यूरोपियों का आगमन और ब्रिटिश क्षेत्रीय विस्तार
मुख्य तथ्य
- प्लासी, 1757 ने बंगाल दरबार पर प्रभाव दिया; बक्सर, 1764 ने व्यापक सैन्य श्रेष्ठता साबित की; दीवानी, 1765 ने राजस्व अधिकार दिए।
- अवध, 1856 कुप्रशासन के आधार पर विलय का उदाहरण है, व्यपगत सिद्धांत का सामान्य उदाहरण नहीं।
- रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 और पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 दिखाते हैं कि संसद कंपनी की क्षेत्रीय शक्ति पर प्रतिक्रिया दे रही थी।
- अनुच्छेद 372 ने मौजूदा कानून जारी रखे; अनुच्छेद 395 ने अंतिम औपनिवेशिक संवैधानिक कानूनों को लागू होते समय निरस्त किया।
मुख्य बिंदु
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यूरोपीय प्रवेश समुद्री व्यापार से शुरू हुआ; ब्रिटिश प्रभुत्व तब बना जब व्यापार, युद्ध-वित्त, राजस्व और संधियां साथ आए।
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पुर्तगाली शक्ति समुद्री नियंत्रण और गोवा पर केंद्रित रही; वह पूरे भारत का स्थलीय साम्राज्य नहीं बनी।
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प्लासी, 1757 ने बंगाल दरबार पर प्रभाव दिया; बक्सर, 1764 ने व्यापक सैन्य श्रेष्ठता साबित की; दीवानी, 1765 ने राजस्व अधिकार दिए।
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सहायक संधि ने तत्काल विलय के बिना भारतीय शासकों की संप्रभुता घटाई; व्यपगत सिद्धांत ने चुने हुए राज्यों का सीधा विलय कराया।
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अवध, 1856 कुप्रशासन के आधार पर विलय का उदाहरण है, व्यपगत सिद्धांत का सामान्य उदाहरण नहीं।
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रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 और पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 दिखाते हैं कि संसद कंपनी की क्षेत्रीय शक्ति पर प्रतिक्रिया दे रही थी।
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अनुच्छेद 372 ने मौजूदा कानून जारी रखे; अनुच्छेद 395 ने अंतिम औपनिवेशिक संवैधानिक कानूनों को लागू होते समय निरस्त किया।
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औपनिवेशिक बस्तियां गोवा, पुदुचेरी, सेरामपुर, बंबई, मद्रास और कलकत्ता के ज़रिए कला और संस्कृति में भी अहम हैं।
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ढांचा, कानूनी आधार और परीक्षा-मानचित्र
- विषय का अर्थ: यूरोपियों का आगमन 15वीं सदी के अंत से भारत में पुर्तगाली, डच, अंग्रेज़, डेनिश और फ्रांसीसी व्यापारिक शक्तियों के आने की कहानी है। ब्रिटिश क्षेत्रीय विस्तार बताता है कि अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी कैसे एक चार्टर्ड व्यापारी संस्था से राजस्व लेने वाली और संधि करने वाली क्षेत्रीय शक्ति बनी।
- प्रीलिम्स के लिए मुख्य फर्क:
- यूरोपीय प्रवेश पहले व्यापारिक था: मसाले, कपड़ा, सोना-चांदी, बंदरगाह, व्यापारिक कोठियां, किलेबंद बस्तियां और समुद्री सुरक्षा।
- ब्रिटिश विस्तार 18वीं सदी के मध्य के बाद राजनीतिक हुआ: विजय, गठबंधन, राजस्व अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधियों के ज़रिए नियंत्रण, विलय और ब्रिटिश संसद की निगरानी इसके साधन बने।
- कानूनी और संवैधानिक आधार याद रखें:
- अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी 1600 में महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम के शाही चार्टर से बनी।
- बाद के चार्टर और ब्रिटिश संसदीय कानूनों ने उसके अधिकार तय किए: रेगुलेटिंग एक्ट, 1773; पिट्स इंडिया एक्ट, 1784; चार्टर एक्ट 1813, 1833 और 1853; भारत शासन अधिनियम, 1858।
- भारतीय संविधान से संबंध इसलिए है कि अनुच्छेद 372 ने संविधान से पहले के कानूनों को तब तक जारी रखा जब तक उन्हें बदला या हटाया न जाए, और अनुच्छेद 395 ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 तथा भारत शासन अधिनियम, 1935 को लागू होते समय निरस्त किया।
- आज के कानूनी अध्ययन में यह विषय अनुच्छेद 294 और अनुच्छेद 295 से भी जुड़ता है, जो संपत्ति, अधिकार, देनदारियों और दायित्वों के उत्तराधिकार से जुड़े हैं।
- प्रक्रिया समझें: यूरोपियों ने व्यापारिक कोठियां और किले बनाए; कंपनी ने निजी सेना, राजस्व बंदोबस्त, सहायक संधि, राजनीतिक प्रतिनिधि, संधियां, क्षेत्रीय हस्तांतरण और विलय जोड़े।
- दायरा और सीमा: यह पूरा आर्थिक-प्रभाव अध्याय नहीं है। यहां क्षेत्रीय नियंत्रण कैसे बना, यही केंद्र में रखें; अनौद्योगीकरण, भू-राजस्व और धन-निकासी को अलग जुड़े हुए विषय में पढ़ें।
- UPSC में आम गलती: प्लासी, बक्सर और दीवानी को एक न मानें। प्लासी ने बंगाल राजनीति में निर्णायक प्रभाव दिया; बक्सर ने व्यापक सैन्य श्रेष्ठता साबित की; 1765 की दीवानी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर राजस्व अधिकार दिए।
- कला और संस्कृति से संबंध: पुर्तगाली गोवा, डेनिश सेरामपुर, फ्रांसीसी पुदुचेरी, ब्रिटिश कलकत्ता, बंबई और मद्रास से औपनिवेशिक स्थापत्य, छपाई, मिशनरी शिक्षा, चर्च, कब्रिस्तान, नगर-योजना और अभिलेख जुड़े, जो आज संस्कृति प्रश्नों में आते हैं।
- जिन शब्दों को मिलाना नहीं है:
- चार्टर क्राउन की कानूनी अनुमति था; इससे अपने-आप कंपनी को भारतीय क्षेत्र पर संप्रभुता नहीं मिलती थी।
- फरमान या स्थानीय अनुदान भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के भीतर व्यापारिक विशेषाधिकार देता था; उसका दायरा जारी करने वाली सत्ता और बाद की व्याख्या पर निर्भर था।
- युद्ध के बाद संधि से क्षेत्रीय हस्तांतरण, सैनिक खर्च, राजनीतिक प्रतिनिधि की मौजूदगी या कूटनीति पर रोक लग सकती थी।
- विलय से क्षेत्र सीधे कंपनी या क्राउन नियंत्रण में आता था; अप्रत्यक्ष नियंत्रण में शासक औपचारिक रूप से बना रहता था।
- विकल्प हटाने में काम आने वाले आँकड़े: कंपनी शासन को सामान्यतः 1757-1858 माना जाता है; क्राउन शासन भारत शासन अधिनियम, 1858 के बाद शुरू होकर 1947 तक चलता है। पुर्तगाली उपस्थिति 1858 में समाप्त नहीं हुई; गोवा, दमन और दीव 1961 तक पुर्तगाली नियंत्रण में रहे, जो स्वतंत्रता के बाद एकीकरण का अलग विषय है।
- संवैधानिक सावधानी: आधुनिक संवैधानिक अनुच्छेदों को 18वीं सदी पर उल्टा लागू न करें। अनुच्छेद 294, 295, 372 और 395 आज निरंतरता और उत्तराधिकार समझाने के लिए हैं, यह कहने के लिए नहीं कि कंपनी शक्ति संविधान से बनी थी।
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स्टडी पैक खोलेंसंभावितसंभावित प्रश्न
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1MCQनिम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. प्लासी की लड़ाई के तुरंत बाद कंपनी को दीवानी अधिकार मिले। 2. बक्सर की लड़ाई में मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय शामिल थे। 3. दीवानी अधिकार बंगाल, बिहार और उड़ीसा से जुड़े थे। कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
व्याख्या
कथन 1 गलत है क्योंकि दीवानी प्लासी के तुरंत बाद नहीं, बल्कि बक्सर और इलाहाबाद की संधि के बाद 1765 में मिली। कथन 2 और 3 सही हैं।
~50 शब्द · 1 अंक
