मुख्य तथ्य

  • जैव विविधता पर अभिसमय ने 1992 में जैव विविधता को आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्रीय विविधता के संयुक्त रूप में स्पष्ट किया।
  • जैव विविधता पर अभिसमय 29 दिसंबर 1993 से प्रभावी हुआ और इसके तीन उद्देश्य संरक्षण, सतत उपयोग तथा लाभ-साझेदारी हैं।
  • रामसर अभिसमय 1971 में अपनाया गया और आर्द्रभूमियों के बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग से जुड़ा है; भारत 1982 में इसका पक्षकार बना।
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 भारत में राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और प्रजाति-संरक्षण का मुख्य कानूनी आधार है।
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002 ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और जैव विविधता प्रबंधन समितियों का 3-स्तरीय ढांचा बनाया।

मुख्य बिंदु

  1. 1

    जैव विविधता पर अभिसमय ने 1992 में जैव विविधता को आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्रीय विविधता के संयुक्त रूप में स्पष्ट किया।

  2. 2

    जैव विविधता पर अभिसमय 29 दिसंबर 1993 से प्रभावी हुआ और इसके तीन उद्देश्य संरक्षण, सतत उपयोग तथा लाभ-साझेदारी हैं।

  3. 3

    रामसर अभिसमय 1971 में अपनाया गया और आर्द्रभूमियों के बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग से जुड़ा है; भारत 1982 में इसका पक्षकार बना।

  4. 4

    वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 भारत में राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और प्रजाति-संरक्षण का मुख्य कानूनी आधार है।

  5. 5

    जैव विविधता अधिनियम, 2002 ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और जैव विविधता प्रबंधन समितियों का 3-स्तरीय ढांचा बनाया।

  6. 6

    प्रोजेक्ट टाइगर 1 अप्रैल 1973 को 9 आरंभिक अभयारण्यों के साथ शुरू हुआ और 2006 संशोधन के बाद राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को वैधानिक आधार मिला।

  7. 7

    केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान 1981 में रामसर स्थल और 1985 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना।

  8. 8

    गोडावण राजस्थान का राज्य पक्षी है और उसके संरक्षण में मरुस्थल राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के ऊपरी विद्युत तार बड़ा खतरा हैं।

जैव विविधता क्या होती है और इसे किन स्तरों पर समझा जाता है?

जैव विविधता जीवित जगत में जीन, प्रजाति और पारितंत्र के स्तर पर पाई जाने वाली विविधता है, इसलिए इसे मुख्यतः आनुवंशिक विविधता, प्रजातीय विविधता और पारितंत्रीय विविधता के रूप में समझा जाता है। जैव विविधता का अर्थ जीवित जगत में पाई जाने वाली विविधता से है। इसे सामान्यतः 3 स्तरों पर समझा जाता है: आनुवंशिक विविधता, प्रजातीय विविधता और पारितंत्रीय विविधता। जैव विविधता अभिसमय सचिवालय के भारत प्रोफाइल के अनुसार भारत में विश्व की दर्ज प्रजातियों का लगभग 7-8% हिस्सा मिलता है। आनुवंशिक विविधता एक ही प्रजाति के भीतर जीनों के अंतर को बताती है; इसी से सूखा, ताप या कीट के प्रति अनुकूलन क्षमता बनती है। प्रजातीय विविधता किसी क्षेत्र या समुदाय में मौजूद प्रजातियों की कुलता से जुड़ी है। पारितंत्रीय विविधता अलग-अलग आवासों, भूमि-प्रकारों और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं की विविधता को दिखाती है।

जैव विविधता को मापने में व्हिटेकर के अल्फा, बीटा और गामा स्तर उपयोगी हैं। अल्फा विविधता किसी स्थानीय समुदाय की विविधता है, बीटा विविधता अलग-अलग आवासों के बीच बदलाव को दिखाती है, और गामा विविधता बड़े क्षेत्र की कुल विविधता बताती है। प्रजातीय समृद्धि का अर्थ कुल प्रजातियों की संख्या है, जबकि प्रजातीय समता यह बताती है कि अलग-अलग प्रजातियों के व्यक्ति कितने संतुलित ढंग से बँटे हैं। राजस्थान में अरावली, थार, केवलादेव, सांभर और चंबल जैसे उदाहरण अलग-अलग पारितंत्रीय दशाएँ दिखाते हैं।

याद रखने योग्य बात: विविधता के प्रकार और विविधता के मापन-स्तर अलग बातें हैं, इसलिए आनुवंशिक-प्रजातीय-पारितंत्रीय को अल्फा-बीटा-गामा से मिलाना नहीं चाहिए।

पूरा नोट खोलें

यह सार्वजनिक पृष्ठ पहला उपलब्ध खंड दिखाता है। स्टडी पैक पूरा विषय और सभी पुनरावलोकन सामग्री खोलता है।

7 और खंड पूरे नोट में हैं

स्टडी पैक खोलें