मुख्य तथ्य

  • काज़री, जोधपुर 1959 से केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के रूप में शुष्क मृदा-जल प्रबंधन, टीला स्थिरीकरण और मरुस्थलीकरण नियंत्रण से जुड़ा प्रमु...
  • इसरो एटलस 2021 के अनुसार 2018-19 में राजस्थान में मरुस्थलीकरण या भूमि क्षरण 2.123 करोड़ हेक्टेयर, यानी 62.06 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में दर्ज था।
  • 2018-19 में वायु अपरदन राजस्थान के 43.37 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर दर्ज प्रमुख भूमि-क्षरण प्रक्रिया थी।
  • डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई 2.0 2021-2026 की अवधि को कवर करता है और जलसंभर उपचार को ढाल, अपवाह, नमी और मृदा संरक्षण से जोड़ता है।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़, श्रीगंगानगर से शुरू हुई और खेत स्तर पर 12 मापदंडों की मृदा जांच से उर्वरक सलाह देती है।

मुख्य बिंदु

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    एनबीएसएस-एलयूपी के अनुसार राजस्थान की मिट्टियां एंटिसोल, इनसेप्टिसोल, एरिडिसोल, वर्टिसोल और अल्फिसोल में रखी जाती हैं; इनमें एंटिसोल का हिस्सा सबसे अधिक है।

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    पश्चिमी राजस्थान की रेतीली शुष्क मिट्टी जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, चूरू, जोधपुर और नागौर में प्रमुख है तथा इसमें जैविक पदार्थ और नमी कम रहती है।

  3. 3

    काज़री, जोधपुर 1959 से केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के रूप में शुष्क मृदा-जल प्रबंधन, टीला स्थिरीकरण और मरुस्थलीकरण नियंत्रण से जुड़ा प्रमुख संस्थान है।

  4. 4

    इसरो एटलस 2021 के अनुसार 2018-19 में राजस्थान में मरुस्थलीकरण या भूमि क्षरण 2.123 करोड़ हेक्टेयर, यानी 62.06 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में दर्ज था।

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    2018-19 में वायु अपरदन राजस्थान के 43.37 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर दर्ज प्रमुख भूमि-क्षरण प्रक्रिया थी।

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    सांभर, डीडवाना, पचपदरा और लूणी क्षेत्र में लवण-क्षारीय मिट्टी बंद बेसिन, लवणीय भूजल, अधिक वाष्पीकरण और कमजोर नालीकरण से बनती है।

  7. 7

    डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई 2.0 2021-2026 की अवधि को कवर करता है और जलसंभर उपचार को ढाल, अपवाह, नमी और मृदा संरक्षण से जोड़ता है।

  8. 8

    मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़, श्रीगंगानगर से शुरू हुई और खेत स्तर पर 12 मापदंडों की मृदा जांच से उर्वरक सलाह देती है।

राजस्थान की मिट्टियां परीक्षा में आधार क्यों बनती हैं?

राजस्थान की मिट्टियां परीक्षा में आधार इसलिए बनती हैं, क्योंकि मरुस्थलीकरण, मृदा संरक्षण, फसल, वनस्पति, चरागाह और जलसंभर के लगभग हर सवाल में मिट्टी का क्षेत्रीय स्वभाव ही पहला संकेत देता है। राजस्थान में मरुस्थलीकरण और मृदा संरक्षण को समझने के लिए पहले मिट्टी का क्षेत्रीय ढांचा याद रखना जरूरी है। एनबीएसएस-एलयूपी के आधार पर राज्य की मिट्टियों को एंटिसोल, इनसेप्टिसोल, एरिडिसोल, वर्टिसोल और अल्फिसोल में रखा जाता है। एंटिसोल सबसे बड़ा समूह है, इसलिए पश्चिमी रेतीले और शुष्क क्षेत्र का महत्व वस्तुनिष्ठ परीक्षा में बार-बार आता है। पुराने परीक्षा-उपयोगी नामों में मरुस्थलीय या रेतीली मिट्टी, टीला मिट्टी, भूरी मिट्टी, सीरोजेम, लाल-दोमट, पहाड़ी मिट्टी, लवण-सोडिक मिट्टी, जलोढ़ मिट्टी और काली मिट्टी शामिल हैं। राजस्थान वन विभाग के अनुसार राज्य का क्षेत्रफल 2011 में 3,42,239 वर्ग किलोमीटर दर्ज है, इसलिए इसी बड़े क्षेत्र में मिट्टी और जलवायु का फर्क परीक्षा में साफ दिखाई देता है।

राजस्थान का क्षेत्रफल बड़ा और जलवायु विविध है, इसलिए एक ही राज्य में हवा से कटाव, पानी से कटाव और रासायनिक क्षरण तीनों मिलते हैं। पश्चिम में रेतीली शुष्क मिट्टी, बनास-चंबल दिशा में जलोढ़ मिट्टी, हाड़ौती में काली मिट्टी, दक्षिणी और अरावली क्षेत्रों में लाल-दोमट तथा पहाड़ी मिट्टी और सांभर-डीडवाना-पचपदरा-लूणी में लवणीय पट्टियां दिखती हैं। वनपाल और वनरक्षक स्तर पर इनका उपयोग फसल, वनस्पति, चरागाह, जलसंभर और संरक्षण उपायों से जोड़कर पढ़ना चाहिए।

याद रखें: मिट्टी का नाम केवल पहचान नहीं है; वही बताता है कि कटाव हवा से होगा, पानी से होगा या लवणता से।

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