राजनीति विज्ञान की प्रकृति, क्षेत्र और महत्त्व; परंपरागत एवं आधुनिक दृष्टिकोण
मुख्य तथ्य
- राजनीति विज्ञान केवल सरकार का अध्ययन नहीं है। इसमें सत्ता, वैध अधिकार, राज्य, संस्थाएँ, व्यवहार, विचार, लोक नीति और राज्य के भीतर तथा बाहर के राजनीतिक...
- राजनीति सामूहिक फैसले बनाने और उन्हें चुनौती देने की जीवंत गतिविधि है, जबकि राजनीति विज्ञान उस गतिविधि का वर्णन, कारणों की व्याख्या और मूल्यांकन करने...
- इस विषय की प्रकृति दोहरी है। जो मौजूद है उसका अध्ययन अनुभवजन्य है, जबकि क्या न्यायपूर्ण, वैध या वांछनीय होना चाहिए, यह पूछना मानकीय है।
- इसका वैज्ञानिक स्वरूप व्यवस्थित प्रमाण, स्पष्ट अवधारणाओं, तुलना और संशोधन के लिए खुले स्पष्टीकरण पर टिका है, न कि इस दावे पर कि राजनीतिक जीवन पूरी तरह...
- परंपरागत दृष्टिकोण मुख्यतः दार्शनिक, ऐतिहासिक, कानूनी और संस्थागत थे। उनका खास ध्यान राज्य, संविधान, औपचारिक अंगों और अच्छी राजनीतिक व्यवस्था पर था।
मुख्य बिंदु
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राजनीति विज्ञान केवल सरकार का अध्ययन नहीं है। इसमें सत्ता, वैध अधिकार, राज्य, संस्थाएँ, व्यवहार, विचार, लोक नीति और राज्य के भीतर तथा बाहर के राजनीतिक संबंध शामिल हैं।
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राजनीति सामूहिक फैसले बनाने और उन्हें चुनौती देने की जीवंत गतिविधि है, जबकि राजनीति विज्ञान उस गतिविधि का वर्णन, कारणों की व्याख्या और मूल्यांकन करने वाला व्यवस्थित विषय है।
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इस विषय की प्रकृति दोहरी है। जो मौजूद है उसका अध्ययन अनुभवजन्य है, जबकि क्या न्यायपूर्ण, वैध या वांछनीय होना चाहिए, यह पूछना मानकीय है।
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इसका वैज्ञानिक स्वरूप व्यवस्थित प्रमाण, स्पष्ट अवधारणाओं, तुलना और संशोधन के लिए खुले स्पष्टीकरण पर टिका है, न कि इस दावे पर कि राजनीतिक जीवन पूरी तरह सार्वभौम नियमों से चलता है।
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परंपरागत दृष्टिकोण मुख्यतः दार्शनिक, ऐतिहासिक, कानूनी और संस्थागत थे। उनका खास ध्यान राज्य, संविधान, औपचारिक अंगों और अच्छी राजनीतिक व्यवस्था पर था।
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आधुनिक दृष्टिकोण ने व्यवहार, समूह, अभिजन, राजनीतिक संस्कृति, व्यवस्थाओं, अनौपचारिक संस्थाओं, लोक नीति, राजनीतिक अर्थव्यवस्था, लिंग, जाति और सामाजिक आंदोलनों को अध्ययन में जोड़ा।
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व्यवहारवाद ने अवलोकन, तुलना और शोध-पद्धति को मजबूत किया, लेकिन मूल्य-निरपेक्षता के उसके कठोर दावों की आलोचना हुई क्योंकि वे इतिहास, संस्थाओं, सत्ता-संरचनाओं और ज़रूरी नैतिक सवालों की उपेक्षा कर सकते थे।
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उत्तर-व्यवहारवाद ने अनुशासित शोध छोड़े बिना प्रासंगिकता और कार्रवाई पर जोर दिया, जबकि नए संस्थागत दृष्टिकोणों ने नियमों और संगठनों को कर्ताओं तथा विचारों से फिर जोड़ा।
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राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में राजनीतिक सिद्धांत, तुलनात्मक राजनीति, लोक प्रशासन और नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध, भारतीय राजनीति तथा उनसे जुड़े अंतर-विषयक अध्ययन आते हैं।
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इस विषय का महत्त्व अवधारणाएँ स्पष्ट करने, संस्थाओं और व्यवहार की व्याख्या करने, सत्ता की जाँच करने, सार्वजनिक विकल्पों को समझने और लोकतांत्रिक नागरिकता विकसित करने में है।
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भारत में संवैधानिक मूल्यों और वास्तविक राजनीतिक व्यवहार को साथ पढ़ना चाहिए। प्रस्तावना मानक देती है, जबकि संस्थाएँ और सामाजिक संबंध दिखाते हैं कि वे मानक व्यवहार में कैसे काम करते हैं।
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आलोचनात्मक ढंग से इस्तेमाल करने पर परंपरागत और आधुनिक दृष्टिकोण एक-दूसरे के पूरक हैं। संस्थाएँ व्यवहार को आकार देती हैं, व्यवहार संस्थाओं को बदलता है, तथ्य तर्कों को कसौटी पर रखते हैं और मूल्य मूल्यांकन को दिशा देते हैं।
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परीक्षा के उत्तर में राज्य और सरकार, राजनीति और राजनीति विज्ञान, मानकीय और अनुभवजन्य, तथा परंपरागत और आधुनिक का अंतर साफ करें, लेकिन इन्हें पूरी तरह विरोधी जोड़ों की तरह न लिखें।
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अच्छा समेकित उत्तर परिभाषा, आयाम, दृष्टिकोण, क्षेत्र, महत्त्व, सीमाएँ और भारतीय उदाहरण के क्रम में बढ़ता है तथा सजावटी उद्धरणों के बजाय अवधारणाओं और कारणों पर टिकता है।
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अर्थ और बौद्धिक संदर्भ
राजनीति विज्ञान राजनीतिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन है। इसके विषय में सत्ता, वैध अधिकार, राज्य, सरकार, कानून, संस्थाएँ, लोक नीति, राजनीतिक विचार, सामूहिक कार्रवाई, संघर्ष और सहयोग शामिल हैं। राजनीतिक शब्द उन गतिविधियों और संबंधों की ओर इशारा करता है जिनके ज़रिए कोई समुदाय सब पर लागू होने वाले फैसले लेता है, महत्त्वपूर्ण संसाधनों का बँटवारा करता है, मतभेदों को सुलझाता या संभालता है और तय करता है कि सत्ता का प्रयोग कौन करेगा। विज्ञान शब्द का अर्थ व्यवस्थित जाँच है। इसमें अवधारणाएँ साफ की जाती हैं, प्रमाण देखे जाते हैं, तुलना की जाती है और स्पष्टीकरण को सुधार के लिए खुला रखा जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि राजनीतिक घटनाओं की भविष्यवाणी ग्रहण जितनी सटीक हो सकती है।
इसलिए राजनीति और राजनीति विज्ञान का अंतर समझना ज़रूरी है। राजनीति एक गतिविधि है। नागरिक वोट देते हैं, दल प्रतिस्पर्धा करते हैं, आंदोलन लोगों को संगठित करते हैं, विधानमंडल विचार करते हैं, कार्यपालिका फैसले लेती है और न्यायालय नियमों की व्याख्या करते हैं। राजनीति विज्ञान इन गतिविधियों का वर्णन करता है, उनके कारण और परिणाम समझाता है तथा उनके न्याय या वैधता की जाँच करता है। चुनाव अभियान की रणनीति राजनीति का हिस्सा है, जबकि अलग-अलग समूहों ने अलग मतदान क्यों किया, इसका व्यवस्थित अध्ययन राजनीति विज्ञान है। फिर भी यह अंतर समझने की सुविधा के लिए है, कोई बंद दीवार नहीं। विद्वान भी समाज में स्थित नागरिक होते हैं और राजनीतिक कर्ता अक्सर शोध से निकली अवधारणाओं तथा प्रमाणों का उपयोग करते हैं।
लंबे समय तक राज्य को इस विषय का मुख्य केंद्र माना गया क्योंकि वह किसी भूभाग पर संप्रभु अधिकार का दावा करता है और सब पर लागू कानून बनाता है। सरकार उन व्यक्तियों और संस्थाओं का समूह है जो किसी समय सार्वजनिक अधिकार का प्रयोग करते हैं। सरकारें बदलती हैं, जबकि राज्य सामान्यतः बना रहता है। राष्ट्र साझा पहचान की भावना से जुड़ा समुदाय है, जबकि समाज में कई तरह के संबंध और संगठन होते हैं, जिनमें से केवल कुछ पर राज्य का सीधा नियंत्रण होता है। इन अंतरों से राज्य, सरकार, राष्ट्र और समाज को एक ही अर्थ में इस्तेमाल करने की आम गलती बचती है।
राजनीतिक क्षेत्र की सीमाएँ भी समय के साथ बदली हैं। अगर राजनीति को केवल मंत्रालय, विधानमंडल और न्यायालय तक सीमित कर दिया जाए, तो परिवार, कार्यस्थल, जातिगत संबंध, मीडिया व्यवस्था और सामाजिक आंदोलनों के भीतर की सत्ता दिखाई नहीं देगी। आधुनिक राजनीति विज्ञान पूछता है कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की सीमा कैसे बनती है, उससे किसके हित सधते हैं और देखने में निजी लगने वाली स्थितियों के सामूहिक कारण क्या हैं। इस विस्तार का अर्थ यह नहीं कि हर मानवीय काम समान रूप से राजनीतिक है। कोई मुद्दा तब राजनीतिक महत्त्व लेता है जब उसमें सत्ता, साझा नियम, सामूहिक परिणाम, सार्वजनिक दावे या लाभ और बोझ का बँटवारा जुड़ा हो।
परीक्षा में अच्छी शुरुआती परिभाषा में तीन बातें होनी चाहिए। पहला, यह व्यवस्थित अध्ययन है। दूसरा, इसके केंद्र में सत्ता है। तीसरा, यह सामूहिक सार्वजनिक जीवन से जुड़ा है। इसके बाद साफ करें कि विषय में औपचारिक संस्थाएँ और अनौपचारिक प्रक्रियाएँ, दोनों आती हैं तथा तथ्य और मूल्य, दोनों का अध्ययन होता है। इससे दो संकीर्ण परिभाषाएँ बचती हैं। पहली राजनीति विज्ञान को केवल राज्य का अध्ययन मानती है और दूसरी इसे केवल मौजूदा राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित करती है। दोनों में कुछ सच्चाई है, पर कोई भी आज के पूरे विषय को नहीं समेटती।
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