मुख्य तथ्य

  • भारत का अपवाह हिमालयी, प्रायद्वीपीय, तटीय और अंतर्देशीय तंत्रों से मिलकर बनता है; गंगा सबसे बड़ी भारतीय अपवाह द्रोणी है।
  • सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र हिमालयी तंत्र हैं, जिनमें बारहमासी प्रवाह, गहरी घाटियां और भारी अवसाद-भार मिलता है।
  • गोदावरी सबसे बड़ा प्रायद्वीपीय नदी तंत्र है; नर्मदा और तापी पश्चिममुखी भ्रंश-द्रोणी की प्रमुख नदियां हैं।
  • अधिकतर बड़ी प्रायद्वीपीय नदियां पूर्व की ओर बहती हैं, क्योंकि पश्चिमी घाट पश्चिमी तट के बहुत पास है।
  • अनुच्छेद 262 और प्रविष्टि 56 अंतर-राज्यीय नदी शासन को आकार देते हैं; प्रविष्टि 17 सामान्य जल मामलों को राज्यों के पास रखती है।

मुख्य बिंदु

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    भारत का अपवाह हिमालयी, प्रायद्वीपीय, तटीय और अंतर्देशीय तंत्रों से मिलकर बनता है; गंगा सबसे बड़ी भारतीय अपवाह द्रोणी है।

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    सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र हिमालयी तंत्र हैं, जिनमें बारहमासी प्रवाह, गहरी घाटियां और भारी अवसाद-भार मिलता है।

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    गोदावरी सबसे बड़ा प्रायद्वीपीय नदी तंत्र है; नर्मदा और तापी पश्चिममुखी भ्रंश-द्रोणी की प्रमुख नदियां हैं।

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    अधिकतर बड़ी प्रायद्वीपीय नदियां पूर्व की ओर बहती हैं, क्योंकि पश्चिमी घाट पश्चिमी तट के बहुत पास है।

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    अनुच्छेद 262 और प्रविष्टि 56 अंतर-राज्यीय नदी शासन को आकार देते हैं; प्रविष्टि 17 सामान्य जल मामलों को राज्यों के पास रखती है।

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    1956 का जल-विवाद कानून अधिकरण बनाता है; नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 अंतर-राज्यीय नदी विकास के लिए सलाहकारी बोर्ड देता है।

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    डेल्टा, ज्वारनदमुख, सहायक नदियां और वितरिकाएं UPSC के मानचित्र-आधारित प्रश्नों में बार-बार भ्रम बनती हैं।

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    समकालीन बहसों में केन-बेतवा, कावेरी अनुपालन, शहरी नदी प्रदूषण, पर्यावरणीय प्रवाह और हिमालयी बाढ़-जोखिम शामिल हैं।

अपवाह तंत्र की बुनियादी समझ

भारत का अपवाह तंत्र केवल नदियों की सूची नहीं है; यह उच्चावच, ढाल, मानसूनी वर्षा, शैल-संरचना और मानव उपयोग का संयुक्त मानचित्र है।

  • अपवाह तंत्र: मुख्य नदी, सहायक नदियों, वितरिकाओं, आर्द्रभूमियों, बाढ़-मैदानों और मुहाने का वह जाल, जिससे किसी क्षेत्र का सतही जल बाहर निकलता है।
  • अपवाह द्रोणी: वह पूरा क्षेत्र जिसे कोई नदी तंत्र जल निकास देता है; देश के भीतर क्षेत्रफल के हिसाब से गंगा अपवाह द्रोणी सबसे बड़ी है।
  • जल-विभाजक: दो द्रोणियों को अलग करने वाला ऊंचा भाग; पश्चिमी घाट छोटी पश्चिममुखी तटीय धाराओं और लंबी पूर्वमुखी प्रायद्वीपीय नदियों को अलग करता है।
  • सहायक नदी और वितरिका: सहायक नदी ऊपर की ओर मुख्य नदी से मिलती है; वितरिका डेल्टा क्षेत्र में मुख्य धारा से अलग होकर फैलती है।
  • अपवाह प्रतिरूप: समान शैल पर वृक्षाकार, कठोर-नरम शैलों के क्रम पर जालीनुमा, ऊंचे गुंबद या पठार से बाहर की ओर अरीय, और बंद द्रोणी में अभिकेंद्री प्रतिरूप बनता है।
  • पूर्ववर्ती अपवाह: पर्वत के उठने के बाद भी नदी अपना पुराना रास्ता बनाए रखती है; सिंधु, सतलुज और ब्रह्मपुत्र इसके प्रमुख हिमालयी उदाहरण हैं।
  • अध्यारोपित अपवाह: नदी पुरानी सतह से मिला रास्ता नीचे की शैल-संरचना पर भी थोप देती है; चंबल-बनास क्षेत्र को यह समझाने में लिया जाता है।
  • बारहमासी और मौसमी फर्क: हिमालयी नदियों को हिम, हिमनद-पिघलन और वर्षा से जल मिलता है; कई प्रायद्वीपीय नदियां मानसून और संग्रहित आधार-प्रवाह पर अधिक निर्भर रहती हैं।
  • UPSC में गलती: किसी नदी की आज की प्रशासनिक द्रोणी-सीमा, उसकी भूगर्भीय उम्र, स्रोत, मुहाना और जल-विवाद कानून एक ही बात नहीं हैं।
  • मानचित्र अनुशासन: लंबाई याद करने से पहले स्रोत, दिशा, पहला बड़ा मोड़, सहायक नदियां, बांध या बैराज, द्रोणी वाले राज्य और मुहाना तय करें।

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संभावित प्रश्न

अभ्यास में जाने से पहले उत्तर संरचना जाँचने के लिए इन प्रश्नों का उपयोग करें।

1MCQनिम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. गंगा अपवाह द्रोणी में कुछ सहायक नदियां प्रायद्वीपीय पठार से निकलती हैं। 2. कोसी गंगा की दाएं तट की सहायक नदी है। 3. गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना तंत्र बड़ा डेल्टा क्षेत्र बनाता है। कौन-से कथन सही हैं?1 अंक · 50 शब्द
  1. Aकेवल 1 और 2
  2. Bकेवल 1 और 3सही
  3. Cकेवल 2 और 3
  4. D1, 2 और 3

व्याख्या

चंबल, बेतवा और केन प्रायद्वीपीय भाग से यमुना के ज़रिए गंगा तंत्र में आती हैं। कोसी बाएं तट की सहायक नदी है। निचला तंत्र बड़ा डेल्टा बनाता है।

~50 शब्द · 1 अंक