राज्य के नीति-निदेशक तत्व
मुख्य तथ्य
- भाग IV में अनुच्छेद 36-51 हैं; अनुच्छेद 37 नीति-निदेशक तत्वों को गैर-वाद-योग्य फिर भी शासन में मूलभूत बताता है।
- अनुच्छेद 31C अनुच्छेद 39(b)-(c) लागू करने वाले कानूनों की रक्षा करता है, पर मिनर्वा मिल्स, 1980 के बाद सभी नीति-निदेशक तत्वों की नहीं।
- 42वें संशोधन, 1976 ने अनुच्छेद 39A, 43A और 48A जोड़े और अनुच्छेद 39(f) को बदला।
- 86वें संशोधन, 2002 ने 6-14 वर्ष की शिक्षा को अनुच्छेद 21A में रखा और अनुच्छेद 45 को 6 वर्ष से कम बच्चों के लिए बदला।
- अनुच्छेद 40 पंचायत राज से जुड़ता है; 73वें संशोधन, 1992 ने संवैधानिक मशीनरी दी।
मुख्य बिंदु
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भाग IV में अनुच्छेद 36-51 हैं; अनुच्छेद 37 नीति-निदेशक तत्वों को गैर-वाद-योग्य फिर भी शासन में मूलभूत बताता है।
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अनुच्छेद 31C अनुच्छेद 39(b)-(c) लागू करने वाले कानूनों की रक्षा करता है, पर मिनर्वा मिल्स, 1980 के बाद सभी नीति-निदेशक तत्वों की नहीं।
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42वें संशोधन, 1976 ने अनुच्छेद 39A, 43A और 48A जोड़े और अनुच्छेद 39(f) को बदला।
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86वें संशोधन, 2002 ने 6-14 वर्ष की शिक्षा को अनुच्छेद 21A में रखा और अनुच्छेद 45 को 6 वर्ष से कम बच्चों के लिए बदला।
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अनुच्छेद 40 पंचायत राज से जुड़ता है; 73वें संशोधन, 1992 ने संवैधानिक मशीनरी दी।
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सहकारी समितियों पर अनुच्छेद 43B 97वें संशोधन, 2011 से जोड़ा गया और 15 फरवरी 2012 से प्रभावी हुआ।
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न्यायालय नीति-निदेशक तत्वों से मूल अधिकारों, खासकर अनुच्छेद 21, की व्याख्या करते हैं; पर भाग IV को स्वतंत्र अधिकार की तरह सीधे लागू नहीं करते।
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मिनर्वा मिल्स के बाद मूल अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों का सामंजस्य आधारभूत ढांचे का हिस्सा है।
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संवैधानिक स्थान और मूल विचार
राज्य के नीति-निदेशक तत्व सिर्फ कल्याणकारी इच्छाओं की सूची नहीं हैं; वे सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र का संवैधानिक कार्यक्रम हैं।
- स्थान: नीति-निदेशक तत्व संविधान के भाग IV में, अनुच्छेद 36-51 में रखे गए हैं।
- प्रेरणा: व्यापक विचार आयरलैंड के संविधान से आया, लेकिन भारतीय रूप गरीबी, असमानता, ग्राम स्वशासन, श्रम-सुरक्षा और सामाजिक सुधार की अपनी बहसों से बना।
- अनुच्छेद 36: भाग IV में “राज्य” का अर्थ भाग III जैसा ही है। इसलिए यह केवल संघ सरकार पर लागू नहीं होता; संसद, राज्य सरकारें, राज्य विधानमंडल, स्थानीय निकाय और राज्य के साधन भी इसके दायरे में आते हैं।
- अनुच्छेद 37 मुख्य कड़ी है: इसमें कहा गया है कि ये सिद्धांत किसी न्यायालय से प्रवर्तनीय नहीं होंगे, फिर भी देश के शासन में मूलभूत हैं, और कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है।
- मूल काम: भाग III व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रवर्तनीय दावों की रक्षा करता है; भाग IV सार्वजनिक शक्ति को कल्याण, समता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रमिक गरिमा, विकेंद्रीकरण, पर्यावरण, विरासत, न्याय और शांति की ओर मोड़ता है।
- कानूनी असर: नागरिक सामान्यतः केवल इस आधार पर मुकदमा नहीं कर सकता कि संसद कोई नीति-निदेशक कानून बनाए। लेकिन कानून बन जाने पर न्यायालय इन सिद्धांतों से क़ानून की व्याख्या, अनुच्छेद 21 के विस्तार, युक्तियुक्तता की जांच और संवैधानिक लक्ष्यों की पहचान करते हैं।
- UPSC के लिहाज़ से सावधानी: गैर-वाद-योग्य का अर्थ गैर-संवैधानिक नहीं है। अनुच्छेद 37 दोनों बातें साथ कहता है: न्यायालय से सीधे प्रवर्तन नहीं, पर शासन में मूलभूत महत्व।
- लोकतांत्रिक महत्व: नीति-निर्णय चुनी हुई संस्थाओं के पास रहते हैं, लेकिन वे न्याय, गरिमा और कल्याण की संवैधानिक भाषा से बाहर नहीं जा सकते।
- प्रीलिम्स पकड़: तीन बातों को साथ याद रखें: भाग IV की पहचान, अनुच्छेद 37 की स्थिति, और बाद में न्यायालयों द्वारा भाग IV को भाग III के साथ पढ़ने की पद्धति।
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1MCQअनुच्छेद 37 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. नीति-निदेशक तत्व किसी न्यायालय से प्रवर्तनीय नहीं हैं। 2. नीति-निदेशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं। 3. कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य है। कौन-से कथन सही हैं?
व्याख्या
तीनों बातें अनुच्छेद 37 में हैं। गैर-वाद-योग्यता उनका संवैधानिक महत्व खत्म नहीं करती।
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