वन पारिस्थितिकी और पारितंत्र — संरचना, ऊर्जा प्रवाह और अनुक्रमण
मुख्य तथ्य
- 1935 में ए. जी. टान्सले ने पारितंत्र शब्द को व्यवस्थित रूप से रखा; इससे जीवों और उनके भौतिक पर्यावरण को एक कार्यात्मक इकाई की तरह पढ़ने का आधार मिला।
- 1942 में रेमंड लिंडेमन ने ट्रॉफिक-डायनेमिक दृष्टिकोण दिया; ऊर्जा प्रवाह, पोषक स्तर और ऊर्जा-हानि को समझाने में यह मूल आधार माना जाता है।
- 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन ने वैश्विक पर्यावरण शासन को मजबूत दिशा दी; इसी के बाद भारत में पर्यावरण संस्थाओं और कानूनों पर जोर बढ़ा।
- 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ; वन पारितंत्र में शीर्ष शिकारी और आवास संरक्षण के महत्व को समझने के लिए यह प्रमुख उदाहरण है।
- 1980 का वन संरक्षण अधिनियम वन भूमि के गैर-वन उपयोग पर केंद्रीय नियंत्रण से जुड़ा है;
मुख्य बिंदु
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1935 में ए. जी. टान्सले ने पारितंत्र शब्द को व्यवस्थित रूप से रखा; इससे जीवों और उनके भौतिक पर्यावरण को एक कार्यात्मक इकाई की तरह पढ़ने का आधार मिला।
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1942 में रेमंड लिंडेमन ने ट्रॉफिक-डायनेमिक दृष्टिकोण दिया; ऊर्जा प्रवाह, पोषक स्तर और ऊर्जा-हानि को समझाने में यह मूल आधार माना जाता है।
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1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन ने वैश्विक पर्यावरण शासन को मजबूत दिशा दी; इसी के बाद भारत में पर्यावरण संस्थाओं और कानूनों पर जोर बढ़ा।
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1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ; वन पारितंत्र में शीर्ष शिकारी और आवास संरक्षण के महत्व को समझने के लिए यह प्रमुख उदाहरण है।
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1980 का वन संरक्षण अधिनियम वन भूमि के गैर-वन उपयोग पर केंद्रीय नियंत्रण से जुड़ा है; भर्ती परीक्षाओं में यह वन प्रशासन का बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य है।
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1988 की राष्ट्रीय वन नीति ने पारिस्थितिक संतुलन, मृदा-जल संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को वन प्रबंधन के केंद्र में रखा।
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1992 के जैव विविधता अभिसमय ने जैव विविधता संरक्षण, सतत उपयोग और लाभ-साझेदारी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी; 2002 के जैव विविधता अधिनियम ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की व्यवस्था की।
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पारितंत्र क्या होता है और वन पारितंत्र अलग क्यों माना जाता है?
पारितंत्र किसी स्थान के जीवों और निर्जीव घटकों की ऐसी कार्यात्मक इकाई है जिसमें पदार्थ और ऊर्जा लगातार एक-दूसरे से जुड़ते रहते हैं, और वन पारितंत्र में वृक्षों की बहु-स्तरीय संरचना, अधिक जैव द्रव्यमान, सूक्ष्म आवास और जटिल खाद्य संबंध इसे खास बनाते हैं। जंगल, घासभूमि, तालाब, रेगिस्तान और कृषि-क्षेत्र सभी पारितंत्र हैं, लेकिन वन पारितंत्र में वृक्षों की बहु-स्तरीय संरचना, अधिक जैव द्रव्यमान, सूक्ष्म आवास और जटिल खाद्य संबंध इसे खास बनाते हैं। राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार राजस्थान 3,42,239 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला भारत का सबसे बड़ा राज्य है, इसलिए यहाँ शुष्क मरुस्थल से लेकर अरावली और दक्षिणी आर्द्र पट्टियों तक पारितंत्रों की विविधता बहुत साफ दिखती है। वनपाल और वनरक्षक परीक्षा में पारितंत्र को केवल परिभाषा की तरह नहीं, बल्कि संरक्षण, आग नियंत्रण, चराई, वन्यजीव और जलग्रहण क्षेत्र से जोड़कर समझना जरूरी है।
पारितंत्र खुली व्यवस्था है। सूर्य से ऊर्जा आती है, उत्पादक उसे रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं, उपभोक्ता उस ऊर्जा को आगे ले जाते हैं और अपघटक मृत पदार्थ को फिर पोषक तत्वों में बदल देते हैं। पदार्थ चक्रों में घूमता है, पर ऊर्जा एक दिशा में बहती है और हर स्तर पर उसका बड़ा भाग ऊष्मा के रूप में नष्ट होता है। इसी कारण कोई भी पारितंत्र असीमित संख्या में बड़े मांसाहारी नहीं रख सकता।
मुख्य बात: पारितंत्र का सार जीवों की सूची नहीं, बल्कि जीव, पर्यावरण, ऊर्जा और पदार्थ के बीच चलने वाली कार्यात्मक कड़ी है।
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