मुख्य तथ्य

  • 1828 में राममोहन राय ने ब्रह्म सभा स्थापित की; आगे ब्रह्म समाज ने बंगाल सुधार को दिशा दी।
  • विद्यासागर के विधवा पुनर्विवाह अभियान ने हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 को प्रभावित किया।
  • 1875 में दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज ने वेदों की प्रामाणिकता, शिक्षा और सामाजिक सुधार को जोड़ा।
  • 1873 में ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज ने जातिगत ऊंच-नीच और पुरोहित एकाधिकार को सीधी चुनौती दी।
  • 1897 में विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने व्यावहारिक वेदांत को संगठित सामाजिक सेवा से जोड़ा।

मुख्य बिंदु

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    सुधार आंदोलनों ने सती, जातिगत कठोरता, बाल विवाह और स्त्री-अशिक्षा के विरुद्ध धार्मिक पुनर्व्याख्या को सामाजिक बदलाव से जोड़ा।

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    1828 में राममोहन राय ने ब्रह्म सभा स्थापित की; आगे ब्रह्म समाज ने बंगाल सुधार को दिशा दी।

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    विद्यासागर के विधवा पुनर्विवाह अभियान ने हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 को प्रभावित किया।

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    1875 में दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज ने वेदों की प्रामाणिकता, शिक्षा और सामाजिक सुधार को जोड़ा।

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    1873 में ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज ने जातिगत ऊंच-नीच और पुरोहित एकाधिकार को सीधी चुनौती दी।

  6. 6

    1897 में विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने व्यावहारिक वेदांत को संगठित सामाजिक सेवा से जोड़ा।

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    अलीगढ़, देवबंद, रहनुमाई मज़दयसन सभा और सिंह सभा बताते हैं कि सुधार हिंदू संगठनों तक सीमित नहीं था।

  8. 8

    कानूनी सुधार अहम थे, लेकिन सामाजिक स्वीकृति शिक्षा, संगठनों, प्रेस और सामुदायिक बातचीत पर निर्भर रही।

संदर्भ और परीक्षा में महत्व: 19वीं सदी के सुधार क्यों अहम थे

19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन कोई एक आंदोलन नहीं थे। ये अलग-अलग क्षेत्रों, धार्मिक समुदायों और सामाजिक समूहों की पहलें थीं, जिन पर औपनिवेशिक शासन, छापाखाना, नई शिक्षा, मिशनरी आलोचना, समाज की अंदरूनी असमानताएं और सामुदायिक आत्मसम्मान की जरूरत असर डाल रही थी। UPSC अक्सर संगठन, संस्थापक, वर्ष, क्षेत्र और सुधार-कार्य को मिलाकर पूछता है।

  • अर्थ: सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने धार्मिक विचारों और सामाजिक रीति-रिवाजों को साथ-साथ बदलने की कोशिश की। सुधारकों का मानना था कि सती, स्त्री-अशिक्षा, बाल विवाह, बहुविवाह, जातिगत बहिष्कार और अस्पृश्यता जैसी प्रथाएं सामाजिक थीं, लेकिन उन्हें अक्सर धार्मिक व्याख्या से सहारा मिलता था।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अंग्रेजी शिक्षा, प्राच्यविद्या, मिशनरी बहस, छापाखाने और समाचारपत्रों का फैलाव, नया मध्यवर्ग और औपनिवेशिक कानून ने बहस का सार्वजनिक माहौल बनाया। सुधार केवल पश्चिम की नकल नहीं था; कई नेताओं ने भारतीय ग्रंथों को नए ढंग से पढ़कर परंपरा के भीतर से बदलाव का तर्क दिया।
  • दो बड़े तरीके: कुछ आंदोलन चुनिंदा सुधारवादी थे, जैसे ब्रह्म समाज और प्रार्थना समाज; कुछ पुनरुत्थानवादी भाषा में थे, लेकिन सामाजिक सुधार करते थे, जैसे आर्य समाज। सुधार और पुनरुत्थान की सीमा हमेशा साफ नहीं थी।
  • साझा कार्यसूची: स्त्री शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह की आलोचना, जातिगत कठोरता का विरोध, एकेश्वरवाद, तर्कपूर्ण उपासना, ग्रंथों की नई व्याख्या, देशी भाषाओं में शिक्षा, सामाजिक सेवा और संगठन निर्माण।
  • क्षेत्रीय फैलाव: बंगाल में ब्रह्म समाज, विद्यासागर का विधवा पुनर्विवाह अभियान और यंग बंगाल दिखते हैं; पश्चिमी भारत में प्रार्थना समाज, फुले का सत्यशोधक समाज और स्त्री शिक्षा; पंजाब और उत्तर भारत में आर्य समाज और अलीगढ़ आंदोलन; केरल में नारायण गुरु का जाति-विरोधी सुधार।
  • कानूनी संबंध: सुधार बहसों पर बंगाल सती विनियमन 1829, हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856, विशेष विवाह अधिनियम (अधिनियम 3) 1872 और सहमति आयु अधिनियम 1891 का असर पड़ा और इन कानूनों पर सुधारकों के दबाव का भी असर था। कानून से समाज तुरंत नहीं बदला, लेकिन सुधारकों को संस्थागत सहारा मिला।
  • राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध: सुधारों ने संगठन, समाचारपत्र, सार्वजनिक सभा और अधिकारों की भाषा दी। इससे वह सामाजिक आधार बना जो आगे चलकर राजनीतिक राष्ट्रवाद में शामिल हुआ, हालांकि सभी सुधारक सीधे राजनीतिक आंदोलन के पक्ष में नहीं थे।
  • कला और संस्कृति से संबंध: इन आंदोलनों ने साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, देशी भाषाओं की गद्य-परंपरा, धार्मिक संगीत, सेवा संस्थाओं और भारतीय सांस्कृतिक नवजागरण की धारणा पर असर डाला। बंगाल के सुधार माहौल को आधुनिक बंगाली गद्य और बहस से अलग नहीं किया जा सकता।
  • UPSC में सावधानी: सभी सुधारकों को एक जैसे उदारवादी न मानें। दयानंद, राममोहन राय, विवेकानंद, सर सैयद, फुले और नारायण गुरु के श्रोता, ग्रंथ, तरीके और सामाजिक प्राथमिकताएं अलग थीं।
  • संतुलित समझ: इन आंदोलनों ने कई दमनकारी प्रथाओं को चुनौती दी, लेकिन कई आंदोलन शहरी, पुरुष-प्रधान, जाति-सीमित या अभिजन दायरे में रहे। जाति-विरोधी आंदोलनों और महिला सुधारकों ने इस दायरे को आगे बढ़ाया।

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संभावित प्रश्न

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1MCQसूची 1 को सूची 2 से मिलाइए: सूची 1 में संगठन और सूची 2 में संस्थापक या प्रमुख नेता हैं। सही विकल्प चुनिए। 1. ब्रह्म सभा 2. प्रार्थना समाज 3. सत्यशोधक समाज 4. रामकृष्ण मिशन। क. ज्योतिराव फुले ख. आत्माराम पांडुरंग ग. विवेकानंद घ. राममोहन राय1 अंक · 50 शब्द
  1. A1-घ, 2-ख, 3-क, 4-गसही
  2. B1-घ, 2-क, 3-ख, 4-ग
  3. C1-ग, 2-ख, 3-क, 4-घ
  4. D1-ख, 2-घ, 3-क, 4-ग

व्याख्या

ब्रह्म सभा राममोहन राय से, प्रार्थना समाज आत्माराम पांडुरंग से, सत्यशोधक समाज ज्योतिराव फुले से और रामकृष्ण मिशन विवेकानंद से जुड़ा है।

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