मुख्य तथ्य

  • द्वितीय प्रश्नपत्र गणित में 150 बहुविकल्पीय प्रश्न, 300 अंक, दो घंटे तीस मिनट का समय और गलत उत्तर पर एक-तिहाई ऋणात्मक अंकन है।
  • पाठ्यक्रम की तीन तैयारी-परतें हैं: माध्यमिक और उच्च माध्यमिक गणित, स्नातक-स्तरीय गणित, और गणित शिक्षण-विधियाँ।
  • यूक्लिड विभाजन प्रमेयिका और अंकगणित का मूल प्रमेय महत्तम समापवर्तक, लघुत्तम समापवर्त्य, विभाज्यता और अपरिमेयता-तर्क का आधार हैं।
  • बीजगणित में बहुपद, द्विघात समीकरण और असमिकाएँ, सम्मिश्र संख्याएँ, श्रेणियाँ, गणना, क्रमचय-संचय, द्विपद प्रमेय, आव्यूह, सारणिक, समुच्चय, संबंध और फलन क…
  • ज्यामिति और क्षेत्रमिति में प्रमेय-पहचान, सही आरेख, त्रिज्यखंड-वृत्तखंड का अंतर और ठोस-रूपांतरण प्रश्नों में आयतन-संरक्षा विशेष महत्त्व रखते हैं।

मुख्य बिंदु

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    द्वितीय प्रश्नपत्र गणित में 150 बहुविकल्पीय प्रश्न, 300 अंक, दो घंटे तीस मिनट का समय और गलत उत्तर पर एक-तिहाई ऋणात्मक अंकन है।

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    पाठ्यक्रम की तीन तैयारी-परतें हैं: माध्यमिक और उच्च माध्यमिक गणित, स्नातक-स्तरीय गणित, और गणित शिक्षण-विधियाँ।

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    यूक्लिड विभाजन प्रमेयिका और अंकगणित का मूल प्रमेय महत्तम समापवर्तक, लघुत्तम समापवर्त्य, विभाज्यता और अपरिमेयता-तर्क का आधार हैं।

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    बीजगणित में बहुपद, द्विघात समीकरण और असमिकाएँ, सम्मिश्र संख्याएँ, श्रेणियाँ, गणना, क्रमचय-संचय, द्विपद प्रमेय, आव्यूह, सारणिक, समुच्चय, संबंध और फलन को जोड़कर पढ़ना चाहिए।

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    ज्यामिति और क्षेत्रमिति में प्रमेय-पहचान, सही आरेख, त्रिज्यखंड-वृत्तखंड का अंतर और ठोस-रूपांतरण प्रश्नों में आयतन-संरक्षा विशेष महत्त्व रखते हैं।

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    त्रिकोणमिति में कोण-इकाई, चतुर्थांश चिह्न, आवर्तिता, प्रतिलोम फलनों के मुख्य मान और ऊँचाई-दूरी में सही आरेख निर्णायक होते हैं।

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    निर्देशांक ज्यामिति में सरल रेखाएँ, वृत्त, शंकु परिच्छेद, बिंदुपथ, त्रिविमीय रेखाएँ और समतल, दिक्-कोज्याएँ, न्यूनतम दूरी और समतलता शामिल हैं।

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    कलन में सूत्रों जितनी ही शर्तें जरूरी हैं: सातत्य, अवकलनीयता, रोल प्रमेय, लाग्रांज माध्य मान प्रमेय, अवकलज के अनुप्रयोग, समाकलन विधियाँ और वक्रों के नीचे क्षेत्रफल।

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    प्रायिकता में परस्पर अपवर्जी घटनाएँ, स्वतंत्र घटनाएँ, सशर्त प्रायिकता, बेयेज प्रमेय, बर्नूली परीक्षण और द्विपद वितरण को अलग-अलग पहचानना चाहिए।

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    स्नातक गणित में समूह सिद्धांत, वास्तविक विश्लेषण, सम्मिश्र विश्लेषण, उच्च कलन, अवकल समीकरण, सदिश कलन, त्रिविमीय विश्लेषणात्मक ज्यामिति, यांत्रिकी, रैखिक प्रोग्रामन, संख्यात्मक विश्लेषण और अंतर समीकरण आते हैं।

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    शिक्षण-विधि में उद्देश्य, ब्लूम वर्गीकरण, विश्लेषणात्मक-संश्लेषणात्मक विधि, आगमन-निगमन विधि, परियोजना और प्रयोगशाला विधि, रचनावाद, पाठ-योजना, इकाई योजना, प्रौद्योगिकी-शिक्षाशास्त्र-विषयवस्तु ज्ञान, परीक्षण और 360 डिग्री आकलन पूछे जा सकते हैं।

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    सबसे प्रभावी पुनरावृत्ति मिश्रित अभ्यास है: एक ही बैठक में सूत्र-स्मरण, छोटी गणना, प्रमेय-गुणधर्म और शिक्षण-विधि शब्दावली।

वरिष्ठ अध्यापक गणित के द्वितीय प्रश्नपत्र की रूपरेखा और तैयारी-रणनीति क्या होनी चाहिए?

वरिष्ठ अध्यापक गणित के द्वितीय प्रश्नपत्र की तैयारी में विद्यालयी गणित, स्नातक गणित और शिक्षण-विधि को साथ पढ़ते हुए सूत्र-स्मरण, अवधारणा, गणना-अनुशासन और शिक्षण-शास्त्रीय भाषा पर बराबर पकड़ बनानी चाहिए। राजस्थान लोक सेवा आयोग के आधिकारिक गणित पाठ्यक्रम के अनुसार द्वितीय प्रश्नपत्र में १५० बहुविकल्पीय प्रश्न होते हैं। वरिष्ठ अध्यापक के लिए द्वितीय प्रश्नपत्र का गणित केवल संकीर्ण अंकगणित नहीं है। आधिकारिक पाठ्यक्रम इसे तीन खंडों में रखता है: संबंधित विषय का माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर का ज्ञान, संबंधित विषय का स्नातक स्तर का ज्ञान, और संबंधित विषय की शिक्षण-विधियाँ। प्रश्नपत्र में १५० बहुविकल्पीय प्रश्न होते हैं, कुल ३०० अंक होते हैं और समय दो घंटे तीस मिनट है। ऋणात्मक अंकन भी लागू है; प्रत्येक गलत उत्तर पर उस प्रश्न के निर्धारित अंकों का एक-तिहाई काटा जाता है। इसलिए गति जरूरी है, पर अंधा अनुमान महँगा पड़ता है। गंभीर तैयारी में सूत्र-स्मरण, अवधारणा की स्पष्टता, गणना-अनुशासन और शिक्षण-शास्त्रीय शब्दावली, चारों को साथ रखना होगा।

इस पाठ्यक्रम को पढ़ने का व्यावहारिक तरीका परतदार ढाँचे की तरह है। आधार पर विद्यालयी गणित आता है: संख्या पद्धति, बीजगणित, ज्यामिति, क्षेत्रमिति, त्रिकोणमिति, निर्देशांक ज्यामिति, कलन की मूल बातें, सदिश बीजगणित, सांख्यिकी और प्रायिकता। इनसे शीघ्र गणनात्मक प्रश्न और सीधे प्रमेय-गुणधर्म वाले प्रश्न बनते हैं। बीच की परत स्नातक स्तर की है: अमूर्त बीजगणित, वास्तविक और सम्मिश्र विश्लेषण, उच्च कलन, अवकल समीकरण, सदिश कलन, त्रिविमीय विश्लेषणात्मक ज्यामिति, यांत्रिकी, रैखिक प्रोग्रामन, संख्यात्मक विश्लेषण और अंतर समीकरण। यह भाग परिभाषाओं, मानक प्रमेयों, विधि-चयन और छोटे हलों की जाँच करता है। सबसे ऊपर गणित शिक्षण-विधि है: गणित की प्रकृति, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा से संबंध, भारतीय ज्ञान-परंपरा का योगदान, उद्देश्य, ब्लूम वर्गीकरण, शिक्षण विधियाँ, पाठ और इकाई योजना, प्रौद्योगिकी-शिक्षाशास्त्र-विषयवस्तु समन्वय, परीक्षण और ३६० डिग्री आकलन।

इस प्रश्नपत्र में विद्यालयी और स्नातक भागों को अलग-अलग दुनिया की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। कई विद्यालयी विषय उन्नत रूप में लौटते हैं: विद्यालयी बीजगणित के फलन आगे प्रतिचित्रण, सीमा और सातत्य बनते हैं; निर्देशांक ज्यामिति आगे शंकु परिच्छेद और त्रिविमीय ज्यामिति बनती है; सदिश आगे सदिश कलन में बदलते हैं; प्रायिकता आगे वितरण और बेयेज प्रमेय तक जाती है। पुनरावृत्ति इसलिए सरल परिभाषा से मानक परिणाम और फिर परीक्षा-गति वाले प्रश्न तक जानी चाहिए। जैसे, द्विघात समीकरण के बाद मूलों और गुणांकों का संबंध बहुपद गुणनखंडन, असमिकाओं, सम्मिश्र मूलों और आलेखीय अर्थ से जोड़ें। सारणिक के बाद त्रिभुज का क्षेत्रफल, प्रतिलोम आव्यूह और युगपत रैखिक समीकरणों की संगति से संबंध बनाइए।

एक उपयोगी दिनचर्या तीन कॉपियों पर टिक सकती है। पहली सूत्र और प्रमेय पंजी हो: सर्वसमिकाएँ, अवकलज और समाकलन सूत्र, शंकु परिच्छेद के रूप, सारणिक के गुण, प्रायिकता प्रमेय, समूह सिद्धांत की परिभाषाएँ, अभिसरण कसौटियाँ, संख्यात्मक सूत्र और यांत्रिकी के सूत्र। दूसरी त्रुटि पंजी हो: चिह्न की गलती, प्रांत की शर्त, भूली हुई पूर्व-शर्त, गलत निरसन, कोण की इकाई, प्रायिकता में स्वतंत्रता का गलत प्रयोग, और आवश्यक तथा पर्याप्त शर्त में भ्रम। तीसरी शिक्षण-विधि पंजी हो: अधिगम उद्देश्य, विधियाँ, आकलन शब्द, शिक्षक के गुण, पाठ-योजना के चरण और प्रौद्योगिकी-विषयवस्तु-शिक्षाशास्त्र का एकीकरण। अंतिम चरण में मिश्रित अभ्यास करें, क्योंकि वास्तविक प्रश्नपत्र बिना चेतावनी गणनात्मक प्रश्न से परिभाषा, फिर शिक्षण-विधि और फिर स्नातक प्रमेय तक जा सकता है।