गांधी युग एवं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1919-1947)
मुख्य तथ्य
- 1919 के रॉलेट सत्याग्रह ने औपनिवेशिक सरकार की असाधारण शक्तियों के विरोध को गांधी के पहले व्यापक अखिल भारतीय आंदोलन में बदला।
- असहयोग और खिलाफत के मेल ने राष्ट्रवाद का सामाजिक दायरा बढ़ाया, लेकिन 1922 की चौरी चौरा हिंसा के बाद गांधी ने आंदोलन रोक दिया।
- 1947 की आज़ादी ने औपनिवेशिक शासन समाप्त किया, लेकिन साथ में विभाजन, विस्थापन और सांप्रदायिक हिंसा आई, जिनके बीच गांधी ने शांति के लिए काम किया।
मुख्य बिंदु
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1919 के रॉलेट सत्याग्रह ने औपनिवेशिक सरकार की असाधारण शक्तियों के विरोध को गांधी के पहले व्यापक अखिल भारतीय आंदोलन में बदला।
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जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भारतीय जनमत और ब्रिटिश शासन के बीच नैतिक तथा राजनीतिक दूरी को बहुत गहरा कर दिया।
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गांधीवादी राजनीति ने सत्याग्रह और अहिंसा को जनभागीदारी, अनुशासित संगठन, रचनात्मक काम और बातचीत की तैयारी से जोड़ा।
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असहयोग और खिलाफत के मेल ने राष्ट्रवाद का सामाजिक दायरा बढ़ाया, लेकिन 1922 की चौरी चौरा हिंसा के बाद गांधी ने आंदोलन रोक दिया।
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रचनात्मक कार्यक्रम ने राजनीतिक आज़ादी को खादी, ग्रामोद्योग, सांप्रदायिक सद्भाव और छुआछूत-विरोध से जोड़ा।
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लाहौर अधिवेशन ने पूर्ण स्वतंत्रता को घोषित लक्ष्य बनाया और सविनय अवज्ञा आंदोलन की ज़मीन तैयार की।
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नमक अभियान ने रोज़मर्रा के औपनिवेशिक एकाधिकार को ऐसे प्रभावी प्रतीक में बदला जो राष्ट्रीय संप्रभुता को घरेलू कठिनाई से जोड़ता था।
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गांधी-इरविन समझौते और दूसरे गोलमेज सम्मेलन ने दिखाया कि जनसंघर्ष और बातचीत गांधीवादी रणनीति के बारी-बारी से अपनाए गए हिस्से थे।
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द्वितीय विश्वयुद्ध, कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफ़े, व्यक्तिगत सत्याग्रह और क्रिप्स मिशन की नाकामी ने भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि बनाई।
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वरिष्ठ नेताओं की तुरंत गिरफ्तारी के बाद भी भारत छोड़ो आंदोलन स्थानीय पहल, भूमिगत संपर्क, हड़तालों और कुछ जिलों में समानांतर सत्ता के सहारे चला।
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1947 की आज़ादी ने औपनिवेशिक शासन समाप्त किया, लेकिन साथ में विभाजन, विस्थापन और सांप्रदायिक हिंसा आई, जिनके बीच गांधी ने शांति के लिए काम किया।
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गांधी युग को राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ किसानों, मज़दूरों, महिलाओं, व्यापारिक समूहों, विद्यार्थियों और वंचित समुदायों के अलग-अलग उद्देश्यों से भी समझना चाहिए।
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1919: जन-राष्ट्रवाद की ओर निर्णायक मोड़
- 1919 निर्णायक इसलिए बना क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद भी युद्धकालीन पाबंदियाँ नहीं हटीं। सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली समिति की सिफ़ारिश पर औपनिवेशिक सरकार ने मुकदमे के बिना हिरासत जैसी असाधारण शक्तियाँ बनाए रखीं। गांधी ने इसे नागरिक स्वतंत्रता का ऐसा सवाल माना जो अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों को जोड़ सकता था। सत्याग्रह के आह्वान और 6 अप्रैल की हड़ताल के साथ गांधी ने पहली बार व्यापक अखिल भारतीय राजनीतिक अभियान का नेतृत्व किया।
- इस आंदोलन ने यह कठिनाई भी सामने रखी कि बहुत बड़े और विविध जनसमूह में अहिंसक अनुशासन कैसे कायम रहे। कुछ जगह हिंसा हुई और गांधी ने माना कि पर्याप्त तैयारी के बिना जुटी भीड़ नैतिक नियंत्रण से बाहर जा सकती है। आगे किसी आंदोलन को शुरू करने, सीमित रखने, रोकने या फिर चलाने के उनके फैसलों में यह चिंता लगातार रही।
- पंजाब औपनिवेशिक दमन का सबसे तीखा उदाहरण बना। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर सैनिकों ने निहत्थी सभा पर गोली चलाई। हत्याकांड और उसके बाद पंजाब में अपनाए गए ज़बरदस्ती के उपायों ने साम्राज्य के न्याय पर बचा हुआ भरोसा भी तोड़ दिया। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी नाइटहुड उपाधि लौटा दी और भारतीय जनमत ने जवाबदेही माँगी।
- सरकारी हंटर जाँच और कांग्रेस की जाँच ने ज़िम्मेदारी का अलग-अलग आकलन किया। इतिहास की दृष्टि से केवल तारीख याद करना पर्याप्त नहीं है; व्यवस्था बनाए रखने के सरकारी दावे और अधिकार, सम्मान तथा न्याय की भारतीय माँग के बीच बढ़ती दूरी समझना ज़रूरी है।
- 1919 की घटनाओं ने राष्ट्रवाद का पैमाना और भाषा बदल दी। पहले के संवैधानिक आंदोलन, स्थानीय सत्याग्रह और होम रूल राजनीति ने ज़मीन तैयार की थी, लेकिन रॉलेट-विरोध कई प्रांतों की सड़कों, बाज़ारों और मोहल्लों तक पहुँचा।
- गांधी ने न हर शिकायत पैदा की और न हर स्थानीय कार्रवाई को निर्देश दिया। उनके नेतृत्व ने सत्य, अहिंसा, आत्म-संयम और स्वेच्छा से कष्ट सहने की साझा नैतिक भाषा दी, जिसके सहारे अलग-अलग शिकायतें राष्ट्रीय संघर्ष का हिस्सा बन सकीं।
- खिलाफत का सवाल जल्दी ही एक और प्रभावी धारा बन गया। भारतीय मुस्लिम नेताओं ने युद्ध के बाद उस्मानी खलीफ़ा के साथ हुए व्यवहार का विरोध किया। गांधी ने इस मुद्दे का समर्थन किया और हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक साझेदारी बनाने की कोशिश की, क्योंकि उनके अनुसार संयुक्त असहयोग औपनिवेशिक सत्ता को अधिक मज़बूती से चुनौती दे सकता था।
- परीक्षा के लिए 1919 को जुड़ी हुई प्रक्रियाओं के समूह की तरह पढ़ें: दमनकारी कानून, देशव्यापी सत्याग्रह, पंजाब की त्रासदी, साम्राज्य की वैधता का क्षय और व्यापक सामुदायिक गठजोड़ की तलाश। इन्हीं प्रक्रियाओं ने असहयोग आंदोलन की तत्काल पृष्ठभूमि बनाई।
- संतुलित उत्तर निरंतरता भी दिखाता है। गांधी के तरीकों में दक्षिण अफ्रीका का अनुभव और चंपारण, अहमदाबाद तथा खेड़ा के संघर्ष शामिल थे; राष्ट्रीय आंदोलन के पास पहले से संगठन, नेता और क्षेत्रीय परंपराएँ भी थीं। बदलाव इन साधनों को जन-राजनीति के नए रूप में जोड़ने का था।
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