मुख्य तथ्य

  • रामदेव पीर 14वीं शताब्दी के रुणिचा, रामदेवरा, जैसलमेर क्षेत्र से जुड़े लोक देवता हैं;
  • दादू दयाल 1544–1603 ई. के निर्गुण संत और दादू पंथ के संस्थापक थे; उनकी दादू वाणी में लगभग 5,000 पद बताए जाते हैं।
  • मीराबाई लगभग 1498–1547 ई. की कृष्ण-भक्त संत थीं; ब्रज भाषा, राजस्थानी और गुजराती में लगभग 1,300 भजनों की परंपरा उनसे जुड़ी है।
  • ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती 1141–1236 ई. के सूफी संत थे; अजमेर से जुड़कर चिश्ती सिलसिले को राजस्थान में प्रमुख आधार मिला।
  • दिलवाड़ा मंदिर 11वीं–13वीं शताब्दी और रणकपुर मंदिर 15वीं शताब्दी के प्रमुख जैन तीर्थ हैं;

मुख्य बिंदु

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    राजस्थान के पंचपीर पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, मेहाजी मांगलिया और हड़बूजी माने जाते हैं; इनसे जुड़ी फड़ परंपरा भोपा-भोपी के गायन और चित्रित पट पर आधारित है।

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    रामदेव पीर 14वीं शताब्दी के रुणिचा, रामदेवरा, जैसलमेर क्षेत्र से जुड़े लोक देवता हैं; वे हिंदू और मुसलमान दोनों में रामसा पीर के रूप में पूजे जाते हैं।

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    गोगाजी ददरेवा, चुरू से जुड़े लोक देवता हैं; वे नागदेवता और मुसलमानों में ज़ाहिर पीर के रूप में प्रसिद्ध हैं।

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    दादू दयाल 1544–1603 ई. के निर्गुण संत और दादू पंथ के संस्थापक थे; उनकी दादू वाणी में लगभग 5,000 पद बताए जाते हैं।

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    मीराबाई लगभग 1498–1547 ई. की कृष्ण-भक्त संत थीं; ब्रज भाषा, राजस्थानी और गुजराती में लगभग 1,300 भजनों की परंपरा उनसे जुड़ी है।

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    ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती 1141–1236 ई. के सूफी संत थे; अजमेर से जुड़कर चिश्ती सिलसिले को राजस्थान में प्रमुख आधार मिला।

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    दिलवाड़ा मंदिर 11वीं–13वीं शताब्दी और रणकपुर मंदिर 15वीं शताब्दी के प्रमुख जैन तीर्थ हैं; ये राजस्थान की धार्मिक और स्थापत्य परंपरा के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।

राजस्थान की लोक आस्था में पंचपीर किसे कहा जाता है?

राजस्थान की लोक आस्था में पंचपीर पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, मेहाजी मांगलिया और हड़बूजी को कहा जाता है, जिन्हें अलग-अलग समुदायों ने रक्षक लोक देवता के रूप में मान्यता दी। आरपीएससी पाठ्यक्रम में धार्मिक जीवन के अंतर्गत धार्मिक समुदाय, संत-संप्रदाय और राजस्थान के लोक देवता जैसे 3 जुड़े हुए उपविषय साथ रखे गए हैं, इसलिए पंचपीर को केवल कथा नहीं बल्कि परीक्षा-योग्य धार्मिक-सांस्कृतिक ढाँचे के रूप में पढ़ना चाहिए। राजस्थान की लोक आस्था में ऐसे ऐतिहासिक या लोक-स्मृति से जुड़े नायक प्रमुख हैं जिन्हें समुदायों ने रक्षक देवता का स्थान दिया। पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, मेहाजी मांगलिया और हड़बूजी को मिलाकर पंचपीर कहा जाता है। “पीर” शब्द से ही इस परंपरा में हिंदू-मुस्लिम समन्वय का संकेत मिलता है। ये देवता सामान्यतः पशुधन, सर्पदंश, सामाजिक सुरक्षा, वचन-पालन और लोक-समानता से जुड़े हुए हैं।

इन लोक देवताओं की पूजा केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। फड़ परंपरा में देवता के जीवन और चमत्कारों को चित्रित कपड़े पर दिखाया जाता है और भोपा-भोपी रात में गीत-कथा के रूप में उनका वाचन करते हैं। पाबूजी री फड़ लगभग 15 फीट लंबी बताई जाती है और इसे भोपा रावणहत्था जैसे वाद्य के साथ प्रस्तुत करते हैं। राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड स्तर पर फड़, भोपा-भोपी और पंचपीर की परिभाषा तथा संबंधित देवताओं के नाम विशेष रूप से याद रखने योग्य हैं।

सार बात: लोक देवता राजस्थान की जन-आस्था, मौखिक साहित्य और सामुदायिक स्मृति को एक साथ जोड़ते हैं।

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