राजस्थान की जलवायु और पर्यावरणीय परिवेश
मुख्य तथ्य
- 50 सेमी समवर्षा रेखा अरावली के साथ व्यावहारिक विभाजक की तरह पढ़ी जाती है; इसके पश्चिम में वर्षा सामान्यतः कम और अधिक अनिश्चित रहती है।
- फलोदी में 19 मई 2016 को 51.0 डिग्री सेल्सियस अधिकतम तापमान दर्ज हुआ, जो राजस्थान की अत्यधिक गर्मी का प्रमुख स्टेशन-तथ्य है।
- राजस्थान राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना 2014 और 2022 जल, कृषि, स्वास्थ्य, वन, जैव-विविधता और आपदा तैयारी को जलवायु जोखिम से जोड़ती हैं।
मुख्य बिंदु
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राजस्थान की जलवायु अरावली की दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा, कमजोर मानसून, थार की शुष्कता और बड़े तापमान प्रसार से नियंत्रित होती है।
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50 सेमी समवर्षा रेखा अरावली के साथ व्यावहारिक विभाजक की तरह पढ़ी जाती है; इसके पश्चिम में वर्षा सामान्यतः कम और अधिक अनिश्चित रहती है।
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कोपेन वर्गीकरण में पश्चिमी भाग गर्म मरुस्थलीय, मध्य भाग गर्म अर्ध-शुष्क और पूर्वी-दक्षिण-पूर्वी भाग अपेक्षाकृत आर्द्र मानसून-प्रभावित दशा दिखाता है।
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फलोदी में 19 मई 2016 को 51.0 डिग्री सेल्सियस अधिकतम तापमान दर्ज हुआ, जो राजस्थान की अत्यधिक गर्मी का प्रमुख स्टेशन-तथ्य है।
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मावठ पश्चिमी विक्षोभ से मिलने वाली शीतकालीन वर्षा है; यह गेहूं, सरसों और चने जैसी रबी फसलों के लिए उपयोगी मिट्टी-नमी देती है।
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दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों शाखाएं राजस्थान को प्रभावित करती हैं, पर राज्य तक आते-आते नमी कमजोर और असमान हो जाती है।
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राजस्थान राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना 2014 और 2022 जल, कृषि, स्वास्थ्य, वन, जैव-विविधता और आपदा तैयारी को जलवायु जोखिम से जोड़ती हैं।
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अरावली राजस्थान की वर्षा को कैसे बाँटती है?
अरावली राजस्थान की वर्षा को इसलिए बाँटती है क्योंकि इसकी दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा अरब सागर शाखा के लगभग समानांतर है, जिससे पश्चिमी भाग में पवनाभिमुख उठान कमजोर पड़ता है और पूर्व-दक्षिणी भाग अपेक्षाकृत अधिक नम रहता है। राजस्थान में वर्षा का सबसे बड़ा भौतिक नियंत्रण अरावली की दिशा है। अरावली मोटे तौर पर दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व जाती है। यह दिशा अरब सागर शाखा के प्रवाह के लगभग समानांतर रहती है, इसलिए राज्य के बड़े हिस्से में पवनाभिमुख उठान बहुत प्रभावी नहीं बनता। भारत मौसम विज्ञान विभाग के थार मरुस्थल वर्षा अध्ययन में थार मरुस्थल की वार्षिक सामान्य वर्षा 251 मिमी बताई गई है, जिससे पश्चिमी शुष्कता का पैमाना साफ समझ आता है। परिणामस्वरूप पश्चिमी राजस्थान में वृष्टि-छाया जैसा प्रभाव दिखता है और जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर जैसे जिले शुष्क रहते हैं। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में स्थलरूप, मानसूनी संकेन्द्रण और नमी की उपलब्धता से वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है।
यह विभाजन सीधी रेखा वाला नियम नहीं है। अरावली अक्ष, थार के बालू टीले, समुद्र से दूरी, स्थानीय निम्न दबाव और मानसून की चाल मिलकर वर्षा-ढाल बनाते हैं। इसी कारण उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, कोटा और झालावाड़ जैसे क्षेत्र पश्चिमी मरुस्थलीय जिलों से अलग जलवायु संकेत देते हैं। 50 सेमी समवर्षा रेखा को इसी पूर्व-पश्चिम अंतर का उपयोगी मानचित्र संकेत माना जाता है।
याद रखें: अरावली केवल पर्वतमाला नहीं, राजस्थान की वर्षा, बसावट, जल-संग्रह और वनस्पति-वितरण को दिशा देने वाली मुख्य जलवायु-रेखा है।
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