मुख्य तथ्य

  • 1950 में के. एम. मुंशी ने वन महोत्सव को लोकप्रिय बनाया; जनभागीदारी के माध्यम से वृक्षारोपण को राष्ट्रीय अभियान की तरह देखने की परंपरा इसी से मजबूत हुई...
  • 1988 की राष्ट्रीय वन नीति ने पारिस्थितिक संतुलन, मृदा-जल संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को वन प्रबंधन का मुख्य आधार बनाया।
  • 1990 में संयुक्त वन प्रबंधन पर केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश जारी हुए; इससे ग्राम समुदायों और वन विभाग की साझेदारी को संस्थागत पहचान मिली।
  • 2008 के राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना में हरित भारत मिशन को 8 राष्ट्रीय मिशनों में रखा गया; इसका जोर वनावरण, पारितंत्र सेवाओं और आजीविका पर है।
  • क्षतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम, 2016 और नियम, 2018 ने CAMPA निधियों के उपयोग के लिए कानूनी ढांचा दिया।

मुख्य बिंदु

  1. 1

    1950 में के. एम. मुंशी ने वन महोत्सव को लोकप्रिय बनाया; जनभागीदारी के माध्यम से वृक्षारोपण को राष्ट्रीय अभियान की तरह देखने की परंपरा इसी से मजबूत हुई।

  2. 2

    1988 की राष्ट्रीय वन नीति ने पारिस्थितिक संतुलन, मृदा-जल संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को वन प्रबंधन का मुख्य आधार बनाया।

  3. 3

    1990 में संयुक्त वन प्रबंधन पर केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश जारी हुए; इससे ग्राम समुदायों और वन विभाग की साझेदारी को संस्थागत पहचान मिली।

  4. 4

    2008 के राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना में हरित भारत मिशन को 8 राष्ट्रीय मिशनों में रखा गया; इसका जोर वनावरण, पारितंत्र सेवाओं और आजीविका पर है।

  5. 5

    क्षतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम, 2016 और नियम, 2018 ने CAMPA निधियों के उपयोग के लिए कानूनी ढांचा दिया।

  6. 6

    राष्ट्रीय कृषि आयोग, 1976 ने सामाजिक वानिकी को ईंधन, चारा, छोटी लकड़ी और ग्रामीण जरूरतों से जोड़कर मजबूत नीति आधार दिया।

  7. 7

    राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम 2000-2002 में शुरू हुआ और वन विकास एजेंसी व संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के माध्यम से अवनत वन क्षेत्रों के पुनर्वास से जुड़ा रहा।

  8. 8

    राष्ट्रीय कृषि-वानिकी नीति, 2014 खेतों पर फसल, पशुपालन और वृक्षों के एकीकृत उपयोग पर केंद्रित देश की पहली राष्ट्रीय नीति थी।

वनरोपण और पुनर्वनीकरण में क्या अंतर है?

वनरोपण ऐसे क्षेत्र में वृक्ष लगाने की प्रक्रिया है जहाँ लंबे समय से वन नहीं रहा या भूमि वृक्ष-विहीन रही, जबकि पुनर्वनीकरण पहले से वन रहे क्षेत्र में घटे हुए वनावरण को फिर से स्थापित करने की प्रक्रिया है। वनरोपण का सामान्य अर्थ ऐसे क्षेत्र में वृक्ष लगाना है जहां लंबे समय से वन नहीं है या भूमि वृक्ष-विहीन रही है। पुनर्वनीकरण का अर्थ उस क्षेत्र में वन को फिर से स्थापित करना है जहां पहले वन था, पर कटाई, आग, चराई, खनन, बाढ़ या अन्य कारणों से वनावरण घट गया। भर्ती परीक्षाओं में इन दोनों शब्दों का अंतर बहुत पूछा जाता है। वनरोपण नई हरित पट्टी बनाने, बंजर भूमि सुधारने और सामुदायिक भूमि उपयोग को बेहतर करने से जुड़ सकता है, जबकि पुनर्वनीकरण का संबंध पुराने वन क्षेत्र की बहाली से अधिक है। भारतीय वन सर्वेक्षण की आईएसएफआर 2021 पर आधारित पीआईबी सूचना के अनुसार भारत का कुल वनावरण 7,13,789 वर्ग किलोमीटर था, जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का 21.71 प्रतिशत था।

सफल रोपण केवल पौधे लगाने से पूरा नहीं होता। प्रजाति चयन, पौधशाला की गुणवत्ता, गड्ढा तैयारी, रोपण का मौसम, सुरक्षा, सिंचाई, निराई-गुड़ाई और कम से कम कुछ वर्षों की देखभाल जरूरी होती है। शुष्क राजस्थान में वर्षा अनिश्चित, ताप अधिक और चराई दबाव मजबूत हो सकता है, इसलिए स्थानीय जलवायु के अनुकूल प्रजातियां अधिक उपयोगी मानी जाती हैं। खेजड़ी, रोहिड़ा, बबूल, बेर, नीम, शीशम, करंज और देशी घासों का चुनाव क्षेत्रीय मिट्टी और वर्षा के आधार पर किया जाता है।

मुख्य पकड़: वनरोपण पौधा लगाने की घटना नहीं, बल्कि स्थल-चयन से सुरक्षा तक चलने वाली पूरी बहाली प्रक्रिया है।

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