ब्रिटिश शासन का आर्थिक प्रभाव: भू-राजस्व, उद्योगों का पतन और धन-निकासी
मुख्य तथ्य
- 1765 की दीवानी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में राजस्व निकासी को कंपनी शक्ति का केंद्र बनाया।
- नौरोजी की भारत में गरीबी और अ-ब्रिटिश शासन 1901 में आई और राष्ट्रवाद को आर्थिक आधार दिया।
- अनुच्छेद 294, 295, 372 और 395 कानूनी उत्तराधिकार समझाते हैं, औपनिवेशिक आर्थिक शोषण की उत्पत्ति नहीं।
मुख्य बिंदु
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1765 की दीवानी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में राजस्व निकासी को कंपनी शक्ति का केंद्र बनाया।
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स्थायी बंदोबस्त ने राज्य की मांग जमींदारों से तय की, काश्तकार सुरक्षा नहीं; रैयतवारी और महालवारी में मध्यस्थ अलग थे।
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कृषि के व्यावसायीकरण ने किसानों को नकदी फसलों, कर्ज, कीमत उतार-चढ़ाव और बागान दबाव से जोड़ा।
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उद्योगों का पतन पारंपरिक शिल्प, खासकर कपड़ा, की गिरावट था; साथ में देर औपनिवेशिक आधुनिक उद्योग असंतुलित ढंग से बढ़ा।
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धन-निकासी सिद्धांत ने ब्रिटेन-स्थित खर्च, पेंशन, कर्ज-ब्याज, भेजी गई कमाई और साम्राज्यवादी खर्च से एकतरफा हस्तांतरण समझाया।
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नौरोजी की भारत में गरीबी और अ-ब्रिटिश शासन 1901 में आई और राष्ट्रवाद को आर्थिक आधार दिया।
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रेल और बंदरगाह वास्तविक ढांचा थे, पर वित्त, स्वामित्व और साम्राज्यवादी प्राथमिकताओं ने उनके लाभ तय किए।
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अनुच्छेद 294, 295, 372 और 395 कानूनी उत्तराधिकार समझाते हैं, औपनिवेशिक आर्थिक शोषण की उत्पत्ति नहीं।
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आज की क्षतिपूर्ति और सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी की बहसें प्रासंगिक हैं, पर उन्हें विवादित समकालीन व्याख्या की तरह रखें।
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ढांचा, कानूनी आधार और परीक्षा में दायरा
- विषय का अर्थ: ब्रिटिश शासन का आर्थिक प्रभाव उस बदलाव को बताता है जिसमें कृषि, शिल्प, आंतरिक व्यापार और विदेशी बाजारों से जुड़ी विविध भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे ऐसी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था बन गई, जो साम्राज्य को राजस्व, कच्चा माल और ब्रिटिश उद्योगों के लिए बाजार देती थी।
- मुख्य कड़ी: क्षेत्रीय नियंत्रण से राजस्व अधिकार मिले; राजस्व से प्रशासन और युद्ध चले; व्यापार नीति ने भारत को ब्रिटेन में बने माल के लिए खोला; सरकारी वित्त से बाहर भुगतान हुए; और राष्ट्रवादी अर्थशास्त्रियों ने इन्हीं तथ्यों को धन-निकासी की आलोचना में बदला।
- कानूनी शुरुआत: बक्सर के बाद 1765 में मुगल सम्राट ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी दी। इससे कंपनी को राजस्व अधिकार मिला, जबकि वह अपने को अभी भी व्यापारिक कंपनी कहती थी।
- मुख्य कानून और विनियम: स्थायी बंदोबस्त विनियम, 1793 ने जमींदारों के साथ राजस्व मांग तय की; चार्टर अधिनियम, 1813 ने चाय और चीन व्यापार को छोड़कर भारतीय व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार खत्म किया; चार्टर अधिनियम, 1833 ने कंपनी का बचा हुआ व्यापारिक चरित्र खत्म किया; भारत शासन अधिनियम, 1858 ने शासन ब्रिटिश ताज को दे दिया।
- संवैधानिक निरंतरता: अनुच्छेद 294 और अनुच्छेद 295 संविधान लागू होने के बाद संपत्ति, अधिकार, देनदारियों और दायित्वों के उत्तराधिकार से जुड़े हैं; अनुच्छेद 372 ने मौजूदा कानून तब तक जारी रखे जब तक बदले न जाएं; अनुच्छेद 395 ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 और भारत शासन अधिनियम, 1935 को निरस्त किया।
- प्रारंभिक परीक्षा में सावधानी: ये अनुच्छेद औपनिवेशिक शोषण को जन्म देने वाले प्रावधान नहीं हैं। ये स्वतंत्र भारत में कानूनी उत्तराधिकार और पुराने कानूनों की स्थिति समझाते हैं।
- तीन आधार याद रखें: भू-राजस्व व्यवस्था, उद्योगों का पतन और धन-निकासी। तीनों का तरीका अलग है: आकलन और वसूली, शिल्प-बाजारों का टूटना, और संसाधनों का एकतरफा बाहर जाना।
- दायरा और सीमा: यह आर्थिक इतिहास का विषय है, हर अकाल, रेल लाइन या शुल्क का अलग अध्याय नहीं। उन तथ्यों को तभी जोड़ें जब वे राजस्व दबाव, बाजार की दिशा बदलने या बाहर जाने वाले भुगतान को समझाएं।
- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध: शुरुआती राष्ट्रवादी आलोचना बहुत हद तक आर्थिक थी। दादाभाई नौरोजी, आर.सी. दत्त, एम.जी. रानाडे और जी.वी. जोशी ने कहा कि गरीबी संयोग नहीं, औपनिवेशिक नीति से जुड़ी थी।
- कला और संस्कृति से संबंध: उद्योगों के पतन ने कपड़ा बुनाई, धातु-कला, कागज, रंग, जहाज-निर्माण और दरबारी संरक्षण को प्रभावित किया; इसलिए शिल्प का पतन संस्कृति इतिहास में भी आता है, केवल अर्थव्यवस्था में नहीं।
- परीक्षा की विधि: पहले पहचानें कि कथन जमींदार, किसान, गांव, शिल्पकार, शुल्क, सरकारी वित्त या राष्ट्रवादी सिद्धांत में से किससे जुड़ा है। फिर सही शब्द और काल से मिलाएं।
- क्षेत्रीय सावधानी: बंगाल, मद्रास, बंबई, उत्तर-पश्चिमी प्रांत और पंजाब में एक ही समय पर एक जैसी राजस्व व्यवस्था नहीं थी। UPSC किसी सही क्षेत्रीय तथ्य को गलत अखिल भारतीय कथन बना सकता है। विकल्प मानने से पहले नीति को प्रेसीडेंसी, प्रांत या फसल-क्षेत्र से जोड़ें।
- अनुच्छेदों पर सावधानी: अनुच्छेद 294 और 295 लागू होने के समय संपत्ति और देनदारियों के उत्तराधिकार से जुड़े हैं; अनुच्छेद 372 मौजूदा कानूनों को जारी रखने से जुड़ा है; अनुच्छेद 395 अंतिम औपनिवेशिक संवैधानिक कानूनों को निरस्त करता है। इनमें से कोई भी पुरानी निकासी व्यवस्था को संवैधानिक आदर्श नहीं बनाता।
- तिथियों को लेकर सावधानी: 1765, 1793, 1813, 1833, 1858, 1880, 1901 और 1921-22 को पक्के स्मरण संकेत की तरह रखें।
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1MCQब्रिटिश शासन की भू-राजस्व व्यवस्थाओं पर निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. स्थायी बंदोबस्त में राज्य की राजस्व मांग जमींदारों से तय की गई। 2. रैयतवारी बंदोबस्त में मद्रास और बंबई के कई क्षेत्रों में किसानों का सीधा आकलन किया गया। 3. महालवारी बंदोबस्त केवल व्यक्तिगत रैयतों पर आधारित था, गांव की संस्थाओं पर कभी नहीं। कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
व्याख्या
कथन 1 और 2 सही हैं। महालवारी बंदोबस्त महाल, यानी अक्सर गांव या जायदाद, के आधार पर चलता था, इसलिए कथन 3 गलत है।
~50 शब्द · 1 अंक
