संवैधानिक विकास और ब्रिटिश अधिनियम, 1773 से 1935
मुख्य तथ्य
- 1773 ने कंपनी शासन पर संसदीय नियंत्रण शुरू किया; 1784 ने नियंत्रण बोर्ड से राज्य की पकड़ मजबूत की।
- 1833 ने कानून-निर्माण केंद्रित किया और कंपनी को व्यापारिक संस्था से प्रशासनिक संस्था बना दिया।
- 1858 ने कंपनी शासन समाप्त कर भारत का प्रशासन भारत सचिव के ज़रिए ब्रिटिश ताज को सौंपा।
- 1861 ने सीमित प्रांतीय विधायी शक्तियां लौटाईं; 1892 ने कमजोर अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व का तत्व जोड़ा।
- 1909 ने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल लाकर औपनिवेशिक संवैधानिक राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व संस्थागत किया।
मुख्य बिंदु
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1773 ने कंपनी शासन पर संसदीय नियंत्रण शुरू किया; 1784 ने नियंत्रण बोर्ड से राज्य की पकड़ मजबूत की।
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1833 ने कानून-निर्माण केंद्रित किया और कंपनी को व्यापारिक संस्था से प्रशासनिक संस्था बना दिया।
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1858 ने कंपनी शासन समाप्त कर भारत का प्रशासन भारत सचिव के ज़रिए ब्रिटिश ताज को सौंपा।
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1861 ने सीमित प्रांतीय विधायी शक्तियां लौटाईं; 1892 ने कमजोर अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व का तत्व जोड़ा।
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1909 ने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल लाकर औपनिवेशिक संवैधानिक राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व संस्थागत किया।
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1919 ने प्रांतों में द्वैध शासन शुरू किया; 1935 ने प्रांतों में इसे हटाया पर केंद्र में प्रस्तावित किया।
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1935 ने अखिल भारतीय संघ प्रस्तावित किया, पर रियासतों के जरूरी सम्मिलन के अभाव में संघीय भाग लागू नहीं हुआ।
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1935 के तहत प्रांतीय स्वायत्तता 1937 से चली और स्वतंत्रता से पहले की राष्ट्रवादी राजनीति की बड़ी प्रशिक्षण भूमि बनी।
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परीक्षा के लिहाज़ से कालक्रम और असल बदलाव
ब्रिटिश भारत का संवैधानिक विकास लोकतंत्र की सीधी कहानी नहीं था। इसे ऐसे पढ़ना बेहतर है कि पहले कंपनी पर संसद का नियंत्रण आया, फिर कंपनी की जगह ताज ने शासन लिया, और फिर परिषदों, निर्वाचन और प्रांतों का दायरा बढ़ा, लेकिन पूरी जवाबदेही भारतीयों को नहीं मिली।
- मुख्य कालक्रम: रेगुलेटिंग अधिनियम 1773; संशोधन अधिनियम 1781; पिट्स इंडिया अधिनियम 1784; चार्टर अधिनियम 1793, 1813, 1833 और 1853; भारत शासन अधिनियम 1858; भारतीय परिषद अधिनियम 1861 और 1892; भारतीय परिषद अधिनियम 1909; भारत शासन अधिनियम 1919; भारत शासन अधिनियम 1935।
- पहली प्रवृत्ति: नियंत्रण ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश संसद और फिर ब्रिटिश ताज की ओर गया। 1773 में संसदीय निगरानी शुरू हुई; 1784 में राजनीतिक मामलों के लिए नियंत्रण बोर्ड बना; 1858 में कंपनी शासन समाप्त हुआ।
- दूसरी प्रवृत्ति: विकेंद्रीकरण से पहले केंद्रीकरण आया। चार्टर अधिनियम 1833 ने बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर-जनरल बनाया और कानून बनाने की शक्ति केंद्रित की। भारतीय परिषद अधिनियम 1861 ने बाद में प्रांतों को सीमित विधायी अधिकार दिए।
- तीसरी प्रवृत्ति: प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे आया, पर सीमित रहा। 1892 में संस्थाओं के ज़रिए अप्रत्यक्ष नामांकन आया; 1909 में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल आया; 1919 ने प्रतिनिधित्व बढ़ाया लेकिन द्वैध शासन रखा; 1935 ने प्रांतीय स्वायत्तता दी।
- चौथी प्रवृत्ति: असली निर्णायक शक्ति ब्रिटिश हाथ में रही। वीटो, आरक्षित विषय, विशेष जिम्मेदारियां, भारत सचिव का नियंत्रण, गवर्नर-जनरल की शक्तियां और गवर्नरों का विवेक निर्वाचित भारतीयों की भूमिका को सीमित करते रहे।
- UPSC में सावधानी: हर सुधार को लोकतांत्रिक उपलब्धि न मानें। कई सुधारों ने परिषदों को बड़ा किया पर कार्यपालिका को ऊपर रखा; कुछ ने चुनाव शुरू किए पर मतदाताओं को बांटा; कुछ ने संघ का वादा किया पर अखिल भारतीय संघ लागू ही नहीं हुआ।
- याद रखने का आधार: 1773 में निगरानी शुरू; 1833 में अखिल भारतीय विधायी केंद्रीकरण; 1858 में ताज का शासन; 1909 में अलग निर्वाचक मंडल; 1919 में प्रांतीय द्वैध शासन; 1935 में प्रांतीय स्वायत्तता और प्रस्तावित संघ।
- प्रशासनिक शब्दावली: गवर्नर-जनरल, वायसराय, भारत सचिव, परिषद, द्वैध शासन, संघ और प्रांतीय स्वायत्तता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। हर शब्द एक खास संस्थागत पड़ाव से जुड़ा है।
- राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध: संवैधानिक रियायतें अक्सर संकट या दबाव के बाद आईं: 1773 से पहले कंपनी घोटाले, 1858 से पहले 1857 का विद्रोह, 1909 से पहले स्वदेशी आंदोलन और मुस्लिम लीग की राजनीति, 1919 से पहले प्रथम विश्व युद्ध, और 1935 से पहले साइमन तथा गोलमेज वार्ताएं।
- प्रीलिम्स तरीका: पहले यह पहचानें कि बदलाव किस स्तर पर है: कंपनी मुख्यालय, बंगाल, अखिल भारतीय केंद्र, प्रांत, निर्वाचक मंडल, न्यायपालिका या सेवाएं। फिर सही अधिनियम जोड़ें।
- संवैधानिक विरासत: बाद के भारतीय संवैधानिक ढांचे ने कुछ प्रशासनिक रूप अपनाए, खासकर सूचियां, लोक सेवा आयोग और संघीय न्यायालय, लेकिन वयस्क मताधिकार और जवाबदेह शासन से औपनिवेशिक जवाबदेही की कमी को बदला।
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स्टडी पैक खोलेंसंभावितसंभावित प्रश्न
अभ्यास में जाने से पहले उत्तर संरचना जाँचने के लिए इन प्रश्नों का उपयोग करें।
1MCQरेगुलेटिंग अधिनियम 1773 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. इसने बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर-जनरल बनाया। 2. इसने ब्रिटेन में नियंत्रण बोर्ड बनाया। 3. इसने कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय का प्रावधान किया। कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
व्याख्या
कथन 1 और 3 सही हैं। नियंत्रण बोर्ड पिट्स इंडिया अधिनियम 1784 से बना, रेगुलेटिंग अधिनियम 1773 से नहीं।
~50 शब्द · 1 अंक
