राजस्थान के संत, लोक देवता, धार्मिक आस्थाएँ, बोलियाँ और राजस्थानी साहित्य
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परीक्षा दृष्टि और सांस्कृतिक मानचित्र
वरिष्ठ अध्यापक के राजस्थान GK पत्र में यह अध्याय मिलान आधारित संस्कृति इकाई है। इसे पाँच कड़ियों से पढ़ना चाहिए: संत या देवता, स्थान, संप्रदाय या परंपरा, ग्रंथ या प्रस्तुति रूप, और सामाजिक संदेश। राजस्थान की धार्मिक संस्कृति केवल राजदरबारी मंदिरों तक सीमित नहीं है। इसमें गाँवों के थान, फड़ वाचन, मेले, सूफी दरगाहें, जैन तीर्थ और लोकभाषाओं में रचा संत साहित्य शामिल हैं। वही नाम कभी स्थान से, कभी समुदाय से, और कभी साहित्यिक संकेत से पूछा जा सकता है।
सबसे सुरक्षित तरीका पहले व्यापक चित्र पकड़ना है। लोक देवता सामान्यतः पशुधन, ऊँट, सर्प, सीमा-क्षेत्र या वंचित समुदायों के रक्षक के रूप में याद किए जाते हैं। संत परंपराएँ मुख्यतः निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति में बाँटी जाती हैं। निर्गुण भक्ति निराकार ईश्वर और जाति-अहंकार के विरोध पर बल देती है, जबकि सगुण भक्ति में कृष्ण जैसे साकार आराध्य से प्रेम प्रमुख रहता है। सूफी और जैन परंपराएँ अजमेर, नागौर, दिलवाड़ा, रणकपुर, नाकोड़ा और महावीर जी जैसे स्थल-सूत्र जोड़ती हैं। फिर बोली और साहित्य के प्रश्न पूछते हैं कि ये आस्थाएँ मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, शेखावाटी, वागड़ी, गीत और मौखिक गाथा से कैसे फैलीं। मेले, संप्रदाय-पीठ और ग्रंथ-शीर्षक को अलग निबंध नहीं, याद रखने के सूत्र मानें।
हर नाम को एक स्थिर जोड़ी के साथ दोहराएँ। प्रश्न में रामदेवरा आए तो रामदेवजी याद करें; नारैना या दादू वाणी आए तो दादू दयाल; फड़ और रावणहट्ठा आए तो पाबूजी या देवनारायण। वस्तुनिष्ठ परीक्षा में लंबी कथा याद करने से अधिक यह जोड़ी-आधारित तरीका काम आता है।
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