मुख्य तथ्य

  • पेरिस समझौता 12 दिसंबर 2015 को सीओपी21 में अपनाया गया; यह तापमान लक्ष्य, शमन, अनुकूलन और राष्ट्रीय निर्धारित योगदानों का मुख्य वैश्विक आधार है।
  • आईपीसीसी एआर6 संश्लेषण रिपोर्ट 2023 में अंतिम रूप से स्वीकृत हुई; यह जलवायु विज्ञान, प्रभाव, अनुकूलन और शमन के साक्ष्यों को साथ रखती है।
  • यूएनसीसीडी 17 जून 1994 को अपनाया गया; यह मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे को एक साथ पढ़ने का आधार देता है।
  • रामसर अभिसमय 2 फरवरी 1971 को अपनाया गया; यह आर्द्रभूमियों के विवेकपूर्ण उपयोग और पारिस्थितिक स्वरूप की रक्षा पर बल देता है।
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, वन संरक्षण अधिनियम, 1980, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 और जल प्रदूषण अधिनियम, 1974 भारत में पर्यावरणीय नियंत्रण के प्...

मुख्य बिंदु

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    पेरिस समझौता 12 दिसंबर 2015 को सीओपी21 में अपनाया गया; यह तापमान लक्ष्य, शमन, अनुकूलन और राष्ट्रीय निर्धारित योगदानों का मुख्य वैश्विक आधार है।

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    आईपीसीसी एआर6 संश्लेषण रिपोर्ट 2023 में अंतिम रूप से स्वीकृत हुई; यह जलवायु विज्ञान, प्रभाव, अनुकूलन और शमन के साक्ष्यों को साथ रखती है।

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    यूएनसीसीडी 17 जून 1994 को अपनाया गया; यह मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे को एक साथ पढ़ने का आधार देता है।

  4. 4

    रामसर अभिसमय 2 फरवरी 1971 को अपनाया गया; यह आर्द्रभूमियों के विवेकपूर्ण उपयोग और पारिस्थितिक स्वरूप की रक्षा पर बल देता है।

  5. 5

    पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, वन संरक्षण अधिनियम, 1980, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 और जल प्रदूषण अधिनियम, 1974 भारत में पर्यावरणीय नियंत्रण के प्रमुख विधिक आधार हैं।

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    जैव विविधता अधिनियम, 2002 स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों और जन जैव विविधता रजिस्टरों को आधार देता है।

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    आईएसएफआर 2023 में भारत का कुल वन और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किलोमीटर, यानी भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत बताया गया।

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    राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक 6 श्रेणियों में वायु दशा बताता है और 8 प्रदूषकों के लिए उप-सूचकांक बनाता है।

जलवायु परिवर्तन, हरितगृह प्रभाव और वैश्विक तापवृद्धि का आपस में क्या संबंध है?

जलवायु परिवर्तन तापमान, वर्षा, सूखे और पारिस्थितिक तनाव में दीर्घकालिक बदलाव है, जिसे हरितगृह गैसों से बढ़ती वैश्विक तापवृद्धि और उसके जल, वन, फसल, चरागाह तथा वन्यजीवों पर पड़ते दबाव से समझा जाता है। जलवायु परिवर्तन को तापमान, वर्षा, सूखे की आवृत्ति और पारिस्थितिक तनाव में दीर्घकालिक बदलाव के रूप में समझा जाता है। हरितगृह गैसें तापमान बढ़ाती हैं और बढ़ता तापमान आवास, जल, फसल, चरागाह और वन्यजीवों पर दबाव डालता है। आईपीसीसी एआर-6 संश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार 2011-2020 में वैश्विक सतही तापमान 1850-1900 के स्तर से लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था। परीक्षा में हरितगृह गैस, कार्बन पदचिह्न, शमन और अनुकूलन जैसे शब्दों को अलग-अलग पहचानना जरूरी है। कार्बन पदचिह्न मानव गतिविधि से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हरितगृह गैसों को बताता है।

पेरिस समझौता वैश्विक तापवृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखने और 1.5 डिग्री तक सीमित रखने के प्रयास से जोड़ता है। इसके तहत देश अपने राष्ट्रीय निर्धारित योगदानों के जरिए शमन और अनुकूलन की दिशा बताते हैं। शमन स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा बचत और भूमि उपयोग के बेहतर विकल्पों से भविष्य का दबाव घटाता है, जबकि अनुकूलन पहले से दिख रहे नुकसान से लोगों, फसलों, जलाशयों और आवासों की रक्षा करता है।

आईपीसीसी एआर-6 संश्लेषण रिपोर्ट 2023 में अंतिम रूप से स्वीकृत हुई और जलवायु विज्ञान, प्रभाव, अनुकूलन तथा शमन के साक्ष्यों को साथ रखती है।

याद रखें: जलवायु परिवर्तन केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि जल, भूमि, वन और आजीविका पर असर डालने वाली व्यापक पर्यावरणीय समस्या है।

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