प्रागैतिहासिक संस्कृतियां और सिंधु घाटी सभ्यता
मुख्य तथ्य
- प्रागैतिहासिक काल को पढ़े हुए ग्रंथों से नहीं, पुरातत्व से समझते हैं; औज़ार, दफन, पर्यावरण और बसावट-संदर्भ निर्णायक हैं।
- पुरापाषाण = शिकार-संग्रह और हस्तकुठार-फ्लेक परंपरा; मध्यपाषाण = सूक्ष्म औज़ार और हिमयुगोत्तर अनुकूलन।
- नवपाषाण संस्कृतियां क्षेत्रीय थीं: मेहरगढ़, बुर्जहोम, कोल्डिहवा-महगरा, चिरांद और दक्षिण भारतीय राख-टीले अलग-अलग रूप दिखाते हैं।
- परिपक्व हड़प्पाई नगरीकरण सामान्यतः 2600-1900 ईसा पूर्व में रखा जाता है; इसके आगे-पीछे प्रारंभिक और उत्तर हड़प्पा चरण हैं।
- हड़प्पाई नगर नियोजित सड़कें, नालियां, मानकीकृत ईंटें, जल-व्यवस्था और स्थानीय अनुकूलन दिखाते हैं, बिल्कुल एक जैसे नक्शे नहीं।
मुख्य बिंदु
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प्रागैतिहासिक काल को पढ़े हुए ग्रंथों से नहीं, पुरातत्व से समझते हैं; औज़ार, दफन, पर्यावरण और बसावट-संदर्भ निर्णायक हैं।
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पुरापाषाण = शिकार-संग्रह और हस्तकुठार-फ्लेक परंपरा; मध्यपाषाण = सूक्ष्म औज़ार और हिमयुगोत्तर अनुकूलन।
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नवपाषाण संस्कृतियां क्षेत्रीय थीं: मेहरगढ़, बुर्जहोम, कोल्डिहवा-महगरा, चिरांद और दक्षिण भारतीय राख-टीले अलग-अलग रूप दिखाते हैं।
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परिपक्व हड़प्पाई नगरीकरण सामान्यतः 2600-1900 ईसा पूर्व में रखा जाता है; इसके आगे-पीछे प्रारंभिक और उत्तर हड़प्पा चरण हैं।
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हड़प्पाई नगर नियोजित सड़कें, नालियां, मानकीकृत ईंटें, जल-व्यवस्था और स्थानीय अनुकूलन दिखाते हैं, बिल्कुल एक जैसे नक्शे नहीं।
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अर्थव्यवस्था में कृषि, पशुपालन, शिल्प, मानक बाट, मुहरें और मेसोपोटामिया तथा पश्चिमी एशिया से व्यापार-संपर्क जुड़े थे।
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हड़प्पाई लिपि अब तक अपठित है; मुहरें पहचान, विनिमय और प्रशासन का प्रमाण हैं, पढ़ा हुआ इतिहास नहीं।
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हड़प्पाई पतन क्रमिक और क्षेत्रीय था: पर्यावरणीय दबाव, व्यापार में बदलाव और नगरीकरण का क्षय आक्रमण-सिद्धांत से अधिक अहम हैं।
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दायरा, कालक्रम और स्रोतों की सावधानी
यह विषय पाषाण काल के प्रमाणों से शुरू होकर उपमहाद्वीप के पहले नगरीकरण तक पहुंचता है। प्रीलिम्स में बड़े-बड़े निष्कर्षों से ज़्यादा कालक्रम और प्रमाण की सावधानी काम आती है।
- प्रागैतिहासिक अर्थ: प्रागैतिहासिक काल उस दौर को कहते हैं जिसके लिए पढ़े जा सकने वाले लिखित अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। भारत में इसे पत्थर के औज़ारों, गुफा-जमाव, पशु-अस्थियों, पराग-कणों, राख की परतों, मृद्भांड, दफन-स्थलों, बसावटों और वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण से समझा जाता है।
- पाषाण काल के तीन चरण: पुरापाषाण काल में मुख्यतः शिकार-संग्रह जीवन और कोर, फ्लेक, हस्तकुठार जैसी औज़ार परंपराएं मिलती हैं; मध्यपाषाण काल में सूक्ष्म पाषाण औज़ार, अलग-अलग पर्यावरण से तालमेल और आरंभिक पशुपालन के संकेत दिखते हैं; नवपाषाण काल में खाद्य-उत्पादन, घिसे-पॉलिश किए औज़ार, स्थिर गांव और कई क्षेत्रों में मृद्भांड प्रमुख बनते हैं।
- कालक्रम की सावधानी: भारत में तारीखें क्षेत्र के अनुसार बदलती हैं। मोटे तौर पर निम्न पुरापाषाण काल लगभग 20 लाख वर्ष पहले से, मध्य और उच्च पुरापाषाण काल उसके बाद प्लाइस्टोसीन में, मध्यपाषाण काल अंतिम हिमयुग के बाद, और नवपाषाण काल उत्तर-पश्चिम में लगभग 7वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व से माना जाता है; बाकी क्षेत्रों में शुरुआत अलग-अलग समय पर हुई।
- हड़प्पाई ढांचा: हड़प्पाई सांस्कृतिक क्रम को सामान्यतः प्रारंभिक हड़प्पा, परिपक्व हड़प्पा और उत्तर हड़प्पा चरणों में पढ़ा जाता है। परिपक्व हड़प्पाई नगरीकरण को प्रायः 2600-1900 ईसा पूर्व के आसपास रखा जाता है; उससे पहले क्षेत्रीय आधार और बाद में उत्तर-शहरी रूप दिखते हैं।
- प्रमाण का स्तर: UPSC में खुदाई से मिले तथ्य और व्याख्या को अलग रखना चाहिए। ईंटों का अनुपात, नालियां, मुहरें और बाट ठोस भौतिक प्रमाण हैं; राजसत्ता का रूप, लिपि की भाषा और पतन के सटीक कारण अब भी बहस के विषय हैं।
- भौगोलिक फैलाव: हड़प्पाई स्थल सिंधु तंत्र और उससे जुड़े इलाकों में फैले हैं: पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश। भारत के अहम स्थलों में राखीगढ़ी, धोलावीरा, लोथल, कालीबंगा, बनावली, सुरकोटदा और आलमगीरपुर आते हैं।
- एक सीधा क्रम नहीं: हड़प्पाई शहरों के उभरते ही प्रागैतिहासिक संस्कृतियां खत्म नहीं हुईं। कई क्षेत्रीय खाद्य-उत्पादन और शिल्प परंपराएं अलग गति से चलती रहीं, बदलीं या हड़प्पाई संपर्क में आईं।
- UPSC के लिहाज़ से संकेत: सभ्यता, संस्कृति, चरण, स्थल और क्षितिज समानार्थी शब्द नहीं हैं। स्थल एक जगह है; संस्कृति बार-बार मिलने वाला भौतिक स्वरूप है; सभ्यता नगरीय, आर्थिक और सामाजिक विशेषताओं वाला बड़ा तंत्र है।
- तिथि-निर्धारण की विधियां: रेडियोकार्बन विधि अपने समय-दायरे में जैविक पदार्थों पर उपयोगी है, जबकि थर्मोल्यूमिनेसेंस, ऑप्टिकली स्टिम्युलेटेड ल्यूमिनेसेंस और पुराचुंबकीय विधियां दूसरे संदर्भों में सहायक हो सकती हैं। परीक्षा में याद रखें कि तारीख नमूने की होती है, पास पड़ी हर वस्तु की अपने-आप नहीं।
- प्रागैतिहासिक और आद्य-ऐतिहासिक फर्क: हड़प्पाई संस्कृति को अक्सर आद्य-ऐतिहासिक कहा जाता है, क्योंकि लेखन था पर लिपि अपठित है। यह शुद्ध प्रागैतिहासिक अवस्था से अलग है, जहां लेखन नहीं है, और उस इतिहास से भी अलग है जो पढ़े जा सकने वाले अभिलेखों या ग्रंथों पर आधारित होता है।
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1MCQभारत की प्रागैतिहासिक संस्कृतियों पर निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. हस्तकुठार-क्लीवर परंपराएं सामान्यतः निम्न पुरापाषाण संदर्भों से जुड़ी हैं। 2. सूक्ष्म पाषाण औज़ार मध्यपाषाण संदर्भों के बाहर कभी नहीं मिलते। 3. भारत में नवपाषाण संस्कृतियां हर जगह एक ही समय शुरू हुईं। ऊपर दिए गए कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या
कथन 1 सही है। सूक्ष्म औज़ार बाद के दौरों में भी मिल सकते हैं और नवपाषाण शुरुआत क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग थी, एक साथ नहीं।
~50 शब्द · 1 अंक
