जैन धर्म: शिक्षाएं, संप्रदाय और प्रसार
मुख्य तथ्य
- जैन परंपरा 24 तीर्थंकर मानती है: ऋषभनाथ पहले, पार्श्वनाथ 23वें और महावीर 24वें।
- जैनों को 2014 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 की धारा 2(c) के तहत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिसूचित किया गया।
- जनगणना 2011 में जैन 0.45 करोड़, यानी लगभग 0.4% दर्ज हैं; इसे ताज़ा गिनती की तरह न लिखें।
मुख्य बिंदु
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जैन धर्म श्रमण परंपरा है, जिसमें त्रिरत्न, व्रत, तप और अहिंसा से आत्मा की मुक्ति पर ज़ोर है।
- 2
जैन परंपरा 24 तीर्थंकर मानती है: ऋषभनाथ पहले, पार्श्वनाथ 23वें और महावीर 24वें।
- 3
पार्श्वनाथ से चार व्रत जुड़े हैं; महावीर से ब्रह्मचर्य सहित पांच महाव्रत जोड़े जाते हैं।
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दिगंबर और श्वेतांबर में वस्त्र, ग्रंथ, स्त्री-मुक्ति और महावीर के जीवन-विवरण पर मतभेद हैं।
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जैन धर्म साधुओं, व्यापारियों, व्यापारिक मार्गों, राजकीय संरक्षण, मंदिरों, पांडुलिपियों और क्षेत्रीय साहित्य से फैला।
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उदयगिरि-खंडगिरि, श्रवणबेलगोला, दिलवाड़ा, पालीताना और एलोरा जैन कला और स्थलों के अहम संकेतक हैं।
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जैनों को 2014 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 की धारा 2(c) के तहत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिसूचित किया गया।
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जनगणना 2011 में जैन 0.45 करोड़, यानी लगभग 0.4% दर्ज हैं; इसे ताज़ा गिनती की तरह न लिखें।
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उद्भव, शब्दावली और परीक्षा-दृष्टि
जैन धर्म भारतीय श्रमण परंपरा का प्रमुख मार्ग है। इसका विकास महाजनपदों, नगरों, व्यापार और वैदिक यज्ञ-प्रधान व्यवस्था पर उठते प्रश्नों के बीच हुआ।
- मूल परिभाषा: जैन धर्म आत्मा को कर्म-बंधन से मुक्त करने का अनुशासित रास्ता बताता है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र इसके केंद्र में हैं। मुक्ति किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर की कृपा पर नहीं, अपने संयम और ज्ञान पर निर्भर मानी जाती है।
- तीर्थंकर की धारणा: जैन परंपरा 24 तीर्थंकरों का उल्लेख करती है। ऋषभनाथ पहले, पार्श्वनाथ 23वें और वर्धमान महावीर 24वें तीर्थंकर माने जाते हैं। इतिहास की दृष्टि से महावीर जैन संघ को व्यवस्थित रूप देने वाले सबसे अहम व्यक्तित्व हैं।
- कालक्रम में सावधानी: महावीर के जन्म के लिए 599 ईसा पूर्व और निर्वाण के लिए 527 ईसा पूर्व जैन परंपरा में दिए जाते हैं। कई आधुनिक इतिहासकार उन्हें व्यापक रूप से 6वीं-5वीं सदी ईसा पूर्व में रखते हैं। इसलिए परीक्षा में परंपरा और इतिहास को अलग-अलग समझना ज़रूरी है।
- महावीर की पृष्ठभूमि: वे वज्जि संघ से जुड़े ज्ञातृक या नाय वंश से माने जाते हैं। लगभग 30 वर्ष की आयु में उन्होंने गृहस्थ जीवन छोड़ा, कठोर तप किया, केवल-ज्ञान पाया और गंगा के मैदानों में उपदेश दिया।
- आकर्षण का कारण: जैन धर्म ने व्यापारियों, नगरवासियों, कारीगर समूहों और कुछ शासकों को इसलिए आकर्षित किया क्योंकि इसमें यज्ञ के बिना नैतिक जीवन, संयम और आत्म-अनुशासन पर ज़ोर था।
- UPSC के लिहाज़ से: यह विषय प्राचीन इतिहास, दर्शन, कला, अभिलेख, अल्पसंख्यक अधिकार और धरोहर विवादों से जुड़ता है। परीक्षा में संप्रदाय, व्रत, ग्रंथ, तीर्थस्थल, राजकीय संरक्षण और बौद्ध धर्म से अंतर पर प्रश्न आते हैं। उत्तर लिखते समय इसे श्रमण पृष्ठभूमि, नगरीय समाज और व्यापारिक समुदायों के संदर्भ में रखें, किसी अकेली घटना के रूप में नहीं।
- अहम भेद: जैन धर्म को आधुनिक अर्थ में राजनीतिक विरोध आंदोलन कहना ठीक नहीं। यह श्रमण परंपराओं में ऐसा मार्ग था जिसने यज्ञ, कर्मकांड और वैदिक ज्ञान के एकाधिकार को चुनौती दी।
- शुरुआती क्षेत्र: आरंभिक केंद्र पूर्वी भारत, खासकर आज का बिहार और आसपास का इलाका था; बाद में साधुओं, व्यापारिक समुदायों और राजकीय संरक्षण से यह पश्चिमी भारत, कर्नाटक, तमिल क्षेत्र, ओडिशा और मध्य भारत तक फैला।
- राजनीतिक पृष्ठभूमि: गण-संघों और राज्यों के उभार से पुराने कर्मकांडी अभिजात वर्ग से बाहर भी नए श्रोता बने। जैन शिक्षा योद्धाओं, व्यापारियों और गृहस्थों को ऐसा नैतिक सम्मान देती थी जो बड़े यज्ञों पर निर्भर नहीं था।
- शब्दावली का भ्रम: तीर्थंकर को अब्राहमिक अर्थ में पैगंबर या वैष्णव अर्थ में अवतार नहीं मानना चाहिए। तीर्थंकर वह सिद्ध मार्गदर्शक है जिसने बंधन जीता और मुक्ति का मार्ग दिखाया।
- स्रोत-संतुलन: आरंभिक जैन इतिहास जैन ग्रंथों, बौद्ध संदर्भों, पुरातत्व, अभिलेखों और बाद की साहित्यिक स्मृति को मिलाकर समझा जाता है। किसी एक स्रोत-श्रेणी को पूरा प्रमाण मानना ठीक नहीं।
- कालक्रम संकेत: जैन धर्म को दूसरी नगरीकरण प्रक्रिया और महाजनपद युग से जोड़ें, गुप्त या मध्यकालीन भक्ति चरण से नहीं। बाद के जैन मंदिर मध्यकालीन हैं, पर सिद्धांत और आरंभिक समुदाय कहीं पुराने हैं।
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1MCQजैन शिक्षाओं के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. त्रिरत्न में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र शामिल हैं। 2. पार्श्वनाथ को परंपरागत रूप से पांच महाव्रतों से जोड़ा जाता है। 3. अनेकांतवाद का अर्थ है कि वास्तविकता को कई दृष्टियों से समझा जा सकता है। ऊपर दिए गए कथनों में कौन-से सही हैं?
व्याख्या
कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है क्योंकि पार्श्वनाथ सामान्यतः चार व्रतों से जुड़े हैं; पांच महाव्रत महावीर से जोड़े जाते हैं। कथन 3 अनेकांतवाद को सही बताता है।
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