स्वास्थ्य शिक्षा और खिलाड़ियों के लिए पोषण
मुख्य तथ्य
- 7 अप्रैल 1948 को WHO संविधान लागू हुआ; स्वास्थ्य को केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कुशलता की स्थिति माना गया।
- 1978 की अल्मा-अता घोषणा ने प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को “सभी के लिए स्वास्थ्य” के लक्ष्य से जोड़ा;
- 1986 के ओटावा चार्टर ने स्वास्थ्य संवर्धन को स्वस्थ सार्वजनिक नीति, सहायक वातावरण, सामुदायिक भागीदारी, व्यक्तिगत कौशल और स्वास्थ्य सेवाओं के पुनर्गठन...
- 1975 में शुरू ICDS ने छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के पोषण और स्वास्थ्य को आंगनवाड़ी तंत्र से जोड़ा।
- 1995 में राष्ट्रीय स्तर पर मध्याह्न भोजन योजना शुरू हुई; विद्यालयी पोषण, नामांकन और उपस्थिति से इसका सीधा संबंध है।
मुख्य बिंदु
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7 अप्रैल 1948 को WHO संविधान लागू हुआ; स्वास्थ्य को केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कुशलता की स्थिति माना गया।
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1978 की अल्मा-अता घोषणा ने प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को “सभी के लिए स्वास्थ्य” के लक्ष्य से जोड़ा; स्कूल और समुदाय इसमें व्यवहार-परिवर्तन के मुख्य स्थल हैं।
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1986 के ओटावा चार्टर ने स्वास्थ्य संवर्धन को स्वस्थ सार्वजनिक नीति, सहायक वातावरण, सामुदायिक भागीदारी, व्यक्तिगत कौशल और स्वास्थ्य सेवाओं के पुनर्गठन से जोड़ा।
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1975 में शुरू ICDS ने छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के पोषण और स्वास्थ्य को आंगनवाड़ी तंत्र से जोड़ा।
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1995 में राष्ट्रीय स्तर पर मध्याह्न भोजन योजना शुरू हुई; विद्यालयी पोषण, नामांकन और उपस्थिति से इसका सीधा संबंध है।
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खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत FSSAI खाद्य सुरक्षा, मानक और लेबलिंग से जुड़ी प्रमुख राष्ट्रीय संस्था है।
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2019 में शुरू फिट इंडिया अभियान ने दैनिक सक्रियता, फिटनेस और स्वस्थ जीवनशैली को जन-आंदोलन के रूप में आगे रखा।
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स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा क्या है?
स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा यह है कि व्यक्ति और समुदाय को स्वास्थ्य का सही ज्ञान, स्वस्थ दृष्टिकोण और रोजमर्रा की व्यवहारिक आदतें सिखाई जाएँ, ताकि स्वास्थ्य केवल रोग-इलाज का विषय न रहकर जीवनशैली और रोकथाम का हिस्सा बने। स्वास्थ्य शिक्षा ऐसी सुनियोजित शिक्षा है जो व्यक्ति और समुदाय को स्वास्थ्य-संबंधी सही ज्ञान, स्वस्थ दृष्टिकोण और व्यवहारिक आदतें देती है। इसका लक्ष्य केवल सूचना देना नहीं है; लक्ष्य यह है कि बच्चा स्वच्छता रखे, संतुलित भोजन चुने, नशे से बचे, नियमित शारीरिक गतिविधि करे, रोग-निरोध समझे और ज़रूरत पड़ने पर स्वास्थ्य सेवा लेने में संकोच न करे। डब्ल्यूएचओ की स्वास्थ्य अवधारणा के कारण परीक्षा में स्वास्थ्य को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक तीनों पक्षों से जोड़कर समझना ज़रूरी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में सरकार के स्वास्थ्य व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 1.15% से बढ़ाकर 2025 तक 2.5% करने का लक्ष्य दिया गया था, इसलिए स्वास्थ्य शिक्षा को नीति में निवारक और संवर्धनात्मक दृष्टि से जोड़कर पढ़ना चाहिए।
स्वास्थ्य शिक्षा का दायरा व्यक्तिगत आदतों से शुरू होकर परिवार, स्कूल और समुदाय तक जाता है। हाथ धोना, दांतों की सफाई, सुरक्षित पानी, शौचालय का उपयोग, मासिक धर्म स्वच्छता, नींद, टीकाकरण, रोगों की शुरुआती पहचान, सड़क-सुरक्षा और खेल-सुरक्षा इसके सामान्य विषय हैं। पीटीआई के लिए यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मैदान, कक्षा और प्रार्थना-सभा तीनों जगह स्वास्थ्य संदेश व्यवहार में बदले जा सकते हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 ने भारत की स्वास्थ्य-नीति में निवारक और संवर्धनात्मक दृष्टि को प्रमुख महत्व दिया। इसलिए परीक्षा में स्वास्थ्य शिक्षा को केवल रोग-इलाज से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की स्वस्थ आदतों और समुदाय-आधारित रोकथाम से जोड़कर पढ़ना चाहिए।
सार यही है: स्वास्थ्य शिक्षा ज्ञान को आदत में बदलने की प्रक्रिया है, केवल भाषण या सूचना-पट नहीं।
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