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RAS प्रश्न

दक्षिणी राजस्थान के भील और अन्य जनजातीय समुदाय आजीविका के लिए पारंपरिक रूप से कौन-सा वन उत्पाद एकत्र नहीं करते?

सही उत्तर: (D) केसर (कुमकुम) की खेती।

केसर की खेती दक्षिणी राजस्थान के भील और अन्य जनजातीय समुदायों द्वारा आजीविका के लिए पारंपरिक रूप से एकत्र की जाने वाली वन उपज नहीं है।

  1. (A)

    महुआ के फूल (शराब बनाने और खाने के लिए)

  2. (B)

    तेंदू पत्ते (बीड़ी बनाने के लिए)

  3. (C)

    लाख (शेलैक उत्पादन के लिए)

  4. (D)

    केसर (कुमकुम) की खेती

व्याख्या

वन-आधारित आजीविका और किसी खास कृषि-क्षेत्र की फसल में अंतर होता है। दक्षिणी राजस्थान की जनजातियां आजीविका के लिए महुआ, तेंदू पत्ता, लाख, गोंद और ऐसी अन्य लघु वन उपज पर पारंपरिक रूप से निर्भर रही हैं। महुआ फूल, तेंदू पत्ता और लाख सीधे वन से मिलने वाली उपज हैं, इसलिए वे जनजातीय संग्रह-आधारित आजीविका से जुड़ते हैं। इसके उलट केसर की खेती राजस्थान के जनजातीय समुदायों की परंपरागत वन-उपज गतिविधि नहीं है; केसर मुख्यतः कश्मीर के पम्पोर क्षेत्र में उगाया जाता है। APEDA के जम्मू और कश्मीर पृष्ठ के अनुसार कश्मीरी केसर जम्मू और कश्मीर के भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ा है। इसलिए सही विकल्प D है।

बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं

  • (A) महुआ के फूल दक्षिणी राजस्थान की जनजातियों के लिए पारंपरिक वन-उपज संग्रह और आजीविका से जुड़े हैं, इसलिए यह “एकत्र नहीं करते” वाला विकल्प नहीं हो सकता।
  • (B) तेंदू पत्ते बीड़ी बनाने से जुड़े हैं और जनजातीय परिवारों की आजीविका का प्रमुख स्रोत मानी जाने वाली वन उपज हैं, इसलिए यह पारंपरिक रूप से एकत्र की जाने वाली उपज है।
  • (C) कुसुम और बेर के पेड़ों से लाख का संग्रह राजस्थान में पारंपरिक जनजातीय आजीविका गतिविधि है, इसलिए लाख गलत विकल्प नहीं है।

अवधारणा

राजस्थान भूगोल में जनजातीय आजीविका और लघु वन उपज की पहचान महत्वपूर्ण है। RAS में क्षेत्रीय समुदाय, संसाधन और आर्थिक गतिविधि को साथ जोड़कर समझना पड़ता है।

स्रोत

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