मुख्य तथ्य

  • ऐतिहासिक ज्ञान साहित्यिक, पुरातात्त्विक, अभिलेखीय, मुद्रात्मक, दफ्तरी, दृश्य और मौखिक प्रमाणों की तुलना से बनता है;
  • प्रागैतिहास को औज़ारों और जीवन-पद्धति के बदलाव से समझा जाता है; हड़प्पा जैसी अपठित लिपि वाली सभ्यता आद्य-इतिहास के दायरे में आती है।
  • ईसा-पूर्व 6वीं सदी में राज्य-निर्माण, नगर, लोहे का बढ़ता उपयोग, सिक्के, जैन और बौद्ध परम्पराएँ तथा मगध का उदय आपस में जुड़े हैं।
  • मौर्य, उत्तर-मौर्य, गुप्त, वर्धन, दक्कन और दक्षिण भारत को प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, कला और आदान-प्रदान के आधार पर तुलना करके पढ़ें।
  • दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य ने विजय के साथ राजस्व-अधिकार, पदबद्ध सेवा, प्रान्तीय नियंत्रण और क्षेत्रीय शक्तियों से समझौते का सहारा लिया।

मुख्य बिंदु

  1. 1

    ऐतिहासिक ज्ञान साहित्यिक, पुरातात्त्विक, अभिलेखीय, मुद्रात्मक, दफ्तरी, दृश्य और मौखिक प्रमाणों की तुलना से बनता है; कोई एक स्रोत अपने-आप में पूरा नहीं होता।

  2. 2

    प्रागैतिहास को औज़ारों और जीवन-पद्धति के बदलाव से समझा जाता है; हड़प्पा जैसी अपठित लिपि वाली सभ्यता आद्य-इतिहास के दायरे में आती है।

  3. 3

    ईसा-पूर्व 6वीं सदी में राज्य-निर्माण, नगर, लोहे का बढ़ता उपयोग, सिक्के, जैन और बौद्ध परम्पराएँ तथा मगध का उदय आपस में जुड़े हैं।

  4. 4

    मौर्य, उत्तर-मौर्य, गुप्त, वर्धन, दक्कन और दक्षिण भारत को प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, कला और आदान-प्रदान के आधार पर तुलना करके पढ़ें।

  5. 5

    दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य ने विजय के साथ राजस्व-अधिकार, पदबद्ध सेवा, प्रान्तीय नियंत्रण और क्षेत्रीय शक्तियों से समझौते का सहारा लिया।

  6. 6

    औपनिवेशिक विस्तार में सैनिक जीत, संधियाँ, सर्वोच्चता का दावा, भू-राजस्व बन्दोबस्त, कानूनी बदलाव और आर्थिक पुनर्गठन साथ-साथ चले।

  7. 7

    1857 का विद्रोह सैनिक बगावत भी था और अनेक क्षेत्रों में व्यापक जन-विद्रोह भी, लेकिन उसका फैलाव, नेतृत्व और लक्ष्य हर जगह एक जैसे नहीं थे।

  8. 8

    राष्ट्रीय आन्दोलन सुधार, सभाओं, प्रेस, जन-राजनीति, असहयोग, सविनय अवज्ञा, संवैधानिक बातचीत और विविध नेतृत्व के सहारे आगे बढ़ा।

  9. 9

    राजस्थान के इतिहास में पुरास्थल, राजवंश, प्रतिरोध और सहयोग, किसान-जनजातीय आन्दोलन, राजनीतिक जागरण, एकीकरण और कलाओं को जोड़कर पढ़ना चाहिए।

  10. 10

    यूरोपीय और विश्व इतिहास में पुनर्जागरण, धर्म-सुधार, क्रान्तियाँ, औद्योगीकरण, राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, विश्व युद्ध, फासीवाद, साम्यवाद, उपनिवेश-मुक्ति और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ परस्पर जुड़ी हैं।

  11. 11

    कालक्रम केवल ढाँचा है, पूरी व्याख्या नहीं; वस्तुनिष्ठ प्रश्न में कारण, तात्कालिक चिंगारी, प्रक्रिया, परिणाम और इतिहासकार की व्याख्या अलग पहचानें।

  12. 12

    आम उलझनों को स्रोत और व्याख्या, इकता और जागीर, मनसब और जागीर, विद्रोह और क्रान्ति तथा साम्राज्य और राष्ट्र-राज्य जैसे फर्क से सुलझाएँ।

इतिहास-पद्धति, स्रोत और प्रागैतिहास

इतिहास एक जाँच-पद्धति है

इतिहास समय के साथ हुए बदलावों का अनुशासित पुनर्निर्माण है। स्रोत बचा हुआ प्रमाण है, जबकि ऐतिहासिक विवरण उस प्रमाण से सवाल पूछकर, उसकी तुलना करके और उसके संदर्भ को समझकर बनाया गया अर्थ है। साहित्यिक स्रोतों में धार्मिक रचनाएँ, दरबारी इतिहास, जीवनियाँ, काव्य, विधि-ग्रन्थ और यात्रियों के वृत्तान्त आते हैं। भौतिक स्रोतों में बस्तियाँ, मिट्टी के बर्तन, औज़ार, अस्थियाँ, भवन, मूर्तियाँ और पर्यावरणीय अवशेष शामिल हैं। अभिलेख उपाधि, दान, प्रशासन, भाषा और शासकीय दावों की जानकारी देते हैं। सिक्कों से सत्ता, विनिमय, धातु, प्रतीक और कालक्रम समझे जाते हैं। दफ्तरी संग्रह में आदेश, पत्राचार, लगान के कागज़, अदालती रिकॉर्ड, समाचार-पत्र, नक्शे और चित्र मिलते हैं। मौखिक परम्परा सामाजिक स्मृति बचाती है, पर यह भी देखना पड़ता है कि उसे किस अवसर पर और किस रूप में दोहराया गया।

प्रमाण को कैसे परखें

हर स्रोत से पाँच सवाल पूछें: उसे किसने बनाया, कब बनाया, किसके लिए बनाया, उसका उद्देश्य क्या था और वह क्या नहीं बताता। राजकीय प्रशस्ति दानदाता का नाम ठीक दे सकती है, पर विजय को बढ़ा-चढ़ाकर भी दिखा सकती है। लगान की रिपोर्ट श्रेणियाँ साफ़ बताएगी, पर नज़र शासन के अधिकारी की होगी। पुरातत्त्व में सुन्दर वस्तु से अधिक उसका संदर्भ महत्वपूर्ण है—वह किस परत, स्थान और दूसरी वस्तुओं के साथ मिली तथा उसका काल कैसे तय हुआ। सापेक्ष काल-निर्धारण परतों और वस्तु-प्रकारों का क्रम बताता है; वैज्ञानिक विधियाँ प्रायः एक सम्भावित अवधि देती हैं, हर बार एक ही वर्ष नहीं। पुष्टि का अर्थ अलग प्रकार के स्वतंत्र स्रोत मिलाना है।

प्रागैतिहास और आद्य-इतिहास

जिस काल के पढ़े जा सकने वाले समकालीन लेख नहीं मिलते, उसे प्रागैतिहास कहा जाता है। पुरापाषाण का सामान्य सम्बन्ध शिकार-संग्रह और तराशे पत्थर के औज़ारों से, मध्यपाषाण का सूक्ष्म पाषाण औज़ारों और विविध आजीविका से, नवपाषाण का खाद्य-उत्पादन, घिसे पत्थर के औज़ार और गाँवों से तथा ताम्रपाषाण का पत्थर के साथ ताँबे और क्षेत्रीय खेती-बस्तियों से है। ये नाम पूरे भारत के लिए एक ही तारीख नहीं बताते। आद्य-इतिहास बीच का चरण है: लेखन मौजूद हो सकता है, पर लिपि पढ़ी न गई हो या जानकारी बाहर के लेखों से मिलती हो। हड़प्पा सभ्यता की लिपि अपठित होने के कारण उसका अध्ययन मुख्यतः पुरातत्त्व से होता है।

परीक्षा में सावधानी: प्रमाण और अनुमान अलग रखें। हल का नमूना प्रमाण है; किसानों की पूरी व्यवस्था का विवरण अनुमान होगा। पुरातत्त्व, अभिलेखशास्त्र, मुद्राशास्त्र, पुरालिपिशास्त्र और दफ्तरी अध्ययन को एक न मानें। काल-विभाजन समझने के औज़ार हैं; अलग क्षेत्रों में बदलाव एक साथ नहीं हुए।

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