मुख्य तथ्य

  • जैव विविधता पर अभिसमय ने 1992 में जैव विविधता को आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्रीय स्तरों पर समझने का आधार दिया।
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 भारत में राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और प्रजाति-संरक्षण का प्रमुख कानूनी आधार है।
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और जैव विविधता प्रबंधन समितियों का 3-स्तरीय ढांचा बनता है।
  • IUCN रेड लिस्ट विलुप्ति जोखिम को 9 श्रेणियों में रखती है; गोडावण गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में आता है।
  • सरिस्का में 2008 में रणथंभौर से बाघ स्थानांतरण शुरू हुआ, इसलिए यह बाघ पुनर्प्राप्ति का प्रमुख उदाहरण है।

मुख्य बिंदु

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    जैव विविधता पर अभिसमय ने 1992 में जैव विविधता को आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्रीय स्तरों पर समझने का आधार दिया।

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    जैव विविधता पर अभिसमय के तीन मुख्य उद्देश्य संरक्षण, सतत उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों से लाभ-साझेदारी हैं।

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    वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 भारत में राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और प्रजाति-संरक्षण का प्रमुख कानूनी आधार है।

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    जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और जैव विविधता प्रबंधन समितियों का 3-स्तरीय ढांचा बनता है।

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    IUCN रेड लिस्ट विलुप्ति जोखिम को 9 श्रेणियों में रखती है; गोडावण गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में आता है।

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    केवलादेव घाना मीठे जल की और सांभर झील अंतर्देशीय खारे जल की रामसर आर्द्रभूमि के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

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    सरिस्का में 2008 में रणथंभौर से बाघ स्थानांतरण शुरू हुआ, इसलिए यह बाघ पुनर्प्राप्ति का प्रमुख उदाहरण है।

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    राजस्थान में गोडावण संरक्षण की बड़ी चुनौती मरुस्थल राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में ऊपरी विद्युत तारों से टकराव है।

जैव विविधता क्या है और इसे किन स्तरों पर समझना चाहिए?

जैव विविधता जीवित जगत में जीन, प्रजाति और पारितंत्र के स्तर पर पाई जाने वाली विविधता है। परीक्षा में इसे तीन स्तरों पर याद रखना चाहिए: आनुवंशिक विविधता, प्रजातीय विविधता और पारितंत्रीय विविधता। आनुवंशिक विविधता एक ही प्रजाति के भीतर जीनों के अंतर को दिखाती है, जिससे सूखा, कीट या ताप तनाव के प्रति अनुकूलन क्षमता बनती है। प्रजातीय विविधता किसी समुदाय में उपस्थित प्रजातियों की कुलता है। पारितंत्रीय विविधता अलग-अलग आवासों, भूमि-रूपों और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं की विविधता को दिखाती है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की भारत की चौथी राष्ट्रीय जैव विविधता रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व के केवल 2.4% भू-भाग पर 7-8% दर्ज प्रजातियों को समेटे हुए है, इसलिए जैव विविधता को भारत के भूगोल और आजीविका से जोड़कर पढ़ना चाहिए।

मापन के लिए अल्फा, बीटा और गामा विविधता अलग बात हैं। अल्फा विविधता किसी स्थानीय समुदाय की प्रजातीय समृद्धि से जुड़ी है। बीटा विविधता अलग-अलग आवासों के बीच परिवर्तन बताती है। गामा विविधता बड़े क्षेत्र की कुल जैव विविधता को दिखाती है। इसलिए प्रकार और मापन को मिलाना नहीं चाहिए। राजस्थान में अरावली, थार, केवलादेव, सांभर और चंबल जैसे परिदृश्य इस विविधता को अलग-अलग रूप में दिखाते हैं।

याद रखने योग्य बात: जैव विविधता के स्तर आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्रीय हैं, जबकि अल्फा, बीटा और गामा मापन-स्तर हैं।

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