केंद्र सरकार ने सिंटर्ड दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबकों के निर्माण को बढ़ावा देने की योजना को मंजूरी दी है। इसका वित्तीय परिव्यय ₹7,280 करोड़ है। यह औद्योगिक नीति, आत्मनिर्भर भारत और रणनीतिक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा महत्वपूर्ण समसामयिकी विषय है। योजना का लक्ष्य भारत में आरईपीएम निर्माण का पहला एकीकृत घरेलू तंत्र तैयार करना है, ताकि दुर्लभ पृथ्वी ऑक्साइड से धातु, धातु से मिश्रधातु और मिश्रधातु से तैयार चुंबक तक की पूरी प्रक्रिया देश के भीतर विकसित हो सके।

इन चुंबकों का महत्व केवल खनिज या विनिर्माण तक सीमित नहीं है। ये इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टरबाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा उपकरणों में इस्तेमाल होते हैं। इसी कारण परीक्षा की दृष्टि से यह विषय अर्थव्यवस्था, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, ऊर्जा संक्रमण और रक्षा-स्वावलंबन को जोड़ता है। भारत की आरईपीएम मांग फिलहाल मुख्य रूप से आयात से पूरी होती है और 2025 से 2030 तक इसके दोगुना होने की उम्मीद है। ऐसे में घरेलू क्षमता बनाना उद्योगों के लिए आपूर्ति जोखिम घटाने और उच्च-तकनीकी विनिर्माण को मजबूत करने का कदम है।

योजना 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष एकीकृत आरईपीएम निर्माण क्षमता स्थापित करने की परिकल्पना करती है। कुल परिव्यय में ₹6,450 करोड़ बिक्री से जुड़ी प्रोत्साहन राशि और ₹750 करोड़ पूंजीगत सब्सिडी शामिल है। कुल क्षमता 5 लाभार्थियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली से दी जाएगी और हर लाभार्थी को 1,200 मीट्रिक टन प्रति वर्ष तक क्षमता मिल सकती है। योजना की अवधि आवंटन की तारीख से 7 वर्ष होगी, जिसमें 2 वर्ष सुविधा स्थापित करने और 5 वर्ष बिक्री पर प्रोत्साहन देने के लिए होंगे। स्टैटिक जीके में इसे दुर्लभ पृथ्वी तत्वों, महत्वपूर्ण खनिजों, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा और नेट जीरो 2070 लक्ष्य से जोड़कर पढ़ना उपयोगी है।