गुप्तोत्तर उत्तर भारत: वर्धन वंश, पुष्यभूति वंश और हर्षवर्धन
मुख्य तथ्य
- हर्षवर्धन का शासन सामान्यतः 606-647 ईस्वी माना जाता है; उसने पूरे उपमहाद्वीप पर शासन नहीं किया।
- पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा के पास हर्षवर्धन को रोका; 634 ईस्वी का ऐहोल अभिलेख मुख्य स्रोत है।
- अनुच्छेद 49, अनुच्छेद 51A(f), प्राचीन स्मारक और पुरातात्त्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम 1958 और 2010 संशोधन आधुनिक धरोहर-सुरक्षा के आधार हैं।
- 2010 अधिनियम के तहत आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन नालंदा महाविहार से अलग है।
मुख्य बिंदु
- 1
पुष्यभूति या वर्धन शक्ति स्थानेश्वर से उठी और हर्षवर्धन के समय कन्नौज की ओर बढ़ी।
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हर्षवर्धन का शासन सामान्यतः 606-647 ईस्वी माना जाता है; उसने पूरे उपमहाद्वीप पर शासन नहीं किया।
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हर्षचरित, ह्वेनसांग, ताम्रपत्र, मुहरें और ऐहोल अभिलेख को साथ पढ़ना चाहिए।
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पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा के पास हर्षवर्धन को रोका; 634 ईस्वी का ऐहोल अभिलेख मुख्य स्रोत है।
- 5
हर्षवर्धन ने अभियान, सामंत संबंध, भूमि-अनुदान, सभाएं और धार्मिक संरक्षण को साथ जोड़ा।
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नालंदा गुप्त-गुप्तोत्तर सदियों में फला-फूला; हर्षवर्धन ने संरक्षण दिया, स्थापना नहीं की।
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अनुच्छेद 49, अनुच्छेद 51A(f), प्राचीन स्मारक और पुरातात्त्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम 1958 और 2010 संशोधन आधुनिक धरोहर-सुरक्षा के आधार हैं।
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2010 अधिनियम के तहत आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन नालंदा महाविहार से अलग है।
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विषय का दायरा
गुप्तोत्तर उत्तर भारत को केवल एक राजा की कहानी की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। यह गुप्त साम्राज्य के बाद बदलती राजव्यवस्था और आरंभिक मध्यकालीन क्षेत्रीय शक्तियों के बीच की कड़ी है।
- मुख्य परिभाषा: इस विषय में छठी और सातवीं सदी का उत्तर भारत आता है, खासकर स्थानेश्वर से उठे पुष्यभूति या वर्धन वंश और कन्नौज को शक्ति-केंद्र बनाने की हर्षवर्धन की कोशिश।
- काल-सीमा: प्रभाकरवर्धन, राज्यवर्धन और हर्षवर्धन सातवीं सदी के आरंभ से जुड़े हैं; हर्षवर्धन का शासन सामान्यतः 606 से 647 ईस्वी माना जाता है।
- भौगोलिक दायरा: शक्ति का आरंभिक आधार स्थानेश्वर था, फिर केंद्र मध्य गंगा मैदान के कन्नौज की ओर गया। गौड़, वल्लभी, नेपाल, असम, कश्मीर की परंपराएं और दक्कन के चालुक्य इससे जुड़े संदर्भ हैं।
- UPSC के लिहाज़ से महत्त्व: बाणभट्ट की दरबारी रचना, ह्वेनसांग का यात्रा-वृत्तांत, ताम्रपत्र अनुदान, मुहरें और ऐहोल अभिलेख अलग-अलग प्रकार के स्रोत हैं; इन्हीं से तथ्यात्मक उलझनें बनती हैं।
- राजनीतिक समझ: हर्षवर्धन प्रभावशाली शासक था, पर उसकी व्यवस्था मौर्य साम्राज्य जैसी पूरे भारत में फैली नौकरशाही नहीं थी; इसमें राजा की प्रतिष्ठा, सैन्य अभियान, सामंत संबंध, धार्मिक संरक्षण, भूमि-अनुदान और सभाएं साथ-साथ दिखते हैं।
- सांस्कृतिक समझ: यही काल संस्कृत साहित्य, नालंदा जैसे बौद्ध केंद्र, शैव और बौद्ध संरक्षण, तथा प्रयाग की पांच-वर्षीय दान-सभा से जुड़ता है।
- प्रीलिम्स सीमा: वंश, राजधानी का बदलाव, स्रोत, समकालीन शक्तियां, प्रशासन, धर्म, साहित्य और कला याद रखें; यह दावा न करें कि हर्षवर्धन ने गुप्त साम्राज्य को उसी रूप में फिर से खड़ा कर दिया था।
- कानूनी समकालीन कड़ी: आज ऐसे स्थलों की रक्षा 1958 के प्राचीन स्मारक कानून, 2010 संशोधन की धाराओं 20ए-20बी, UNESCO प्रक्रिया, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और नालंदा विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं के ज़रिए समझी जाती है। इसे आधुनिक धरोहर-प्रबंधन की कड़ी मानें, प्राचीन प्रशासन का नियम नहीं।
- महत्त्व: अलग से यह कम महत्त्व वाला विषय है, पर गुप्तकालीन पतन, आरंभिक मध्यकालीन राजव्यवस्था, बौद्ध केंद्र, संस्कृत साहित्य, मंदिर स्थापत्य और उत्तर-दक्षिण शक्ति-सीमा से बार-बार जुड़ता है।
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अभ्यास में जाने से पहले उत्तर संरचना जाँचने के लिए इन प्रश्नों का उपयोग करें।
1MCQहर्षवर्धन के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. उसका आरंभिक आधार स्थानेश्वर था। 2. उसके समय कन्नौज महत्त्वपूर्ण केंद्र बना। 3. उसने नालंदा महाविहार की स्थापना की। कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
व्याख्या
कथन 1 और 2 सही हैं। नालंदा हर्षवर्धन से पहले था; उसे स्थापना नहीं, संरक्षण से जोड़ना चाहिए।
~50 शब्द · 1 अंक
