मुख्य तथ्य

  • ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में राजा राम मोहन रॉय ने कलकत्ता में की;
  • सती प्रथा को 1829 के विनियम सत्रह से लॉर्ड बेंटिक ने समाप्त किया; इसके पीछे राजा राम मोहन रॉय का लगातार अभियान महत्त्वपूर्ण था।
  • प्रार्थना समाज 1867 में आत्माराम पांडुरंग ने बॉम्बे में स्थापित किया; रानाडे और आर.जी. भंडारकर इसके प्रमुख नेता बने।
  • आर्य समाज की स्थापना 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने बॉम्बे में की; इसका जोर वेदों, मूर्तिपूजा-विरोध, शुद्धि और गुरुकुल शिक्षा पर था।
  • थियोसोफिकल सोसाइटी 1875 में न्यूयॉर्क में ब्लावात्स्की और ओल्कॉट ने बनाई; 1882 में इसका मुख्यालय अडयार, चेन्नई चला गया।

मुख्य बिंदु

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    ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में राजा राम मोहन रॉय ने कलकत्ता में की; यह एकेश्वरवाद, सती-विरोध, महिला शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह से जुड़ा प्रमुख सुधार संगठन था।

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    सती प्रथा को 1829 के विनियम सत्रह से लॉर्ड बेंटिक ने समाप्त किया; इसके पीछे राजा राम मोहन रॉय का लगातार अभियान महत्त्वपूर्ण था।

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    प्रार्थना समाज 1867 में आत्माराम पांडुरंग ने बॉम्बे में स्थापित किया; रानाडे और आर.जी. भंडारकर इसके प्रमुख नेता बने।

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    आर्य समाज की स्थापना 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने बॉम्बे में की; इसका जोर वेदों, मूर्तिपूजा-विरोध, शुद्धि और गुरुकुल शिक्षा पर था।

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    थियोसोफिकल सोसाइटी 1875 में न्यूयॉर्क में ब्लावात्स्की और ओल्कॉट ने बनाई; 1882 में इसका मुख्यालय अडयार, चेन्नई चला गया।

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    रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में स्वामी विवेकानंद ने की; इसने वेदांत को सामाजिक सेवा और आत्मसम्मान से जोड़ा।

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    अलीगढ़ आंदोलन सर सैयद अहमद खाँ से जुड़ा था; 1875 की मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल संस्था आगे चलकर 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बनी।

  8. 8

    ज्योतिराव फुले के सत्यशोधक समाज और बी.आर. अम्बेडकर के महाड सत्याग्रह ने जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता को सीधी चुनौती दी।

सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि क्या थी?

सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में धर्म, जाति, महिला-अधिकार, शिक्षा और सामाजिक समानता पर उठी नई बहसों से बनी, जिसमें अंग्रेज़ी शिक्षा, मुद्रण, समाचार-पत्र और उदार विचारों ने भारतीय समाज को भीतर से सुधारने की दिशा दी। 19वीं और 20वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन आधुनिक भारत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण मोड़ थे। इनका संबंध धर्म, जाति, महिला-अधिकार, शिक्षा और सामाजिक समानता से था। अंग्रेज़ी शिक्षा, मुद्रण, समाचार-पत्र और पश्चिमी उदार विचारों ने भारतीय सुधारकों को अपने समाज की कुरीतियों पर नए ढंग से सोचने का अवसर दिया। एनसीईआरटी की कक्षा 8 इतिहास पाठ्य-सामग्री बताती है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से किताबों, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, पर्चों और मुद्रित सामग्री ने सामाजिक प्रथाओं पर बहस को पहले से कहीं अधिक व्यापक बनाया। साथ ही सुधारकों ने भारतीय परंपरा को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे तर्क, शास्त्र और आधुनिक ज़रूरतों के आधार पर समझने की कोशिश की।

इन आंदोलनों का मुख्य लक्ष्य समाज को भीतर से सुधारना था। धार्मिक क्षेत्र में एकेश्वरवाद, मूर्तिपूजा-विरोध, कर्मकांड-विरोध और धार्मिक शुद्धि पर जोर दिखा। सामाजिक क्षेत्र में सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, अस्पृश्यता, जाति-भेद और महिला शिक्षा जैसे मुद्दे केंद्र में रहे। बौद्धिक क्षेत्र में तर्कवाद, पत्रकारिता, आधुनिक शिक्षा और देशी भाषाओं में चर्चा बढ़ी। जनगणना 2011 के अनुसार भारत की साक्षरता दर 74.04% थी, इसलिए शिक्षा और सार्वजनिक बहस को सामाजिक परिवर्तन की लंबी प्रक्रिया से जोड़कर समझना परीक्षा में उपयोगी है।

याद रखने योग्य बात: उद्देश्य केवल धर्म बदलना नहीं था, बल्कि समाज को शिक्षा, समानता और तर्क के आधार पर नए रूप में संगठित करना था।

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