मुख्य तथ्य

  • भारतीय वन अधिनियम, 1927 में वन उपज की परिभाषा व्यापक है; इसमें लकड़ी, चारकोल, काथ, काष्ठ-तेल, राल, प्राकृतिक वार्निश, छाल, लाख, महुआ फूल-बीज और वन से...
  • भारतीय वन अधिनियम, 1927 में गिरे, काटे, आरे से चिरे या उपयोग के लिए आकार दिए गए वृक्ष और लकड़ी भी इमारती लकड़ी माने जाते हैं।
  • इसी अधिनियम की धारा 41 राज्य सरकार को लकड़ी और वन उपज के पारगमन पर नियम बनाने की शक्ति देती है;
  • वन अधिकार अधिनियम, 2006 में गौण वन उपज को पौध-आधारित गैर-काष्ठ वन उपज माना गया है, जिसमें बांस, झाड़-झंखाड़, बेंत, तसर, कोया, शहद, मोम, लाख, तेंदूपत्त...
  • अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम, 2006 गांव की सीमा के भीतर या बाहर पारंपरिक रूप से एकत्रित गौण वन उपज पर स्वामित्व, संग्रह, उपयोग औ...

मुख्य बिंदु

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    भारतीय वन अधिनियम, 1927 में वन उपज की परिभाषा व्यापक है; इसमें लकड़ी, चारकोल, काथ, काष्ठ-तेल, राल, प्राकृतिक वार्निश, छाल, लाख, महुआ फूल-बीज और वन से मिली या लाई गई उपज आती है।

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    भारतीय वन अधिनियम, 1927 में गिरे, काटे, आरे से चिरे या उपयोग के लिए आकार दिए गए वृक्ष और लकड़ी भी इमारती लकड़ी माने जाते हैं।

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    इसी अधिनियम की धारा 41 राज्य सरकार को लकड़ी और वन उपज के पारगमन पर नियम बनाने की शक्ति देती है; राजस्थान में राजस्थान वन उपज पारगमन नियम, 1957 लागू हैं।

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    वन अधिकार अधिनियम, 2006 में गौण वन उपज को पौध-आधारित गैर-काष्ठ वन उपज माना गया है, जिसमें बांस, झाड़-झंखाड़, बेंत, तसर, कोया, शहद, मोम, लाख, तेंदूपत्ता, औषधीय पौधे और कंद आते हैं।

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    अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम, 2006 गांव की सीमा के भीतर या बाहर पारंपरिक रूप से एकत्रित गौण वन उपज पर स्वामित्व, संग्रह, उपयोग और निस्तारण के सामुदायिक अधिकार मान्यता देता है।

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    गौण वन उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना 2013-14 में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने शुरू की; इसका उद्देश्य संग्रहकर्ताओं को मजबूरी में सस्ते दाम पर बिक्री से बचाना है।

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    अगस्त 1987 में स्थापित ट्राइफेड जनजातीय उत्पादों से जुड़ी राष्ट्रीय संस्था है; 14 अप्रैल 2018 को शुरू वन धन योजना गौण वन उपज के मूल्य संवर्धन से जुड़ी है।

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    भारतीय वन संशोधन अधिनियम, 2017 ने गैर-वन क्षेत्रों में उगे बांस को वृक्ष की कानूनी श्रेणी से बाहर किया; पुनर्गठित राष्ट्रीय बांस मिशन 25 अप्रैल 2018 को स्वीकृत हुआ।

वन उपज क्या है और परीक्षा में इसे क्यों पढ़ना जरूरी है?

वन उपज वह व्यापक श्रेणी है जिसमें जंगल से मिली या लाई गई लकड़ी, चारकोल, काथ, काष्ठ-तेल, राल, प्राकृतिक वार्निश, छाल, लाख, महुआ फूल-बीज, हरड़, पत्तियां, घास, शहद, मोम और वन्य जीवों से जुड़ी उपज तक आती है, इसलिए परीक्षा में इसे केवल लकड़ी मानकर पढ़ना गलत होगा। वन उपज का अर्थ केवल लकड़ी नहीं है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 में यह व्यापक शब्द है, जिसमें लकड़ी, चारकोल, काथ, काष्ठ-तेल, राल, प्राकृतिक वार्निश, छाल, लाख, महुआ फूल-बीज, हरड़ और वन से मिली या लाई गई पत्तियां, घास, शहद, मोम तथा वन्य जीवों से जुड़ी उपज भी आती है। भर्ती परीक्षा में इस विषय से सीधे परिभाषा, उदाहरण, वर्गीकरण और नियम पूछे जा सकते हैं। इसलिए अभ्यर्थी को “मुख्य वन उपज” और “गौण वन उपज” के बीच अंतर साफ रखना चाहिए। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की भारत राज्य वन रिपोर्ट 2023 पर जारी पीआईबी सूचना के अनुसार देश का वन और वृक्ष आच्छादन 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है।

व्यवहार में वन विभाग के लिए वन उपज तीन कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला, इससे सरकारी राजस्व मिलता है, जैसे लकड़ी की नीलामी, बांस या तेंदूपत्ता संग्रहण और रॉयल्टी। दूसरा, अनियंत्रित कटाई से जंगल की पुनर्जनन क्षमता घटती है, इसलिए संरक्षण नियम जरूरी हैं। तीसरा, ग्रामीण और जनजातीय परिवार ईंधन, चारा, पत्ता, गोंद, शहद और औषधीय पौधों से रोजमर्रा की आजीविका कमाते हैं। वनपाल और वनरक्षक स्तर पर यही व्यावहारिक समझ काम आती है।

याद रखें: वन उपज की परिभाषा व्यापक है, इसलिए केवल सागौन या खेजड़ी जैसी लकड़ी याद करना पर्याप्त नहीं है।

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