प्रागैतिहासिक काल एवं सिंधु (हड़प्पा) सभ्यता
मुख्य तथ्य
- प्रागैतिहासिक काल का पुनर्निर्माण मुख्यतः भौतिक अवशेषों से होता है क्योंकि लिखित अभिलेख नहीं मिलते, जबकि आद्य-ऐतिहासिक समाजों की लिपि उपलब्ध होकर भी अ...
- पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण चरणों को औज़ार परंपरा, जीवन-निर्वाह और बसावट के बदलावों से पहचाना जाता है;
- खाद्य उत्पादन, पशु-पालन और स्थायी ग्राम जीवन अलग-अलग क्षेत्रों में असमान गति से विकसित हुए तथा उन्होंने शिकार और संग्रह को तुरंत समाप्त नहीं किया।
- विकसित हड़प्पा चरण का प्रचलित काल लगभग 2600-1900 ईसा पूर्व है और इसे आरंभिक तथा परवर्ती हड़प्पा विकास के लंबे क्रम में समझना चाहिए।
- हड़प्पा नगरों में नियोजित सड़कें, मानकीकृत ईंटें, नालियाँ, जल प्रबंधन तथा सार्वजनिक और घरेलू स्थानों का अलग विन्यास दिखाई देता है।
मुख्य बिंदु
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प्रागैतिहासिक काल का पुनर्निर्माण मुख्यतः भौतिक अवशेषों से होता है क्योंकि लिखित अभिलेख नहीं मिलते, जबकि आद्य-ऐतिहासिक समाजों की लिपि उपलब्ध होकर भी अपठित रह सकती है।
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पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण चरणों को औज़ार परंपरा, जीवन-निर्वाह और बसावट के बदलावों से पहचाना जाता है; इनके लिए एक ही सार्वभौमिक तिथि तय नहीं की जा सकती।
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खाद्य उत्पादन, पशु-पालन और स्थायी ग्राम जीवन अलग-अलग क्षेत्रों में असमान गति से विकसित हुए तथा उन्होंने शिकार और संग्रह को तुरंत समाप्त नहीं किया।
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विकसित हड़प्पा चरण का प्रचलित काल लगभग 2600-1900 ईसा पूर्व है और इसे आरंभिक तथा परवर्ती हड़प्पा विकास के लंबे क्रम में समझना चाहिए।
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हड़प्पा नगरों में नियोजित सड़कें, मानकीकृत ईंटें, नालियाँ, जल प्रबंधन तथा सार्वजनिक और घरेलू स्थानों का अलग विन्यास दिखाई देता है।
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कृषि, पशुपालन, मछली पकड़ना और अनेक वनस्पति संसाधन अलग-अलग पर्यावरण वाले हड़प्पा क्षेत्रों की बस्तियों को आधार देते थे।
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विशेषज्ञ कारीगर शंख, पत्थर, फ़यॉन्स, धातु और मिट्टी पर काम करते थे, जबकि मानकीकृत बाट और मुहरें संगठित विनिमय में सहायक थीं।
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लंबी दूरी के संपर्क हड़प्पा समुदायों को कच्चे माल वाले क्षेत्रों और उपमहाद्वीप के पश्चिमी भूभागों से जोड़ते थे, पर विनिमय अपने आप राजनीतिक नियंत्रण सिद्ध नहीं करता।
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अपठित लिपि के कारण भाषा, शासकों और संस्थाओं के बारे में निश्चितता सीमित है; इसलिए पुरातात्विक व्याख्या साक्ष्य-आधारित और सावधान होनी चाहिए।
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कब्रों और घरों के अंतर सामाजिक विविधता दिखाते हैं, किंतु वे किसी सरल राजकीय या जातिगत पदानुक्रम को अपने आप प्रमाणित नहीं करते।
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लगभग 1900 ईसा पूर्व के बाद नगरीय संकुचन क्षेत्रीय बदलाव, बदली हुई बसावट और कई साझा भौतिक विशेषताओं के कम होने से जुड़ा था।
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मज़बूत उत्तर उत्खनित तथ्य और अनुमान को अलग रखता है, स्थलों की तुलना करता है, कालक्रम सावधानी से लिखता है और पूरी सभ्यता को एकरूप नहीं मानता।
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प्रागैतिहासिक काल: साक्ष्य, पद्धति और काल-विभाजन
प्रागैतिहासिक काल साक्ष्य-विहीन अतीत नहीं है; यह ऐसा इतिहास है जिसका पुनर्निर्माण पढ़े जा सकने वाले समकालीन लेखों के बिना किया जाता है। पुरातत्त्वविद किसी वस्तु का स्थान, उसकी परत, साथ मिली चीज़ें, पर्यावरणीय अवशेष और वैज्ञानिक तिथि—इन सबको जोड़कर निष्कर्ष निकालते हैं। परत से अलग कर दिया गया पत्थर का औज़ार अपना बहुत-सा अर्थ खो देता है, क्योंकि संदर्भ से उसकी आयु, उपयोग और दूसरी गतिविधियों से संबंध समझ आता है। आद्य-इतिहास उन समाजों के लिए उपयोगी श्रेणी है जिनकी जानकारी पुरातत्त्व, बाहरी उल्लेख या ऐसी लिपि से मिलती है जिसे अभी पढ़ा नहीं जा सका। हड़प्पा सभ्यता की लिपि के चिह्न बचे हैं, पर उनका सर्वमान्य पाठ नहीं है; इसलिए इसे प्रायः आद्य-ऐतिहासिक माना जाता है।
- सापेक्ष तिथि-निर्धारण जमावों और पुरावस्तुओं को पहले और बाद के क्रम में रखता है। बिना छेड़ी गई परत में नीचे का जमाव सामान्यतः ऊपर वाले से पुराना होता है, पर गड्ढे, जीवों की सुरंगें, पुनर्निर्माण और कटाव इस क्रम को बदल सकते हैं।
- प्रकार-वर्गीकरण औज़ारों, मृद्भांडों या आभूषणों को बार-बार मिलने वाले रूप और निर्माण तकनीक के आधार पर समूहित करता है। रूप में बदलाव कालक्रम, शिल्प की पसंद या सांस्कृतिक संपर्क बता सकता है, पर केवल समानता से दो समुदाय एक जैसे सिद्ध नहीं होते।
- निरपेक्ष तिथि-निर्धारण वैज्ञानिक विधियों से कैलेंडर आयु का अनुमान देता है। उपयुक्त जैविक अवशेषों के लिए रेडियोकार्बन विधि उपयोगी है, लेकिन परिणाम को नमूने, संभावित समय-सीमा और पुरातात्विक संदर्भ के साथ पढ़ना ज़रूरी है।
- पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण व्यापक तकनीकी तथा आर्थिक रुझान बताते हैं। ये चरण हर जगह एक ही समय शुरू या समाप्त नहीं हुए और पुरानी प्रथाएँ नई प्रथाओं के साथ चल सकती थीं।
- पुरापाषाण समुदाय शिकार, संग्रह और बदलती पत्थर-औज़ार परंपराओं से जुड़े हैं। निवास-तल, पत्थर निकालने और औज़ार बनाने की जगहें, पशु-अवशेष तथा औज़ार इनके साक्ष्य हैं; गुफा केवल एक संभावित निवास है।
- मध्यपाषाण संग्रहों में अक्सर छोटे पत्थर के औज़ार मिलते हैं जिन्हें सूक्ष्म पाषाण कहा जाता है। विविध खाद्य संसाधनों का बढ़ा उपयोग, मौसमी पड़ाव और कुछ आरंभिक पशु प्रबंधन दिख सकता है, लेकिन क्षेत्रीय क्रम अलग रहे।
- नवपाषाण संदर्भों में सामान्यतः खाद्य उत्पादन, घिसे-पॉलिश किए औज़ार, भंडारण, अनेक क्षेत्रों में मृद्भांड और अधिक टिकाऊ बस्तियाँ दिखती हैं। खेती और पशुपालन एकाएक हुई क्रांति नहीं, बल्कि धीरे चलने वाले प्रयोग थे।
- पुरा-वनस्पति अध्ययन संरक्षित बीज, अनाज, कोयला और पौधों की छाप जाँचता है। पशु-अवशेषों का पुरातात्विक अध्ययन अस्थियों, आयु-समूहों और काटने के निशानों को देखता है। दोनों मिलकर भोजन और पालतूकरण संबंधी दावों की जाँच करते हैं।
- शैलचित्र, कब्रें और आभूषण सामाजिक व्यवहार के संकेत दे सकते हैं, पर उनका अर्थ अपने आप साफ़ नहीं होता। निष्कर्ष में प्रत्यक्ष अवलोकन, तुलना से निकला अनुमान और अटकल अलग रखनी चाहिए।
राजस्थान लोक सेवा आयोग प्राध्यापक (विद्यालय शिक्षा) प्रथम श्रेणी के इतिहास पेपर द्वितीय के उत्तर में पहले साक्ष्य-आधार बताना चाहिए, फिर काल-विभाजन और उसकी सीमाएँ समझानी चाहिए। पूरे उपमहाद्वीप को एक ही समय बदलता हुआ दिखाना गलत होगा। बेहतर निष्कर्ष यह है कि तकनीक, भोजन जुटाने के तरीके और बसावट के रूप एक-दूसरे के साथ चलते रहे, जबकि स्थानीय पर्यावरण और कच्चे माल की उपलब्धता ने अलग रास्ते बनाए।
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