वन एवं वन्यजीव संरक्षण कानून — भारतीय वन अधिनियम 1927, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, वन संरक्षण अधिनियम 1980 और राजस्थान नियम
मुख्य तथ्य
- भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 28 आरक्षित वन पर सरकारी अधिकार ग्राम समुदाय को सौंपकर ग्राम वन बनाने की अनुमति देती है;
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 ने शिकार पर सामान्य रोक, अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान की घोषणा, तथा मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जैसी संस्थागत व्यवस्था तय की...
- वन्यजीव संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2022 के बाद अनुसूचियों की व्यवस्था 4 अनुसूचियों में रखी गई;
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 का मूल उद्देश्य वन भूमि को गैर-वन प्रयोजन में बदलने पर केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य करना है।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों की तीन-स्तरीय व्यवस्था ब...
मुख्य बिंदु
- 1
भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 28 आरक्षित वन पर सरकारी अधिकार ग्राम समुदाय को सौंपकर ग्राम वन बनाने की अनुमति देती है; आरक्षित, संरक्षित और ग्राम वन की शक्तियां सीधे पूछी जाती हैं।
- 2
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 ने शिकार पर सामान्य रोक, अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान की घोषणा, तथा मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जैसी संस्थागत व्यवस्था तय की।
- 3
वन्यजीव संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2022 के बाद अनुसूचियों की व्यवस्था 4 अनुसूचियों में रखी गई; अनुसूची I सर्वाधिक संरक्षण और अनुसूची IV CITES-सम्बंधित नमूनों से जुड़ी है।
- 4
वन संरक्षण अधिनियम, 1980 का मूल उद्देश्य वन भूमि को गैर-वन प्रयोजन में बदलने पर केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य करना है।
- 5
जैव विविधता अधिनियम, 2002 ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों की तीन-स्तरीय व्यवस्था बनाई।
- 6
वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के व्यक्तिगत तथा सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है।
- 7
राजस्थान वन अधिनियम, 1953, संरक्षित वन नियम, 1957 और राजस्थान वन उपज पारगमन नियम, 1957 राज्य में वन अपराध, परमिट, पास और नाका-जांच जैसी व्यावहारिक बातों को नियंत्रित करते हैं।
आगे पढ़ें
वन कानूनों को परीक्षा में किस ढांचे से पढ़ना चाहिए?
वन कानूनों को परीक्षा में भूमि, वन उपज, वन्यजीव और समुदाय अधिकार के चार कानूनी खानों में पढ़ना चाहिए, क्योंकि वनपाल के काम में इन्हीं चारों पर अलग-अलग नियम लागू होते हैं। वन संरक्षण कानूनों को याद करते समय उन्हें केवल तारीखों की सूची न मानें। इनका असली ढांचा 3 सवालों पर टिकता है: कौन-सी भूमि वन मानी जाएगी, उस वन में कौन-सी गतिविधि प्रतिबंधित है, और उल्लंघन होने पर कौन-सा अधिकारी कार्रवाई करेगा। भारतीय वन अधिनियम, 1927 मुख्यतः वन भूमि, वन उपज और वन अपराधों का कानून है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 जंगली जीवों, पक्षियों, पौधों, संरक्षित क्षेत्रों और शिकार-व्यापार नियंत्रण पर केंद्रित है। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 राज्य सरकारों की वन भूमि को अन्य उपयोग में देने की शक्ति पर केंद्र की रोक और स्वीकृति व्यवस्था लगाता है। वन सर्वेक्षण भारत की भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 पर प्रेस सूचना ब्यूरो की विज्ञप्ति के अनुसार देश का कुल वन और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किमी है, जो भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17% है; इसलिए कानून पढ़ते समय “जंगल” को केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि मापी जाने वाली और नियंत्रित की जाने वाली सार्वजनिक संपदा समझना चाहिए।
भर्ती परीक्षा में इन कानूनों को अलग-अलग खानों में पढ़ना उपयोगी है। 1927 वाला कानून वन की श्रेणी और वन उपज के नियंत्रण से जुड़ता है; 1972 वाला कानून वन्यजीव, अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान और अनुसूची से; 1980 वाला कानून भूमि-परिवर्तन और परियोजना स्वीकृति से; 2002 वाला कानून जैविक संसाधन और लाभ-साझेदारी से; और 2006 वाला कानून वनवासियों के अधिकार से। राजस्थान के नियम इन राष्ट्रीय कानूनों को स्थानीय प्रशासन, नाकों, पास, जब्ती और विभागीय अधिकारों के स्तर पर लागू करते हैं।
याद रखने की बात: वनपाल के लिए कानून का व्यावहारिक अर्थ यही है कि भूमि, उपज, जीव और समुदाय—चारों के लिए अलग-अलग कानूनी नियंत्रण चलते हैं।
पूरा नोट खोलें
यह सार्वजनिक पृष्ठ पहला उपलब्ध खंड दिखाता है। स्टडी पैक पूरा विषय और सभी पुनरावलोकन सामग्री खोलता है।
7 और खंड पूरे नोट में हैं
स्टडी पैक खोलें