संयुक्त वन प्रबंधन और सामुदायिक वानिकी
मुख्य तथ्य
- राष्ट्रीय वन नीति, 1988 ने वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को नीति-स्तर पर महत्व दिया और इसी पृष्ठभूमि में संयुक्त वन प्रबंधन आगे बढ़ा।
- भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 1 जून 1990 को गांव समुदायों और स्वैच्छिक संस्थाओं को बिगड़े हुए वन क्षेत्रों के पुनर्जनन से जोड़ने के लिए जेए...
- अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा, पुनर्जनन, संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े अधिकारों को...
मुख्य बिंदु
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राष्ट्रीय वन नीति, 1988 ने वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को नीति-स्तर पर महत्व दिया और इसी पृष्ठभूमि में संयुक्त वन प्रबंधन आगे बढ़ा।
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भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 1 जून 1990 को गांव समुदायों और स्वैच्छिक संस्थाओं को बिगड़े हुए वन क्षेत्रों के पुनर्जनन से जोड़ने के लिए जेएफएम दिशानिर्देश जारी किए।
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संयुक्त वन प्रबंधन में वन भूमि का स्वामित्व राज्य के पास रहता है, लेकिन संरक्षण, पुनर्जनन और उपयोग से जुड़े निर्णयों में ग्राम-स्तरीय समिति की भागीदारी होती है।
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ग्राम वन समिति, वन सुरक्षा समिति या वन संरक्षण समिति जैसे स्थानीय निकाय जेएफएम के आधारभूत संस्थान हैं; इनके नाम और नियम राज्यों के अनुसार बदल सकते हैं।
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अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा, पुनर्जनन, संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े अधिकारों को कानूनी आधार दिया।
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जेएफएम का लाभ-वितरण आमतौर पर चारा, ईंधन लकड़ी, घास, लघु वनोपज और अंतिम कटाई से मिलने वाले हिस्से से जुड़ा होता है; सटीक अनुपात राज्य के नियमों पर निर्भर करता है।
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राजस्थान में मरुस्थलीय, अरावली और आदिवासी वन क्षेत्रों की स्थिति के कारण वन सुरक्षा समितियों की भूमिका चराई नियंत्रण, अवैध कटाई रोकने और पौधों की रक्षा में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
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संयुक्त वन प्रबंधन की अवधारणा और पृष्ठभूमि क्या है?
संयुक्त वन प्रबंधन वह भागीदारी व्यवस्था है जिसमें वन विभाग और वन-आश्रित समुदाय वन संरक्षण, पुनर्जनन और लाभ-साझेदारी को साझा जिम्मेदारी मानकर काम करते हैं। इसका मूल विचार यही है कि वन विभाग और वन-आश्रित समुदाय वन संरक्षण को साझा जिम्मेदारी मानकर काम करें। औपनिवेशिक और बाद की केंद्रीकृत वन व्यवस्था में राज्य नियंत्रण प्रमुख था, लेकिन गांवों की ईंधन, चारा, लघु वनोपज और आजीविका संबंधी जरूरतें लगातार बनी रहीं। जब स्थानीय लोगों को वन से केवल रोक-टोक मिली और संरक्षण में सम्मानजनक भूमिका नहीं मिली, तो कई जगह अवैध कटाई, अतिक्रमण और खुले चरान जैसी समस्याएं बढ़ीं। जेएफएम इसी व्यावहारिक समझ से निकला कि वन तभी टिकेंगे जब पास के गांवों को संरक्षण में लाभ और जिम्मेदारी दोनों मिलें।
राष्ट्रीय वन नीति, 1988 ने साफ तरीके से कहा कि वन संरक्षण में लोगों, खासकर महिलाओं और आदिवासी समुदायों की भागीदारी जरूरी है। भारत सरकार के 1 जून 1990 के दिशानिर्देश ने इस सोच को प्रशासनिक रूप दिया। इसका केंद्र बिगड़े हुए वन क्षेत्रों का पुनर्जनन था, यानी ऐसे क्षेत्र जहां वृक्षावरण कमजोर हो गया हो और जहां स्थानीय सहयोग से प्राकृतिक पुनरुत्थान, पौधारोपण और सुरक्षा संभव हो। नीति के स्तर पर यह बदलाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था कि संरक्षण को केवल दंड और बंदिश का मामला न मानकर गांव की रोजमर्रा की जरूरतों, श्रम और स्थानीय निगरानी से जोड़ा गया। भारतीय वन स्थिति प्रतिवेदन 2023 के अनुसार देश का वन और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है, यानी कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत।
सार यह है कि जेएफएम स्वामित्व-हस्तांतरण नहीं, बल्कि संरक्षण और लाभ-साझेदारी की भागीदारी व्यवस्था है। इसलिए परीक्षा में इसे वन विभाग और समुदाय के बीच बने ऐसे व्यावहारिक समझौते के रूप में पढ़ना चाहिए, जिसमें राज्य की वैधानिक भूमिका बनी रहती है और गांव को संरक्षण में सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलती है।
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