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RAS प्रश्न

राजस्थान भारत के कुल गुआर (क्लस्टर बीन) उत्पादन का 80% से अधिक हिस्सा पैदा करता है। निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प इस बढ़त की सबसे सटीक व्याख्या करता है और यह भी सही बताता है कि गुआर पशुधन क्षेत्र के लिए किस प्रकार उपयोगी है?

सही उत्तर: (B) गुआर सूखा सहने और नाइट्रोजन स्थिर करने की क्षमता के कारण राजस्थान के शुष्क, बलुई, कम वर्षा वाले क्षेत्रों के अनुकूल है; इसके हॉल्म (भूसा और तने) इस क्षेत्र में पशुधन के लिए सूखे चारे का एक प्रमुख स्रोत हैं।।

भारत के कुल गुआर उत्पादन का 80% से अधिक राजस्थान में होता है, क्योंकि यह सूखा सहने वाली दलहनी फसल शुष्क, रेतीले और कम वर्षा वाले क्षेत्रों के अनुकूल है। कटाई के बाद इसके सूखे तने और पत्ते पशुधन के लिए महत्वपूर्ण सूखा चारा भी देते हैं।

  1. (A)

    गुआर राजस्थान की भारी मानसूनी वर्षा और चिकनी मिट्टी में पनपता है; इसके बीजों का उपयोग बाजरे की जगह पशुओं के मुख्य अनाज-आहार के रूप में होता है।

  2. (B)

    गुआर सूखा सहने और नाइट्रोजन स्थिर करने की क्षमता के कारण राजस्थान के शुष्क, बलुई, कम वर्षा वाले क्षेत्रों के अनुकूल है; इसके हॉल्म (भूसा और तने) इस क्षेत्र में पशुधन के लिए सूखे चारे का एक प्रमुख स्रोत हैं।

  3. (C)

    गुआर राजस्थान के सिंचित नहर क्षेत्र में उगाया जाता है; इसका उपयोग मुख्यतः अधिक उत्पादन देने वाले संकर मवेशियों के लिए हरे चारे और साइलेज के रूप में होता है।

  4. (D)

    सरकार द्वारा खेती का अनिवार्य कोटा तय होने के कारण राजस्थान गुआर उत्पादन में अग्रणी है; गुआर की फलियाँ प्रोटीन पूरक के रूप में सीधे मुर्गी पालन में खिलाई जाती हैं।

व्याख्या

गुआर उत्पादन में राजस्थान की बढ़त का कारण यहाँ की खेती के अनुकूल परिस्थितियाँ हैं, न कि सरकारी कोटा या नहरों से सिंचाई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की Indian Farming पत्रिका गुआर को शुष्क क्षेत्रों की महत्वपूर्ण, सूखा सहने वाली ग्रीष्मकालीन दलहनी फसल बताती है। भारत में गुआर की खेती और उत्पादन, दोनों में राजस्थान की हिस्सेदारी लगभग 80% है और यह फसल खास तौर पर देश के शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाती है। पश्चिमी राजस्थान में जोधपुर, बाड़मेर, नागौर और बीकानेर जैसे जिलों की रेतीली मिट्टी और कम वर्षा इसके लिए उपयुक्त हैं। यह कम पानी में टिक जाती है और इसकी जड़ों की ग्रंथियाँ नाइट्रोजन स्थिर करती हैं, इसलिए यह ऐसी कम उपजाऊ वर्षा-आधारित भूमि पर भी उगाई जा सकती है जहाँ ज़्यादा पानी माँगने वाली फसलें नहीं पनपतीं। गुआर के बीज पशुधन के मुख्य दाने के रूप में बाजरे की जगह नहीं लेते। फलियाँ तोड़ने के बाद बचे सूखे तने और पत्ते, यानी फसल-अवशेष, चारे की कमी के समय पशुधन के लिए उपयोगी सूखा चारा बनते हैं।

बाक़ी विकल्प गलत क्यों हैं

  • (A) विकल्प A में भारी मानसूनी वर्षा और चिकनी मिट्टी को गुआर की खेती का कारण बताया गया है, जबकि यह फसल शुष्क, रेतीली और कम वर्षा वाली भूमि के अनुकूल है। इसके बीज पशुधन के मुख्य दाने के रूप में बाजरे की जगह भी नहीं लेते।
  • (C) विकल्प C में गुआर को नहरों से सिंचित क्षेत्रों की फसल और मुख्यतः हरा चारा या साइलेज माना गया है। राजस्थान को लाभ वर्षा-आधारित शुष्क खेती से मिलता है, जबकि कटाई के बाद इसके तने और पत्ते सूखा चारा देते हैं।
  • (D) विकल्प D में राजस्थान की बढ़त का कारण सरकारी स्तर पर खेती का अनिवार्य कोटा बताया गया है, जबकि इसका वास्तविक कारण खेती के अनुकूल परिस्थितियाँ हैं। कच्ची गुआर फलियों को मुर्गियों के लिए सीधे दिए जाने वाले प्रमुख प्रोटीन पूरक के रूप में पेश करना भी आधारहीन है।

अवधारणा

यह प्रश्न राजस्थान की शुष्क खेती और दलहनी फसलों की अनुकूलता को पशुधन और चारे की अर्थव्यवस्था से जोड़ता है। RAS में ऐसे संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि फसलों के वितरण को उत्पादन के आँकड़ों के साथ-साथ जलवायु, मिट्टी और ग्रामीण आजीविका के आधार पर भी समझना पड़ता है।

स्रोत

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