफ नहीं लगते। संप्रभुता, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, नागरिकता, राष्ट्रवाद, शक्ति, सत्ता और वैधता संस्थाओं का वर्णन करते हैं, पर उनका मूल्यांकन भी करते हैं। किसी आदेश को मान्य अधिकार से दिया गया कहना केवल यह बताना नहीं है कि उसका पालन हुआ। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आदेश देने का अधिकार मान्य था। किसी बँटवारे को न्यायपूर्ण कहना उस कसौटी का समर्थन करना है जिसके आधार पर लाभ और बोझ बाँटे जाने चाहिए। इसलिए ये अवधारणाएँ वर्णनात्मक भी हैं और मानदंड बताने वाली भी। इनके अर्थ पर विवाद रहता है। लोग स्वतंत्रता को मूल्यवान मान सकते हैं, फिर भी इस पर असहमत हो सकते हैं कि उसका मुख्य अर्थ हस्तक्षेप का अभाव, स्वशासन या अपनी क्षमताएँ विकसित करने की सामर्थ्य है।

लेक्चरर स्तर के विश्लेषण में 4 कदम उपयोगी हैं। पहला, मूल सवाल पहचानिए। संप्रभुता पूछती है कि अंतिम सार्वजनिक अधिकार कहाँ है। स्वतंत्रता पूछती है कि किन चुनावों की रक्षा होनी चाहिए। समानता पूछती है कि व्यवहार में कौन-से अंतर उचित हैं। न्याय पूछता है कि व्यक्ति और संस्था एक-दूसरे के प्रति क्या दायित्व रखते हैं। नागरिकता बराबर सदस्यता का दायरा बताती है। राष्ट्रवाद पूछता है कि कोई जनसमुदाय राजनीतिक समुदाय कैसे बनता है। शक्ति बताती है कि आचरण और परिणाम कैसे आकार लेते हैं। सत्ता शासन करने का मान्य अधिकार बताती है और वैधता पूछती है कि वह अधिकार स्वीकार करने योग्य क्यों है। दूसरा, पास-पास की अवधारणाओं में फर्क कीजिए। शक्ति बल के समान नहीं, सत्ता शक्ति के समान नहीं और राष्ट्रीयता नागरिकता के समान नहीं है।

तीसरा, प्रतिद्वंद्वी नजरियों की तुलना कीजिए। कानूनी नजरिया संप्रभुता को किसी निश्चित विधि-निर्माता में खोज सकता है, जबकि बहुलवादी नजरिया समाज में संगठित शक्ति के कई केंद्र देखता है। उदारवादी नजरिया प्रायः व्यक्ति और अधिकार से शुरू करता है। समाजवादी नजरिया वर्ग और भौतिक निर्भरता को सामने रखता है। नारीवादी नजरिया पूछता है कि सार्वजनिक और निजी का बँटवारा प्रभुत्व को कैसे छिपा सकता है। समुदायवादी नजरिया उन सामाजिक संबंधों को देखता है जो चुनाव को अर्थ देते हैं। ये केवल याद करने वाले नाम नहीं हैं। हर नजरिया स्वतंत्रता, असमानता या दायित्व के अलग स्रोत पर रोशनी डालता है।

चौथा, अवधारणा को संस्था और रोजमर्रा की स्थिति में परखिए। स्कूल का नियम इसलिए वैध हो सकता है कि सक्षम निकाय ने उसे बनाया, इसलिए स्वीकार हो सकता है कि विद्यार्थी प्रक्रिया को निष्पक्ष मानते हैं, या केवल दंड के डर से माना जा सकता है। ये क्रमशः कानूनी वैधता, उचित स्वीकृति और दबाव के अलग दावे हैं। इसी तरह हर विद्यार्थी को वही पुस्तक देना समान व्यवहार है, पर दिव्यांगता का सामना कर रहे विद्यार्थी को अतिरिक्त सहायता देना वास्तविक समानता को बेहतर ढंग से पूरा कर सकता है। ये सभी अवधारणाएँ मिलकर एक जुड़ा हुआ ढाँचा बनाती हैं। संप्रभुता नियम बनाती और लागू करती है। वैधता सत्ता को उचित ठहराती है। शक्ति तय करती है कि किन हितों को नियमों में जगह मिले। स्वतंत्रता और समानता सीमा तथा लक्ष्य देती हैं। न्याय पूरी व्यवस्था को परखता है। नागरिकता और राष्ट्रवाद उस समुदाय का दायरा तय करते हैं जिसके नाम पर व्यवस्था चलती है।

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