मुख्य तथ्य

  • गुर्जर-प्रतिहारों ने 8वीं-10वीं शताब्दी में राजस्थान, मालवा और कन्नौज को जोड़कर पश्चिमी भारत की मजबूत राजनीतिक शक्ति बनाई।
  • मिहिर भोज का काल लगभग 836-885 माना जाता है; उनकी आदिवराह मुद्राएँ प्रतिहार सत्ता और वैष्णव प्रतीक से जुड़ी हैं।
  • बप्पा रावल को मेवाड़ की संस्थापक स्मृति और हम्मीर सिंह को 1326 के आसपास चित्तौड़ पुनः प्राप्त करने वाले सिसोदिया पुनरुत्थान से जोड़ा जाता है।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने 1191 में तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गोरी को हराया, पर 1192 के दूसरे युद्ध में चौहान शक्ति को निर्णायक आघात लगा।
  • राणा कुम्भा ने 1433-1468 के शासन में चित्तौड़, कुंभलगढ़, विजय स्तंभ, संगीत और मंदिर संरक्षण से मेवाड़ की प्रतिष्ठा बढ़ाई।

मुख्य बिंदु

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    गुर्जर-प्रतिहारों ने 8वीं-10वीं शताब्दी में राजस्थान, मालवा और कन्नौज को जोड़कर पश्चिमी भारत की मजबूत राजनीतिक शक्ति बनाई।

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    मिहिर भोज का काल लगभग 836-885 माना जाता है; उनकी आदिवराह मुद्राएँ प्रतिहार सत्ता और वैष्णव प्रतीक से जुड़ी हैं।

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    बप्पा रावल को मेवाड़ की संस्थापक स्मृति और हम्मीर सिंह को 1326 के आसपास चित्तौड़ पुनः प्राप्त करने वाले सिसोदिया पुनरुत्थान से जोड़ा जाता है।

  4. 4

    पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने 1191 में तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गोरी को हराया, पर 1192 के दूसरे युद्ध में चौहान शक्ति को निर्णायक आघात लगा।

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    राणा कुम्भा ने 1433-1468 के शासन में चित्तौड़, कुंभलगढ़, विजय स्तंभ, संगीत और मंदिर संरक्षण से मेवाड़ की प्रतिष्ठा बढ़ाई।

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    राव जोधा ने 1459 में जोधपुर और मेहरानगढ़ की स्थापना कर मारवाड़ की राजधानी को मंडोर से अधिक सुरक्षित पहाड़ी आधार पर पहुँचाया।

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    सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1727 में जयपुर बसाया और जंतर मंतर वेधशालाओं से कछवाहा सत्ता को नगर-योजना तथा खगोल-ज्ञान से जोड़ा।

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    1818 की संधियों के बाद राजपूताना के प्रमुख राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी की सुरक्षा और ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन आ गए।

गुर्जर-प्रतिहारों ने राजस्थान के प्रारंभिक मध्यकाल को कैसे आकार दिया?

गुर्जर-प्रतिहारों ने पश्चिमी भारत में सीमांत रक्षा, कन्नौज की साम्राज्यिक राजनीति और राजस्थान की मंदिर-कला के जरिए प्रारंभिक मध्यकाल की मजबूत ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बनाई। भारत की जनगणना 2011 के अनुसार राजस्थान की कुल आबादी 6,85,48,437 थी, इसलिए ऐसे बड़े प्रदेश की मध्यकालीन नींव समझते समय प्रतिहारों के क्षेत्रीय आधार को केवल कन्नौज तक सीमित करके नहीं पढ़ना चाहिए।

गुर्जर-प्रतिहार राजवंश 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच पश्चिमी भारत की बड़ी शक्ति था। 712 में सिंध पर अरब अधिकार के बाद पश्चिमी सीमांत पर प्रतिरोध की स्मृति नागभट्ट प्रथम से जोड़ी जाती है। मंडोर, जालोर और मारवाड़-मालवा क्षेत्र प्रतिहार प्रभाव के महत्त्वपूर्ण आधार रहे। कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष में प्रतिहार, बंगाल के पाल और दक्कन के राष्ट्रकूट आमने-सामने थे। वत्सराज, नागभट्ट द्वितीय और मिहिर भोज जैसे शासकों के समय प्रतिहार शक्ति उत्तर भारत की साम्राज्यिक राजनीति से सीधे जुड़ी।

मिहिर भोज का काल लगभग 836 से 885 माना जाता है। उनके समय कन्नौज प्रतिहार सत्ता का प्रमुख केंद्र बना और प्रभाव राजस्थान, मालवा तथा गंगा-मैदान तक फैला। उनकी आदिवराह मुद्राएँ राजसत्ता, वैष्णव प्रतीक और विनिमय-व्यवस्था का उच्च-उपयोगी तथ्य हैं। राजस्थान में ओसियां के 8वीं से 11वीं शताब्दी के जैन और वैष्णव मंदिर, सूर्य मंदिर, महावीर मंदिर और आभानेरी का हर्षत माता मंदिर प्रतिहार कालीन कला-संरक्षण से जोड़े जाते हैं। महिपाल के बाद सामंतों की स्वायत्तता बढ़ी और 10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में चौहान, गुहिल, परमार, चंदेल और तोमर अधिक खुलकर उभरे।

याद रखें: प्रतिहारों को केवल कन्नौज से नहीं, बल्कि राजस्थान के मंदिरों, सीमांत रक्षा और बाद के राजपूत घरानों की पृष्ठभूमि से भी पढ़ना है।

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